टीम डायरी
अंग्रेजों ने भारत को सिर्फ ऊपरी तौर पर गुलाम बनाकर नहीं रखा था। उन्होंने हमारी मानसिकता को भी गुलाम बना लिया था। इस मानसिक गुलामी का असर हम पर आज तक दिखाई देता है। इसीलिए ‘हम भारत के लोग’ (वे जो अंग्रेजी सोच वाले हैं) अपनी भाषा, अपनी परम्पराओं, अपनी संस्कृति, अपनी ज्ञान परम्परा को हेय दृष्टि से देखते हैं। उसको हीन समझते हैं। उसका मजाक बनाते हैं।
इसका एक ताजा प्रमाण 77वें गणतंत्र दिवस के मौके पर सामने आया है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार की ओर से पद्म पुरस्कारों की घोषणा की गई। पुरस्कार पाने वालों में एक नाम भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) के निदेशक प्रोफेसर वी कामकोटि का भी है। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। इसलिए कि उन्होंने गाय के गोबर और गौमूत्र पर शोध किया। इस शोध अध्ययन से उन्होंने साबित किया कि गाय के गोबर और गौमूत्र में कुछ ऐसे जीवाणु मौजूद होते जो विभिन्न बीमारियों के उपचार में काम आ सकते हैं। पिछले साल जनवरी महीने में ही उन्होंने अपने शोध अध्ययन के निष्कर्षों की घोषणा की थी। उन्होंने ‘नेचर’ नामक पत्रिका में छपे एक अन्य अध्ययन को भी साझा किया था। उसमें भी प्रोफेसर कामकोटि के निष्कर्षों की पुष्टि हुई थी।
भारतीय ज्ञान परम्परा से जुड़े इसी अध्ययन के लिए सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की। लेकिन जैसा ऊपर लिखा, ‘हम भारत के लोग’ अपनी मानसिक गुलामी को छोड़ने के लिए आज भी राजी नहीं हैं। इसी कारण प्रोफेसर कामकोटि को पद्म सम्मान देने का मजाक बनाया जा रहा है। केरल कांग्रेस के आधिकारिक ‘एक्स’ अकाउंट से सन्देश साझा किया गया है। इसमें लिखा है, “पद्म सम्मान प्राप्त करने वाले प्रोफेसर वी कामकोटि को बधाई। आइआइटी मद्रास में आपने खून-पसीना बहाकर गौमूत्र पर जो शोध किया, उसे देश ने सराहा है। आपने गौमूत्र को विश्व मंच पर पहुँचा दिया।” हालाँकि कांग्रेस पार्टी के इस व्यंग्य पर तुरंत तीखी प्रतिक्रियाएँ भी आने लगी हैं। ऐसी ही एक प्रतिक्रिया श्रीधर वेम्बू की रही, जो सूचना-तकनीक क्षेत्र की भारतीय कम्पनी जोहो के मालिक हैं।
उन्होंने अपने ‘एक्स’ अकाउंट पर लिखा है, “प्रोफेसर कामकोटि माइक्रो प्रॉसेसर डिजाइन की गहन तकनीक के विशेषज्ञ हैं। आइआइटी-मद्रास के वह निदेशक हैं, जो भारत का सर्वश्रेष्ठ तकनीकी संस्थान है।…वह इस सम्मान के हकदार हैं। उन्हें उनके वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर यह सम्मान दिए जाने का मैं समर्थन करता हूँ और आगे फिर करूँगा। मैं यह भी मानता हूँ कि गाय के गोबर और गौमूत्र में असंख्य सूक्ष्य जीवों का ऐसा समुदाय होता है, जो मानवों के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है। पर यह गुलाम मानसिकता का ही नतीजा है कि कुछ लोगों को लगता है कि इस मान्यता का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और इसकी पुष्टि के लिए वैज्ञानिक शोध से भी कोई लाभ नहीं है। किसी दिन जब हार्वर्ड, एमआइटी (अमेरिकी विश्वविद्यालय) जैसे संस्थानों के ऐसे ही अध्ययन निष्कर्ष सामने आएँगे, तो यही गुलाम मानसिकता वाले लोग उसे परम सत्य मानकर पूजा करेंगे।”
श्रीधर जी की प्रतिक्रिया, वाकई विचार करने योग्य है। और इसी विचारक्रम में एक सवाल आज 77वें गणतंत्र दिवस के मौके पर भी जस का तस बना हुआ है, कि क्या ‘हम भारत के लोग’ गुलाम मानसिकता से आजाद हैं?
