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भारत पर अमेरिका का 50 फीसद सीमा शुल्क भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद कैसे?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

अमेरिका-यूरोप के प्रभुत्व वाली विश्व व्यवस्था का दरकने की गति बढ़ती जा रही है। अमेरिका ने चीन के बाद भारत से आयात होने वाले सामान पर टैरिफ (सीमा शुल्क, आदि) की झड़ी लगा दी है। चीन ने टैरिफ पर जवाबी कार्रवाई की तो अमेरिका पीछे हटा, लेकिन भारत के पास चीन जैसी ताकत नहीं है। फिर भी अमेरिकी टैरिफ हमें वह रणनीतिक स्वतंत्रता दे सकते हैं जिससे हम दुनिया से अपनी शर्तें, हित और मूल्यों पर कारोबार कर सकें।

डायरी के इन पन्नों में हमने बदलती विश्व-व्यवस्था पर नजर रखी है। वर्तमान की बात करें तो अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी वर्चस्व को बचाए रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। तूफान में डूबते जहाज को बचाने की जद्दोजहद में लगे किसी कैप्टन की तरह वह जहाज से माल-असबाब सागर में गिरा रहे हैं। अमेरिका अपने गठबंधन के साथी, सम और प्रतिद्वंद्वी सबको गिरा रहा है। उसका विचार तूफान गुजर जाने तक जहाज को तैरते रखने का है, ताकि मौसम सुधरते ही जहाज अपना अजीमोशान सफर फिर से शुरू कर सके। लेकिन यह सब अब दूर की कौड़ी ही लगता है। तमाम सुख-उत्पाद, सुविधा और सुरक्षा भोगने वाले अमेरिका-यूरोप के नागरिकों को भारी कमी और समस्याओं से रूबरू होना अवश्यंभावी लगता है। 

लगभग एक सदी के वर्चस्वकाल में डॉलर की दबंगई से नोट छापने का उसका असर दुनिया की दूसरी मुद्राओं पर डाल कर मौजमस्ती मारने वाले अर्थतंत्र का चक्र अब पूरा हो चुका है। इस तंत्र में उसके अनुगत यूरोपीय देशों का स्वर्णकाल भी अवसान की ओर अग्रसर है। तो कठोर परिश्रम, तकनीकी और कुशल रणनीतिक कदम के साथ मजबूत उत्पादन केन्द्र के रूप में उभरा चीन विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में अभिषिक्त होने के लिए तैयार है। दुनिया के ज्यादातर विकासशील देश चीन के साथ हैं। वहीं अमेरिकी गठजोड़ के पश्चिमी श्वेत ईसाई देश भी (अमेरिकी आत्मरक्षा और विशुद्ध स्वार्थ केंद्रित नीति के चलते ) चीन के साथ चलने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं।

जैसे कि पहले कहा गया है, यह समय भारत के लिए बड़ा अवसर है, अपने मूल्य, नीति और हितों के अनुसार सम्बन्ध बनाने का। यद्यपि इसमें एक ऐतिहासिक समस्या है। स्वतंत्रता के बाद जारी औपनिवेशिक सोच ने भारतीय नीति निर्धारकों को कुछ खास कमजोरियाँ विरासत में रख छोड़ी हैं। हम भले न भी चाहें, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के नियम हमें औपनिवेशिक सोच से दूरी बनाने को बाध्य करेंगे। पुराने औपनिवेशिक विचार अप्रासंगिक, आर्थिक-व्यवसायिक दृष्टि से नुकसानदेह सिद्ध हो जाएँगे। यदि भारत आगे बढ़कर सकारात्मक रूप से ये बदलाव करेगा तो इसके परिणाम अलग दर्जे के मिलेंगे।

1. भारतीय शासन अपनी सभ्यता की सुदीर्घ परम्परा को नजरअन्दाज कर संकीर्ण और विघटित कालखण्ड में देखने की आदत से मजबूर है। इसके चलते हम भारतीय मूल्य और तदनुरूप नीति नहीं बना पा रहे। स्वत्व के अभाव और आयातित शिक्षा के प्रभाव में हमारे नीति निर्धारक रूस, अमेरिका या किसी का पल्ला पकड़ कर चलना ही समझदारी समझते हैं।

