नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश
बिहार विधानसभा के चुनाव आ रहे हैं और उसकी सरगर्मी में राहुल गाँधी केन्द्र में सत्ता सँभाल रही भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ फिर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। कारण कि बिहार सरकार में भी भाजपा शामिल है। और राहुल गाँधी को डर है या कहें कि उनका खुला आरोप है कि भाजपा सरकारी चुनावी तंत्र (चुनाव आयोग और उसके सहयोगी) की मदद से बिहार की सत्ता में फिर काबिज हो सकती है। उनका कहना है कि हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे राज्यों के पिछले विधानसभा चुनावों के साथ ही बीते दो लोकसभा चुनावों से, खासकर, भाजपा ऐसे ही केन्द्र और अन्य राज्यों में सत्ता हासिल कर रही है। अपने आरोपों के समर्थन में पहले वह लगातार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में छेड़छाड़ का मसला उठाया करते थे। लेकिन अब उन्होंने चुनाव आयोग पर ‘वोट-चोरी’ का आरोप लगाया है।
राहुल गाँधी ने गुरुवार, सात अगस्त को बेंगलुरू में कांग्रेस के नेतृत्त्व वाले विपक्षी गठबन्धन के नेताओं को बताया कि कर्नाटक में उनकी पार्टी को सात लोकसभा सीटों का नुकसान हुआ। इसलिए कि वहाँ चुनाव आयोग की शह पर वोटों की चोरी की गई। यानि फर्जी मतदाताओं से वोट डलवाए गए। उन्होंने महादेवपुरा विधानसभा सीट का एक उदाहरण भी दिया। यह सीट बेंगलुरू सेन्ट्रल लोकसभा क्षेत्र के अन्तर्गत आती है। राहुल गाँधी का अरोप है कि सिर्फ महादेवपुरा में ही एक लाख दो सौ से अधिक फर्जी मतदाताओं को आयोग ने वोट डालने दिया।
राहुल के इन आरोपों पर चुनाव आयोग ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए शुक्रवार, आठ अगस्त को स्पष्ट किया कि इनमें कोई नई बात नहीं है। इसी तरह के आरोप 2018 में भी उनकी पार्टी द्वारा लगाए गए थे। तब मामला मध्य प्रदेश से जुड़ा था। वहाँ करीब 15 महीनों के लिए मुख्यमंत्री रहे कमलनाथ (पूर्व मुख्यमंत्री) ने मतदाता सूचियों में फर्जीबाड़े कर मुद्दा उठाया था। आयोग ने उनकी शिकायत का पहले ही निराकरण कर दिया था। मामले में उच्चतम न्यायालय से भी चुनाव आयोग के पक्ष में ही फैसला आया था। अब वही आरोप ‘नए अन्दाज में’ फिर लगाए हैं।
इसके अलावा आयोग ने एक और महत्त्वपूर्ण बात कही कि राहुल “गाँधी एक शपथपत्र पर दस्तखत कर के कह दें कि जो आरोप उन्होंने लगाए, वे सही हैं। आयोग उनकी जाँच करा लेगा। आरोप सही पाए गए तो सख्ती से कार्रवाई की जाएगी। अन्यथा राहुल गाँधी को देश के मतदाताओं को गुमराह करने के लिए माफी माँगनी होगी।” दिलचस्प बात है कि खबरनवीसों ने जब यही बात राहुल गाँधी से पूछी तो वे साफ बच निकलने की कोशिश करते हुए दिखाई दिए। नीचे सम्बन्धित वीडियो दिया गया है, देखा जा सकता है। इसमें राहुल गाँधी शपथपत्र से जुड़े सवाल के जवाब में कह रहे हैं, “मैं एक राजनेता हूँ। जनता के सामने अपनी बात रखना मेरा काम है। मैंने जो कहा, वह चुनाव आयोग के ही दस्तावेज के आधार पर कहा। अगर आयोग को लगता है कि दस्तावेज में दर्ज तथ्य और आँकड़े गलत हैं तो वह कह दे कि यह झूठ है। हालाँकि, आयोग ने अब तक एक बार भी ऐसा कुछ कहा नहीं है।”
राहुल गांधी को चुनाव आयोग ने झूठ बोलने से पहले कानून याद दिला दिया!
