टीम डायरी
कई बरसों बाद महाराष्ट्र में हिन्दी भाषा के नाम पर फिर बवाल मचा है। वहाँ अभी मंगलवार, आठ जुलाई को ही राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने कथित तौर पर जबरन राज्य पर हिन्दी भाषा थोपने के विरोध में जुलूस निकाला। हालाँकि, पुलिस ने जुलूस में शामिल प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। इस आरोप में कि उन्हें जिस मार्ग से जुलूस ले जाने की अनुमति दी गई थी, वे उस पर न जाकर किसी और राह पर चल दिए थे। इसीलिए स्थिति बिगड़ने से बचाने के लिए कुछ कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।
सूचनाओं के अनुसार, कुछ दिनों पहले राज ठाकरे की पार्टी के कार्यकर्ताओं ने खाने-पीने की दुकान लगाने वाले एक व्यापारी के साथ मार-पीट कर दी थी। इस आरोप में कि उसे मराठी नहीं आती और वह हिन्दी बोलता है। इसके अलावा इन कार्यकर्ताओं ने सुशील केडिया नामक एक उद्यमी के दफ्तर में भी तोड़-फोड़ की थी। केडिया ने इन कार्यकर्ताओं को चुनौती दी थी कि उन्हें मराठी नहीं आती। वे हिन्दी बोलते और 30 साल से मुम्बई, महाराष्ट्र में रह रहे हैं। किसी में हिम्मत है तो उन्हें यहाँ से बाहर निकालकर दिखाए।
मार-पीट और तोड़-फोड़ की इन घटनाओं के बाद मुम्बई तथा महाराष्ट्र के कुछ अन्य हिस्सों में भी व्यापारियों ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा की थी। इसी के जवाब में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता भी जुलूस निकाल रहे थे। लेकिन वे ‘राह भटककर जेल पहुँच गए’। हाँ, यह सच है कि राज ठाकरे की पार्टी के कार्यकर्ता सच में, ‘राह भटक गए’ हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दशकों पहले जिस तरह तमिलनाडु और महाराष्ट्र में भी, हिन्दी विरोध का आन्दोलन चला और उससे कुछ नेताओं ने अपनी जमीन मजबूत की, वैसा फिर हो सकता है।
लेकिन सही मायनों में देखा जाए तो राज ठाकरे और उनके कार्यकर्ताओं की यह सोच आज पूरी तरह गलत और बेमानी हो चुकी है। क्यों? क्येांकि सतत् विरोध के बावजूद हिन्दी ने पूरे देश में (तमिलनाडु, जैसे भाषायी तौर पर कट्टर राज्य में भी) अपनी स्थिति मजबूत की है। आज महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, जैसे राज्यों सहित देश की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी हिन्दी बोलती है। हिन्दी में संवाद और सम्पर्क करती है।
देश के बड़े से बड़े क्षेत्रीय नेता, फिर चाहे वे किसी भी भाषा के बोलने वाले क्यों न हों, अपनी राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने के लिए हिन्दी ही बोलते हैं, अंग्रेजी नहीं। देश के सबसे बड़े उद्योगों में एक फिल्म उद्योग, खासकर हिन्दी फिल्म उद्योग महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई से ही संचालित होता है। बड़े-बड़े व्यवसायी, पेशेवर, अभिनेता, संगीतकार, साहित्यकार, आदि जिन्हें भी राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम, अपना काम फैलाना होता है, वे भी इसके लिए हिन्दी की ही अँगुली पकड़कर आगे बढ़ते हैं। किसी अन्य भाषा की नहीं।
और तो और जो राज ठाकरे हिन्दी का विरोध कर रहे हैं, उन्हें भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए हिन्दी ही मिली है। सिर्फ उन्हें ही नहीं, करीब 20 बरस पहले उनसे अपनी राह जुदा कर चुके उनके भाई उद्धव ठाकरे को भी आज हिन्दी (विरोध) से ही आस है कि राज्य के आने वाले निकाय चुनावों में उन्हें और उनकी पार्टी को इससे लाभ हो जाएगा। वे अपनी खोई जमीन फिर हासिल कर सकेंगे।
इसी चक्कर में उद्धव और राज ठाकरे ने इतने बरसों के बाद आपस में हाथ भी मिला लिया है। ऐसे में, यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दी (विरोध) ही इन दोनों ठाकरे भाइयों के जुड़ाव का माध्यम बनी है। तो फिर, किसी को भी यह बात कैसे हजम हो सकती है कि हिन्दी विभाजनकारी भाषा है! जनसामान्य इस बात को अच्छी तरह समझ चुका है। नेता भी जितनी जल्दी ही इसे समझ जाएँ तो बेहतर हो।
