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एक भावना, एक पत्र ‘रजिस्टर्ड डाक’ के नाम…जो सिर्फ चिट्ठी नहीं, आत्मा का दस्तावेज थी!

पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

आगामी एक सितम्बर को भारतीय डाक की ‘रजिस्टर्ड सेवा’ औपचारिक रूप से समाप्त कर दी जाएगी। यह समाचार जितना सामान्य प्रतीत होता है, उतना है नहीं। बल्कि यह गहरा असर छोड़ने वाला है उस पीढ़ी पर, जिन्होंने वर्षों तक डाकिए की साइकिल की घण्टी सुनकर अपने दिन की शुरुआत की। जिन्होंने पत्रों के माध्यम से रिश्तों को जिया और डाकघर की कतारों में खड़े होकर घण्टों प्रतीक्षा की।

‘रजिस्टर्ड डाक’ कोई साधारण सेवा नहीं थी। यह उन दिनों की गवाही थी, जब हम कागज पर स्याही से जज्बातों को उकेरा करते थे। जब एक लिफाफे में कई अनकही बातें, लम्बा इंतजार और अनगिनत भावनाएँ समाहित होती थीं। जब एक पत्र, चाहे वह परिवार के किसी सदस्य का हो या सरकारी दस्तावेज, केवल कागज का टुकड़ा नहीं होता था, बल्कि विश्वास का प्रतीक होता था, कि वह जरूर पहुँचेगा, सही हाथों में, सही समय पर।

‘रजिस्टर्ड डाक सेवा’ वह सेतु थी, जो गाँव को शहर से,और नागरिक को शासन से जोड़ती थी। वह न केवल संवाद का माध्यम थी, बल्कि सम्बन्धों को सुरक्षित रखने वाली प्रहरी भी थी। उसकी विशेषता यह थी कि वह गुम नहीं होती नहीं थी, भटकती नहीं थी। उसका पंजीकरण उसकी सुरक्षा थी, और उसकी प्राप्ति की पावती एक तरह का भावनात्मक संतोष।लेकिन ‘भारतीय डाक’ द्वारा ‘रजिस्टर्ड डाक’ को औपचारिक रूप से बन्द करने तथा उसे ‘स्पीड पोस्ट’ में समाहित करने का निर्णय भावनात्मक रूप से कई लोगों के लिए बहुत पीड़ादायक है। क्योंकि ‘रजिस्टर्ड डाक’ केवल चिट्ठी नहीं थी, आत्मा का दस्तावेज थी। हालाँकि अब जब वह विदा ले रही है, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि हमारी विरासत का पन्ना बन्द होने जैसा है। तो उससे पहले एक पत्र उसके नाम…

प्रिय रजिस्टर्ड डाक

तुमने केवल पत्र नहीं पहुँचाए, तुमने रिश्ते पहुँचाए। तुमने हमें जोड़ना और जुड़ना सिखाया। शब्दों से, भावनाओं से, प्रतीक्षा से, और विश्वास से। तुम भले ही अब औपचारिक रूप से बन्द हो जाओ, परन्तु हमारी यादों में, हमारे पुराने सन्दूक़ों में, हमारे दिलों में तुम सदा जीवित रहोगी। आज जब हम तुम्हें विदाई दे रहे हैं, तो यह विदाई नहीं, एक प्रणाम है उस युग को, उस सादगी को, उस धैर्य को, उस अपनेपन को, जिसे तुमने वर्षों तक अपने कन्धों पर उठाए रखा। अब भले ही डाकघर बदल जाएँ, डाकिए डिजिटल हो जाएँ, पत्र इतिहास बन जाएँ, परन्तु तुम हमारे लिए, हमारे दिलों में, हमारी स्मृतियों में  सदा अस्तित्त्व में रहोगी। 

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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।) 

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