आरएसएस के 100 वर्ष : अगर वाकई महात्मा गाँधी की हत्या में संघ का हाथ होता तो….!

अनुज राज पाठक, दिल्ली

आज, विजयादशमी से 100 वर्ष पूर्व डॉक्टर केशव बलीराम हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की थी। आज संघ 101वें वर्ष में प्रवेश कर गया। संयोग से इस बार विजयादशमी पर ही महात्मा गाँधी जी का जन्मदिन भी है। अत: आज का दिन चिरस्मरणीय हो गया। गाँधी जी के जन्मदिन पर हर वर्ष की भाँति ‘संघ ने गाँधी की हत्या की’ ऐसे दुराग्रह भरे वाक्य ही नहीं, बल्कि लेख लिखकर कागज काले किए जाते हैं। यह तब है, जब संघ का वास्तव में गाँधी हत्या में लेशमात्र भी योगदान नहीं था, अगर होता तो कांग्रेस संघ और उसके स्वयंसेवकों को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ती क्योंकि नेहरू जी स्वयं संघ को नष्ट करने की घोषणा कर चुके थे।

केवल नेहरू ही नहीं अपितु उनके बाद जब इन्दिरा गाँधी देश की प्रधानमंत्री बनी और देश में आपातकाल लगाया तो उन्होंने भी संघ को नष्ट करने का संकल्प दोहराया था। आपातकाल की घोषणा के बाद 27 जून 1975 को केन्द्रीय सचिवालय के अधिकारियों की बैठक में “श्रीमती गाँधी ने देश में आन्तरिक उपद्रव का मूल कारण संघ को माना और दोषी ठहराया।” कुछ दिन बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकान्त बरुआ ने कहा, “हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पूर्ण रूप से नष्ट करना चाहते हैं। उन्हें पुनर्संगठन का अवसर नहीं मिलना चाहिए।” इसके बाद चार जुलाई 1975 को इन्दिरा शासन ने संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया। यह संघ पर तीसरी बार प्रतिबन्ध लगा था, जो लगभग 21 महीने तक रहा। इस दौरान संघ के स्वयंसेवकों और नेताओं को जेल में डाल दिया गया।

यहाँ यह जानना आवश्यक होगा कि कांग्रेस में अवश्य संघ के प्रति द्वेष था, लेकिन स्वयं महात्मा गाँधी और डॉ हेडगेवार में अपनी-अपनी कार्यशैली के कारण वैचारिक मतभेद भर रहा, मनभेद कभी नहीं दिखा। गाँधी जी अहिंसा के मार्ग को छोड़कर अन्य किसी मार्ग को स्वतंत्रता हेतु उपयुक्त नहीं मानते थे। अपितु वह कई बार अन्य मार्गावलम्बी के प्रति कठोर भी हो जाते थे। इसे शचीन्द्रनाथ सान्याल के शब्दों से समझा जा सकता है। सान्याल अपनी जीवनी में लिखते हैं,  “हम कांग्रेस के नेतागणों की मनोवृत्ति की तुलना करते हैं, तो लगता है कि ये लोग खासकर महात्माजी और उनके अनुयायीगण मानों क्रान्तिकारियों को अपना और देश का शत्रु समझते है। कांग्रेस के मंचों और सभापति के आसन से भी, ऐसे विषवत् उद्‌गार व्यक्त जाते रहे, जिससे देश में क्रूर एवं प्रबल दलबन्दी की भावना पैदा होती है। मालूम होता है कि इन नेताओं के दिल में क्रान्तिकारियों के प्रति एक उग्र कटुता-सी है। तभी तो ये नेतागण क्रान्तिकारी आन्दोलन को कभी ‘बालकोचित’ बताकर निन्दा करते हैं और कभी उसे फासीवादी कहकर अपनी जलन शान्त करते हैं।

सान्याल एक जगह और कहते हैं, “सन् 1920 के बाद जब मैं कालेपानी (अण्डमान की सेल्युर जेल) से लौटकर आया तब महात्मा गाँधी भारत के राष्ट्रीय क्षेत्र में अपनी कार्यप्रणाली को लेकर अवतीर्ण हो चुके थे। महात्मा गाँधी की अहिंसा नीति के कारण एवं उनके जैसे महान् व्यक्ति के भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन को काफी बाधा पहुँची। महात्मा गाँधी यह प्रचार करने लगे कि भारतीय प्राचीन आदर्श के साथ भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का समन्वय नहीं हो सकता। मानो प्राचीन भारतीय आदर्श में श्रीकृष्ण का एवं कुरुक्षेत्र के महायुद्ध का कोई स्थान ही नहीं है।”

