निकेश जैन, इन्दौर मध्य प्रदेश
आज, 29 अगस्त को ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ होता है। ‘हॉकी के जादूगर’ मेजर ध्यानचंद की याद में यह आयोजन होता है, जिन्होंने अपने दौर में दुनिया के करोड़ों लोगों को अपनी हॉकी के जादू से मंत्रमुग्ध कर रखा था। उनके जैसे लोगों की वजह से ही हॉकी भारत का ‘राष्ट्रीय खेल’ बना। विश्व में देश का मान बढ़ा। कितना बेहतर होता कि लोग उनके जैसी हस्तियों से प्रेरणा लेते और ऐसे ही खेलों में कुछ कर गुजरते, ताकि उनका खुद का सम्मान बढ़ता और देश की प्रतिष्ठा भी। लेकिन वास्तव में आज हो क्या रहा है?
दो लाख डेवलपर्स ऐसे ‘रियल मनी’ गेम्स बनाने में लगे थे, जिन्होंने 47 करोड़ लोगों को अपने ‘मायाजाल’ में फँसाकर लती बना दिया था। अगर विभिन्न लेखों में प्रकाशित ये आँकड़े सही हैं, तो बहुत भयावह हैं। सोचिए, दो लाख डेवलपर्स, जो निश्चित रूप से बहुत ही काबिल होंगे। तेज दिमाग वाले, प्रतिभाशाली होंगे। मगर वे कर क्या रहे थे? अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल ऐसे ‘खेल’ बनाने में कर रहे थे, जिनकी लोगों को लत लग जाए। वे उसमें फँस जाएँ और पैसे कमाने के चक्कर में अपना बहुत कुछ, सब कुछ गँवाते रहें।
हाँ, यही सच्चाई है। क्योंकि पहली बात तो यह है कि इस तरह के ‘रियल मनी’ गेम्स बनाना आसान काम नहीं है। इन्हें बनाने के लिए बहुत तीक्ष्ण कौशल की जरूरत होती है। तो इसका मतलब यही हुआ न कि हमारे देश के तीक्ष्ण कौशल और तेज मस्तिष्क वाले दो लाख लोग ऐसे खेलों को खिलाने में उलझे हुए थे, जो समाज के लिए कतई अच्छे नहीं कहे जा सकते? मतलब तनिक से आर्थिक लाभ के लिए ये प्रतिभाएँ खुद को भी बर्बाद कर रही थीं और दूसरों को भी। क्योंकि दूसरी बात यह भी है कि वे 47 करोड़ लोग भी बर्बाद ही हो रहे थे, जिन्हें इन खेलों की लत लग चुकी थी। कारण कि इन खेलों से पैसे कमाने वाले चन्द और गँवाने वाले करोड़ों में थे।
इसीलिए अचरज की बात नहीं कि भारत सरकार ने ऐसे ‘रियल मनी’ गेम्स पर प्रतिबन्ध लगा दिया। लेकिन फिर भी जरा सोचिए कि ऐसे गेम्स बनाने वाले यही हुनरमन्द लोग अगर अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल ‘व्हाट्स ऐप’ जैसा कोई प्लेटफॉर्म बनाने में लगाते तो? या कोई स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म बनाने में? अगर ऐसा हो पाता ताे निश्चित रूप से भारत आज इन क्षेत्रों के वैश्विक खिलाड़ियों (फेसबुक, इंस्टग्राम, व्हाट्स ऐप, आदि की मालिक कम्पनियाँ) को चुनौती देने की स्थिति में हो सकता था। इससे देश का रुतबा और बढ़ जाता।
मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है। बावजूद इसके कि सॉफ्टवेयर क्षेत्र में तमाम अवसर अब भी उपयुक्त लोगों की बाट जोह रहे हैं। कई समस्याओं को समुचित समाधान की प्रतीक्षा है। मैं खुद जिन लोगों को अपनी कम्पनी के बैनर तले सेवाएँ देता हूँ, वे अक्सर कर्मचारियों को अधिक से अधिक जोड़े रखने के विषय में सवाल करते हैं। इसे देखते हुए हम अपने प्लेटफॉर्म पर शिक्षण-प्रशिक्षण सामग्री की सुविधा के साथ कुछ मनोरंजक खेल जैसी सुविधाएँ भी जोड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, मैं तो उन लोगों का स्वागत करने को भी तैयार बैठा हूँ, जाे अपना गेमिंग प्लेटफॉर्म हमारे साथ जोड़ने की इच्छा जताना चाहें। हमारे साथ मिलकर काम करना चाहें।
मेरा आग्रह है कि हमें ऐसा निर्माण करना चाहिए, जो देश, समाज पर सकारात्मक असर छोड़े। जो अपनी विशिष्टता से जाना जाए, बेवजह हल्ला-गुल्ला से नही। सच मानिए, यदि हम ऐसा कुछ कर सके, तो ही मेजर ध्यानचंद जैसी हस्तियों की विरासत को सही मायने में सँभालने वाले कहला पाएँगे। यही हमारी उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी। अन्यथा ‘खेल दिवस’ जैसे आयोजन तो हर साल होते हैं।
सहमत हैं या नहीं?