— Minakshi Shriyan (@Minakshishriyan) August 8, 2025
"Atom Bomb" वाला आरोप अब गले की हड्डी बन गया चुका है ।
जब साइन करने को कहा तो राहुल जी कहते हैं कि मैं तो नेता हूं, साइन नहीं करूंगा 😂
क्योंकि राहुल जी अच्छे से जानते है कि झूठा सबूत देना BNS की धारा 227 के… pic.twitter.com/xksFYaNisw
ऐसे में सवाल उठता है कि एक आम नागरिक, सामान्य मतदाता को कैसे समझ में आए कि आखिर कौन झूठ बोल रहा है और किसने सच कहा है? जहाँ तक चुनाव आयोग की बात है, तो उस पर आरोप लगाए जाने की बात कोई नई नहीं है। कभी फर्जी मतदान कराने के आरोप, तो कभी मतदाता सूचियों में गड़बड़ी के आरोप। कभी ईवीएम में छेड़छाड़ से जुड़ी चीख-पुकार, तो कभी चुनाव अधिकारियों के कथित पक्षपाती रवैये की बातें। हर बार, खासकर चुनाव हारने वाले दल ऐसे आरोप लगाते रहे हैं। कभी-कभी तो मामला शीर्ष अदालत तक भी पहुँच जाता है। लेकिन भारत के निर्वाचन आयोग के खिलाफ आज तक कोई आरोप साबित नहीं हो सका है।
वहीं, दूसरी तरफ राहुल गाँधी हैं। बीते दो दशक से भी अधिक समय से वह राजनीति में सक्रिय हैं। इसके बावजूद वह गम्भीर तथा विश्वसनीय नेता की छवि नहीं बना सके हैं। इसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला- वह लगातार ‘मारो और भागो’ वाली रणनीति को अपनाते हुए सार्वजनिक मुद्दे उठाते हैं। यानि आरोप लगाते हैं। कुछ आधे-अधूरे तथ्य भी पेश करते हैं। लेकिन किसी मसले को उसके अंजाम तक नहीं ले जाते। ऐसा सन्देश देते हैं, जैसे सिर्फ ‘आरोप लगाना उनका काम है, अब प्रतिद्वन्द्वी जवाब दे तो देता रहे’। दूसरा- वह अब भी ‘मौसमी राजनीति’ करते दिखते हैं। मतलब, जैसे ही कोई चुनाव या संसद सत्र आया, तो नए-पुराने आरोपों की पोटली खोल दी। उससे माहौल को हंगामाखेज बनाया और आगे बढ़ चले। यहाँ तक कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के जैसा गरिमामय पद हासिल करने के बाद भी राहुल ने राजनीति की यही शैली अपना रखी है। फिर चाहे संसद के भीतर हो, या बाहर।
उनकी इसी शैली के कारण उच्चतम न्यायालय ने भी उन पर चार रोज पहले एक तीखी टिप्पणी की थी। वहाँ 2020 के भारत-चीन संघर्ष के समय के एक मामले में सुनवाई थी। उस दौरान राहुल गाँधी ने आरोप लगाया था कि चीन ने भारत की दो हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा किया है। उनके इस बयान के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया गया। उस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राहुल से पूछा, “आपको कैसे पता कि चीन ने दो हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है? आपके पास कोई विश्वसनीय सामग्री (तथ्य, सबूत, आदि) है? कोई भी सच्चा भारतीय ऐसी बात नहीं कहेगा, खासकर जब सीमाओं पर संघर्ष चल रहा हो? आप यही सवाल संसद में क्यों नहीं पूछते?” बिल्कुल, यही सवाल आम नागरिक के मन में भी हैं।
राहुल गाँधी विश्वसनीय तरीके से सरकार या सत्ताधारी दल के खिलाफ मोर्चा क्यों नहीं खोलते? संसद या न्यायपालिका जैसे मंचाें पर पुख्ता सबूतों, तथ्यों और आँकड़ों के साथ सीधे वैधानिक-संवैधानिक लड़ाई क्यों नहीं लड़ते? किसी मसले को उसके अंजाम तक क्यों नहीं पहुँचाते? वह हमेशा ‘मारो और भागो’ वाले अन्दाज में क्यों रहते हैं? क्या उन्हें देश की किसी संवैधानिक संस्था पर भरोसा नहीं है? उस संसद पर भी नहीं, जहाँ के निचले सदन लोकसभा में वह पूरे विपक्ष के नेता कहलाते हैं? राहुल गाँधी को इन सवालों पर विचार करना चाहिए। हो सके, तो लोगों को जवाब देना चाहिए। और अगर वह वाकई देश का नेतृत्त्व करने के लिए खुद को पेश करने की इच्छा रखते हैं, तो उन्हें अपनी शैली बदलने और विश्वसनीयता के साथ राजनीति करने पर ध्यान देना चाहिए।
चुनाव आयोग ने वोट-चोरी के आरोपों के मामले में शपथ-पत्र पर दस्तखत करने का जो प्रस्ताव दिया है, उसे मान लेना विश्वसनीय राजनीति की तरफ राहुल गाँधी का पहला कदम हो सकता है। क्योंकि अगर राहुल गाँधी अगर सच कह रहे हैं, तो यह वाकई गम्भीर मामला है। लेकिन अगर राहुल झूठ बोल रहे हैं, तो यह बहुत ही गम्भीर है क्योंकि इस तरह वह संवैधानिक संस्थाओं के प्रति आम जनता में अविश्वास भर रहे हैं।