सान्याल के इन कथनों से ज्ञात होता है कि कांग्रेस के नेता अपने से अलग संगठनों से द्वेष रखते थे। वहीं जहाँ तक संघ की बात है, संघ ने स्वयं को बहुत सावधानीपूर्वक आगे बढ़ाया, इसलिए संघ से कांग्रेस का द्वेष होना और भी स्वाभाविक था। संघ ने किसी भी विवाद में स्वयं को नहीं उलझाया क्योंकि उसका लक्ष्य विशाल था, इसलिए उसने मंथर गति से अपने कार्य को जारी रखा। संघ ने कभी व्यक्ति आधारित व्यवस्था का आश्रय नहीं लिया क्योंकि उसके उद्देश्य बड़े थे और उसका मानना था कि व्यक्ति के साथ उसकी कुछ कमियांँ भी जुड़ी होती हैं। इसी कारण संघ ने भारतीय प्रतीकों को अपनी प्रेरणा का आधार बनाया और लगातार मजबूत होता गया। संघ की यही मजबूती कांग्रेस के लिए चुनौती रही। इसीलिए वह संघ पर प्रतिबन्ध का कोई भी अवसर कैसे हाथ से जाने देती?

बहरहाल गाँधी जी के अहिंसा सिद्धान्त के इतर डॉ हेडगेवार जी का मानना था, “बुद्धि, विद्या एवं उच्च आदर्शों के साथ-साथ राष्ट्र को शक्तिशाली भी होना चाहिए। अहिंसा तभी कामयाब हो सकती है, जब उसके पीछे ‘बल’ हो।” ‘बल’ से उनका तात्पर्य राष्ट्रीय चेतना एवं लोगों की संगठन शक्ति था। उन्होंने कहा था, “बल के बिना संरक्षण नहीं हो सकता। ‘बल’ केवल संगठन में है, किन्तु वह संगठन विघटन से अलिप्त एवं वाह्य आक्रमण से टक्कर लेने में समर्थ होना चाहिए।” यही सोच गाँधी जी और डॉ हेडगेवार को एक-दूसरे से अलग करती थी। यद्यपि विविध विषयों पर मतभेद के बाद भी गाँधी जी संघ के वास्तविक कार्य को देखने 25 दिसम्बर 1934 को स्वयं वर्धा के शिविर में पहुँचे थे। जहाँ डॉक्टर साहब और गाँधी जी के मध्य विविध विषयों पर चर्चा भी हुई।

इसके बाद गाँधी जी 16 सितम्बर 1947 को दिल्ली में संघ के शिविर में गए। वहाँ उन्होंने स्वयंसेवकों को सम्बोधित भी किया और संघ के कार्यों की प्रशंसा भी की। इन घटनाओं से यह समझ में आता है कि कांग्रेस ने अन्य नेताओं की तरह गाँधी जी संघ को न ही प्रतिद्वंद्वी मानते थे, न उन्हें संघ कार्य से कोई द्वेष था। अपितु वह संघ के सामाजिक और हिन्दू संगठन कार्य से प्रभावित थे। हाँ, डॉक्टर साहब और गाँधी जी में मुस्लिम समर्थन पर स्पष्ट मतभेद था। गाँधी जी जहाँ मुस्लिम अलगाववाद का तटस्थता से और समझौतावादी आचरण से हृदय परिवर्तन चाहते थे। जबकि, डॉक्टर हेडगेवार का मानना था कि हिन्दुओं के अपने संगठन, उनके बीच के सामाजिक विरोधाभासों के अन्त और राष्ट्रीयता के प्रति समर्पण भाव से ही मुस्लिम मानसिकता को बदला जा सकता है।