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(नोट : निकेश का यह लेख कुछ सामयिक और प्रासंगिक संशोधनों के साथ लिया गया है, ताकि यह पढ़ने में ‘रोचक-साेचक’ तो रहे ही, ‘सरोकार’ से भरा सार्थक सन्देश भी अधिक गहराई के साथ लोगों तक पहुँचाने में सक्षम हो सके।)
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निकेश का मूल लेख
𝟮 𝗟𝗮𝗸𝗵 𝗱𝗲𝘃𝗲𝗹𝗼𝗽𝗲𝗿𝘀 𝘄𝗲𝗿𝗲 𝗱𝗲𝘃𝗲𝗹𝗼𝗽𝗶𝗻𝗴 𝗿𝗲𝗮𝗹 𝗺𝗼𝗻𝗲𝘆 𝗴𝗮𝗺𝗲𝘀 𝗮𝗻𝗱 𝟰𝟳 𝗖𝗿𝗼𝗿𝗲 𝗽𝗲𝗼𝗽𝗹𝗲 𝘄𝗲𝗿𝗲 𝗽𝗹𝗮𝘆𝗶𝗻𝗴 𝘁𝗵𝗲𝗺!!!
If the numbers published in various articles are true then both the numbers are scary to say the least…..
2L smart developers were creating something so people get hooked or get addicted to it🤦♂️
Developing games in not easy – games require quick response time so programming them requires sharp skills.
So first we are wasting 2 Lakh sharp brains to develop something that is not right for the society.
And then we have 47 crore people (including youth and kids) playing these games to earn (mostly to lose) money….
No wonder Indian government banned it.
Just imagine if these 2L developers start building something useful using their coding skills – it could be a “𝗪𝗵𝗮𝘁𝘀𝗔𝗽𝗽” 𝗹𝗶𝗸𝗲 𝗮𝗽𝗽 𝘄𝗶𝘁𝗵 𝘀𝗼𝗺𝗲 𝘀𝗼𝗰𝗶𝗮𝗹 𝗴𝗮𝗺𝗲 𝗳𝗹𝗮𝘃𝗼𝗿; it could be a 𝘀𝘁𝗿𝗲𝗮𝗺𝗶𝗻𝗴 𝗽𝗹𝗮𝘁𝗳𝗼𝗿𝗺; it could be a 𝗕𝟮𝗕 𝘀𝗼𝗳𝘁𝘄𝗮𝗿𝗲 𝘄𝗶𝘁𝗵 𝗴𝗮𝗺𝗲 𝗹𝗶𝗸𝗲 𝗲𝗻𝗴𝗮𝗴𝗲𝗺𝗲𝗻𝘁!
There are so many opportunities and problems (in software) which are still not solved properly.
My clients always talk about employee engagement. We are building gamification features in the platform just to increase engagement. There are plenty of such software both in B2B and B2C space which can benefit from game like features!
I would be interested if someone wanted to integrate their gaming platform with learning content.
Let’s build things to make positive impact – why add to the noise when we can build what matters!
Agree?
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(निकेश जैन, कॉरपोरेट प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी- एड्यूरिगो टेक्नोलॉजी के सह-संस्थापक हैं। उनकी अनुमति से उनका यह लेख अपेक्षित संशोधनों और भाषायी बदलावों के साथ #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। मूल रूप से अंग्रेजी में उन्होंने इसे लिंक्डइन पर लिखा है।)
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