RCB Stampede

आरसीबी हादसा : पुलिस के पास ‘अलादीन का चिराग’ नहीं था, तो ‘जिन्न’ निकाला किसने था?

टीम डायरी

इण्डिय प्रीमियर लीग (आईपीएल) का खिताब जीतने के बाद रॉयल चैलेन्जर्स बेंगलुरू (आरसीबी) की टीम के जश्न में 11 लोगों की मौत से जुड़े मामले में मंगलवार को केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (सीएटी) ने अहम टिप्पणी की। सीएटी के फैसले में कहा गया, “पुलिस अधिकारी भी इंसान ही हैं। उनके पास कोई अलादीन का चिराग नहीं होता कि उस पर अँगुलियाँ घिसकर चुटकियों में वे किसी की कोई भी इच्छा पूरी कर दें।” 

इस टिप्पणी के साथ सीएटी ने कहा, “प्राथमिक रूप से मामले को देखने पर यही लगता है कि भगदड़ में निर्दोष लोगों की मौत के लिए आरसीबी ही जिम्मेदार है। उसके पास जश्न के आयोजन के लिए पर्याप्त अनुमति नहीं थी। फिर भी उसने बेहद कम समय में जश्न का आयोजन किया। सोशल मीडिया पर इसकी सूचनाएँ प्रसारित कीं। इससे तीन से पाँच लाख लोग मौके पर इकट्‌ठा हो गए। पुलिस को इतनी भीड़ के प्रबन्धन के लिए जरूरी सुरक्षा इंतजाम करने का पूरा  वक्त ही नहीं मिला। इसी कारण चार जून 2025 का वह हादसा हुआ।” 

इसके साथ सीएटी ने कर्नाटक के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी विकास कुमार विकास और अन्य के निलम्बन का आदेश भी रद्द कर दिया। कर्नाटक सरकार ने हादसे के लिए पुलिस को लापरवाही का जिम्मेदार मानते हुए पाँच जून को बेंगलुरू के तत्कालीन पुलिस आयुक्त बी दयानन्द, उपायुक्त शेखर एच टेक्कनवर तथा विकास कुमार को निलम्बित किया था। इस आदेश के विरुद्ध राज्य के पुलिस कर्मचारियों ने अगले दिन हाथ में काली पट्‌टी बाँधकर विरोध जताया था। विकास की अगुवाई में निलम्बन के आदेश को सीएटी में चुनौती दी गई थी। 

हालाँकि यहाँ सवाल अब भी कायम है कि पुलिस के पास अलादीन का चिराग नहीं था, यह ठीक है पर ‘जिन्न’ तो निकला था। उसी ‘जिन्न’ ने अनियंत्रित होकर इतनी भगदड़, इतना कोहराम मचाया कि इतने सारे लोगों की जान चली गई। यह ‘जिन्न’ निकाला किसने था? बेंगलुरू पुलिस का कहना है कि उसने आरसीबी को इतनी जल्दी जश्न के आयोजन की मंजूरी नहीं दी थी। उसने आरसीबी सेआग्रह किया था कि अभी प्रशंसकों में जोश बहुत ज़्यादा है। पुलिस को तैयारी का पूरा समय भी नहीं मिल पाएगा। इसलिए रविवार को जीत का ज़श्न मना लिया जाए। मगर आरसीबी ने बात नहीं मानी। उसने सरकार के स्तर से जश्न के लिए अनुमति हासिल कर ली। 

इसलिए फिर सवाल कि आरसीबी को अनुमति दी किसने? उसके भीतर इतनी हिम्मत कहाँ से आई कि पुलिस की बात को अनसुना कर इतने बड़े जश्न का आयोजन कर ले? बिना पर्याप्त तैयारी के खुलेआम लोगों को भारी संख्या में जश्न में शामिल होने के लिए आमंत्रित भी कर ले? क्या यह सब किसी बड़े और ताकतवर व्यक्ति के अप्रत्यक्ष समर्थन, सहयोग के बिना सम्भव है? नहीं, हो ही नहीं सकता। तो फिर उस व्यक्ति को सामने लाकर उसे असल जिम्मेदार क्यों नहीं माना गया? उस पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई कि एक मिसाल बन जाती?

वैसे, लोकतांत्रिक व्यवस्था में अक्सर इस तरह के प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं। इसलिए दीगर घटनाक्रमों के बीच से भी उनके उत्तर तलाशने की कोशिश रहती है। जैसे- कर्नाटक में एक घटनाक्रम यह है कि वहाँ काफी समय से मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच कुर्सी की रस्सकशी चल रही है। इसके तहत अक्सर सिद्धारमैया की जगह शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने की माँग जोर पकड़ती है। कांग्रेस नेतृत्त्व इस माँग को खारिज करता रहता है। अभी-अभी फिर से यही सब घटनाक्रम सुर्खियाँ बटोर रहा है। 

इसीलिए पूछ सकते हैं कि कहीं इसी राजनैतिक रस्साकशी के चक्कर में तो ‘बिना तैयारी के आरसीबी की जीत का जश्न मनाने का जिन्न’ बाहर नहीं निकला था? जवाब मिलना चाहिए।    

—– 

ये लेख भी पढ़े जा सकते हैं 

2- आरसीबी हादसा : उनकी नज़र में हम सिर्फ़ ‘कीड़े-मकोड़े’, तो हमारे लिए वे ‘भगवान’ क्यों?
1- आरसीबी के जश्न में 10 लोगों की मौत- ये कैसा उत्साह कि लोगों के मरने की भी परवा न रहे? 

सोशल मीडिया पर शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *