टीम डायरी
भारत में जारी जनगणना प्रक्रिया के बीच ही जनसंख्या को लेकर नई बहस छिड़ गई है। इसमें दो पक्ष उभरे हैं। एक पक्ष की अगुवाई आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू जैसे दिग्गज कर रहे हैं। जबकि दूसरे पक्ष की वकालत सामान्य वर्ग के वे महिला-पुरुष कर रहे हैं, जो बढ़ती महँगाई से जूझ रहे हैं और देश की बेतहाशा बढ़ती आबादी को तरक्की की राह में सबसे बड़ी बाधा मानते हैं।
दरअसल यह मसला तब शुरू हुआ अमेरिकी कारोबारी और दुनिया के बड़े धनी-मानी लोगों में शुमार एलन मस्क ने अपने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट साझा की। यह मूल रूप से अमेरिकी मीडिया संस्थान एएफ पोस्ट की थी, जो उसने छह जून को साझा की थी। इसमें बताया गया था कि भारत में जनसंख्या वृद्धि दर देश के इतिहास में पहली बार इतनी नीचे पहुँच गई है कि अब अगली पीढ़ी में माता-पिता की जगह लेने के लिए (रिप्लेसमेंट) के लिए पर्याप्त बच्चे भी उपलब्ध नहीं हो रहे हैं।
इसे सीधे शब्दों में कहें तो दो लोगों (माता-पिता) की जगह लेने के लिए अगली पीढ़ी में भी कम से कम दो लोग (बच्चे) होने चाहिए। लेकिन भारत में जन्म दर दो से नीचे जा चुकी है, 1.9 हो गई है। इसमें भी दिल्ली में तो 1.2 के स्तर पर आ चुकी है, जो फिनलैण्ड से भी कम है। केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, जैसे भारत के कई बड़े राज्यों में भी जन्म दर 1.5 से नीचे है। जबकि विश्व में 2.1 की जन्म दर को मान्यता प्राप्त है, क्योंकि इसका मतलब होता है कि एक पीढ़ी की जगह लेने के लिए अगली में पर्याप्त बच्चे हैं।
इस स्थिति का असर क्या? यही कि अगले कुछ दशकों में देश की आबादी में बुजुर्गों की तादाद काफी बढ़ जाएगी। इससे देश के विकास, उसकी उत्पादकता पर विपरीत असर पड़ने लगेगा क्योंकि काम करने में सक्षम लोगों की कमी हो जाएगी। जापान, दक्षिण कोरिया, और यूरोप के कई देश इस समस्या से जूझ रहे हैं। तो क्या इसीलिए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चन्द्रबाबू नायडू ने अपने यहाँ ‘जनसंख्या बढ़ाओ नीति’ लागू की है? भले इसके लिए उन्हें आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा हो? इसका जवाब यह कि ऐसा संभव है।
यहाँ याद दिला दें कि नायडू ने आंध्र प्रदेश में जो जनसंख्या नीति लागू की है, उसके तहत जो दंपति तीसरा बच्चा पैदा करेंगे, उन्हें 30,000 रुपए और चौथी संतान को जन्म देने पर 40,000 रुपए की वित्तीय मदद सरकारी खजाने से एकमुश्त दी जाएगी। उनकी इस नीति के लिए उन्हें आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है क्योंकि देश की आबादी पहले ही दुनिया में सर्वाधिक (करीब 1.50 अरब) हो चुकी है। इससे हर तरह के संसाधनों पर बोझ बढ़ रहा है और देश के विकास की रफ्तार धीमी हो रही है, फिलहाल तो यही माना जा रहा है। हालाँकि नायडू का कहना है, “आने वाले समय में जनसंख्या ही सबसे बड़ी पूँजी होगी। कोई भी देश तेज तरक्की तभी कर सकेगा, जब उसके पास काम करने के लिए पर्याप्त मानव-संसाधन (लोग) उपलब्ध होगा।”
नायडू की दलील भविष्य के लिहाज से अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन वर्तमान का क्या? वह तो अभी जनसंख्या का दबाव लगातार महसूस कर रहा है? चाहे राष्ट्रीय स्तर पर हो या समाज, परिवार अथवा व्यक्तिगत स्तर पर। अल्का गुढा़ नाम की एक महिला ने तो अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा कर अपनी वाजिब-सी लगने वाली दलील भी रखी है। उन्होंने बताया है कि आखिर क्यों अधिकांश दंपति सिर्फ एक संतान पैदा करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। अपना पक्ष पुख्ता करने के लिए उन्होंने बताया है, “मेरी एक दोस्त है। आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला उसका बेटा स्कूल की ओर से घुमाने के लिए जापान ले जाया गया। मेरी दोस्त को इस पर 2.5 लाख रुपए खर्च करने पड़े। इसके अलावा 50 हजार रुपए खर्चे-पानी के भी। बच्चा जापान से 19 हजार रुपए के जूते खरीद लाया। यही नहीं, तीन महीने पहले भी ऐसी ही घुमाई-फिराई के लिए उसे गोवा ले जाया गया। उस पर 90 हजार रुपए खर्च पड़े। अब कहिए, किसी को अचरज होगा क्या कि लोग क्यों एक संतान रखना चाहते हैं?”
दलीलें दोनों अपनी जगह सही हैं, तो अब बताइए, कौन सी दमदार है, नायडू वाली या इस महिला की?