2. भारतीय सरकारी, न्यायिक और राजनयिक तंत्र भ्रष्ट औपनिवेशिकाल का विस्तार है। इसलिए चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि के सामने हम साभ्यतिक मूल्यों पर आत्मविश्वास शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के रूप खड़े होने के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं। स्वंतत्र भारत के इतिहास में एस जयशंकर पहले ऐसे विदेश मंत्री हैं, जो अपने वक्तव्यों में साभ्यतिक मूल्य और परम्पराओं की बात करते है। दुर्भाग्य की बात यह है कि सामाजिक, पारिवारिक शैक्षणिक स्तर पर हम ठोस स्तर पर अपने मूल्यों को स्थापित नहीं कर पाए हैं। वर्ष 2014 के बाद से सरकार द्वारा किए गए प्रयास विविध राजनीति, न्यायपालिका और अफसरशाही के प्रभाव में सीमित, उथले और अप्रभावी रहे हैं।

3. भारतीय साभ्यतिक सोच के अभाव में पनपे बौद्धिक बचकानेपन की वजह से हम चीन, पाकिस्तान सहित पड़ोसी देशों के साथ सम्यक व्यावहारिक सम्बन्ध नहीं बना पाए। प्रथम प्रधानमंत्री एक महान विश्व नेता के दम्भ में चीन के साथ सम्बन्धों में अफलातून हवाई किले बनाते रहे, और तिब्बत के मसले पर चीन से सीधे बात नहीं रखी। वहीं अमेरिका भारत से तिब्बत में अपनी कारस्तानियाँ कराता रहा। चीन ने 1962 में जब भारत पर आक्रमण कर उसका स्थान दिखाया ताे हमने चीन को शत्रु के देखना शुरू कर दिया। कोई यह क्यों नहीं देखता कि हम अपने पड़ोसियाें का चयन करने को स्वतंत्र नहीं। और यह कि चीन को भारत के साथ ऐसी कोई ग्रन्थि क्यों नहीं? कारण साफ है कि चीन अपने सामाजिक नैतिक, मूल्य आधारित विकास को लेकर कार्य कर रहा है इसमें वह भारत को वही स्थान देता है जो उसके हित के अनुसार ठीक बैठता है।

4. उभरती एशियाई विश्व शक्ति चीन की प्रभुत्व को लेकर संकल्पना श्वेत अब्राहिमी अमेरिकी के विचार से बेहद अलग है। चीन के इतिहास को देखें तो उसकी ताकत बेहतर तकनीकी, उत्पाद और परिश्रम रहा है। अमेरिकी और यूरोपीय ताकतों का बल सैन्य गतिविधियाँ, भ्रामक शोषक सन्धियाँ रही है। भारत को चीन से कुढ़ने की जरूरत नहीं हमें चीन से सीखना होगा कि कैसे हम अपने नीति मूल्यों पर आगे बढ़कर हितों का विस्तार कर सकते हैं। विश्वगुरु बनने के दिवास्वप्न की जगह एक अच्छा शिष्य बनने की आवश्यकता है।

5. भारतीय नीति निर्माता अब तक दोराहे पर खड़े थे। वे अमेरिका के खेल में चीन के प्रतिद्वंद्वी जैसी भूमिका निभाकर आगे बढ़ना चाहते थे। यह बेहद उथली सोच साबित हुई। सो अब भारतवासियों को ट्रम्प का शुक्रगुजार होना चाहिए कि आसमानी अमेरिकी टैरिफ से उन्होंने अनचाहे ही सही, सरकार को अपने हित की दृष्टि से सोचने के लिए मजबूर किया है। स्थिति की खूबसूरती यह है कि इस बदलाव की वेला में हम वे सब निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र रहेंगे जो कि पहले कभी सम्भव नहीं थे।

6. भारत के लिए साभ्यतिक दृष्टि से अपने हितों का विचार एक बहुत अहम और रचनात्मक क्रान्ति का कदम होगा। इसका अर्थ है हमें सैन्य और तकनीकी के विषय में सबसे आगे रहना होगा ही, भारतीय परिवेश अपने धार्मिक-आध्यात्मिक नैतिक और सामाजिक मूल्यों के अनुरूप कृषि-वाणिज्य, उद्योग, ऊर्जा और सुरक्षा नीति को बनाना होगा।

7. कृषि और मूलभूत आवश्यकताओं वाले क्षेत्रों में मानव परिश्रम आधारित नीति लानी होगी और श्रम को आर्थिक रूप से लाभप्रद बनाकर उसकी महत्ता को स्थापित करना होगा।

8. जैव संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा के साथ टिकाऊ विकास को लाना होगा। जल, भूमि, वन और ऊर्जा के दुरुपयोग वाली जीवन शैली वाले विकास को कठोरता से रोकना होगा। नैतिक और सम्यक मनोरंजन विषयक नीति बनानी होगी। 

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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।) 

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