भारतीय मुसलमानों के मन में ‘अलगाववाद’ महात्मा गाँधी नहीं देख पाए। जबकि शचींद्रनाथ सान्याल ने भी मुस्लिमों के अलगाववाद को रेखांकित किया है। वे लिखते हैं, “हमारे दल से मुसलमान दल का यही भेद था कि हम लोग स्वाधीन भारत के जिस रूप की कल्पना करते थे, उसमें हिन्दुओं के स्वावलम्बन की बात भले रही हो मगर हिन्दुओं की प्रधानता का कोई विचार नहीं था। हमारी कार्य-प्रणाली में मुसलमानों को अलग-थलग रखने का ख्याल हमेशा दूर रहा। हम तो उन्हें अपने दल में खींचने की ही चेष्टा करते थे। यद्यपि हमारे बुलाने पर मुसलमान यदि नहीं आते थे तो उसका कारण यह था कि मुसलमान लोग भारतवर्ष से हिन्दुओं की तरह प्रेम नहीं करते थे। मुसलमानों के साथ मिलने-जुलने से हमारी यह धारणा मजबूत हुई है कि हमारे देश के मुसलमान लोगों का तुर्की, मिश्र, अरब, फारस अथवा काबुल की ओर जितना खिंचाव है, भारत की ओर उतना नहीं है। वे तुर्की के गौरव में अपने को जितना गौरवान्वित मानते हैं, भारतवासियों के, हिन्दुओं के गौरव में खुद को उतना गौरवान्वित नहीं मानते।”

इस तरह देखें तो बहुत से लेखक जिस तरह संघ और गाँधी जी को परस्पर विरोधी रूप से प्रस्तुत करते हैं, वैसा वास्तव में है नहीं। मतभेद होना सामान्य चीज है। हाँ, कांग्रेस अवश्य राजनैतिक दल रहा तो उसे किसी अन्य शक्ति के उभरने से स्वाभाविक असहजता होनी ही थी क्योंकि संघ बहुत जल्द स्वयं को अखिल भारतीय स्तर पर विस्तार दे रहा था। संघ की संगठनात्मकता और हिन्दू जनमानस में स्वीकार्यता कांग्रेस के लिए चिन्ता का कारण थी। आज कांग्रेस की वही चिन्ता सत्य भी प्रतीत हो रही है। संघ का निर्माण समस्त हिन्दुओं को, राष्ट्र के जन-जन को शक्तिसम्पन्न करने हेतु हुआ था। इसीलिए आज वह गैर-राजनैतिक होते हुए भी देश में केन्द्रीय भूमिका निभा रहा है। 

आज आधुनिक भारतीय इतिहास के लिए उल्लेखनीय दिन है। आज के दिन जिस संघरूप पादप का डॉक्टर हेडगेवार ने रोपण किया था, वह अपने 100 वर्षों में मात्र ‘किशोर’ हुआ है। ‘किशोर’ इसलिए कि जिस स्वप्न को डॉक्टर हेडगेवार ने देखा, उसे पूरा करने के लिए अभी संघ को अपनी यात्रा निरन्तर कई और वर्षों तक जारी रखनी है। स्वप्न बड़ा है। संघर्ष और यात्रा भी बड़ी होगी यह निश्चित है, लेकिन संघ अपनी कार्य पद्धति से उसे पूर्ण अवश्य करेगा यह भी विश्वास जगता है। ‘इदं राष्ट्राय इदन्नमम’ अर्थात् जो कुछ है, वह राष्ट्र का है। मेरे पास मेरा कुछ भी नहीं। संघ के स्वयंसेवकों में यह भावना राष्ट्र के प्रति समर्पण को दृढ़ करती है, और जन-जन को उससे जोड़ देती है। 

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(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ

5 – आरएसएस के 100 वर्ष : नेहरू जी ने संघ को खत्म करने की घोषणा की थी!
4 – आरएसएस के 100 वर्ष : संघ अपनी पद्धति पर डटा रहा, उसकी गतिविधियाँ भी चलती रहीं 
3 – आरएसएस के 100 वर्ष : मात्र चार के अन्तराल में ही कांग्रेस संघ को प्रतिद्वन्द्वी मानने लगी थी!
2 – आरएसएस के 100 वर्ष : देखिए, हेडगेवार का कथन अक्षरशः: सत्य भी सिद्ध हुआ!
1- आरएसएस के 100 वर्ष : यह नहीं कह सकते कि जो कांग्रेस में नहीं था, वह देशभक्त नहीं था!

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