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आरएसएस के 100 वर्ष : यह नहीं कह सकते कि जो कांग्रेस में नहीं था, वह देशभक्त नहीं था!

अनुज राज पाठक, दिल्ली

सन् 1965 की बात है। पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया था। हमारे देश के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी ने इस विकट परिस्थिति से निपटने में भारत की क्या कार्ययोजना हो, इस हेतु विचार-विमर्श के लिए सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन किया। ऐसे सर्वदलीय आयोजनों में प्रायः केवल राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि ही भाग लेते हैं या फिर उन्हें ही आमंत्रण मिलता है। परन्तु प्रधानमंत्री जी ने तत्कालीन संघ प्रमुख श्री गुरुजी को भी निमंत्रित किया। गुरुजी उस समय महाराष्ट्र के दौरे पर थे। उसे वह बीच में छोड़कर सम्मेलन में शामिल होने को दिल्ली आए।

सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री जी से एक प्रतिनिधि बार-बार सेना के सन्दर्भ में बात करते हुए उसे ‘आपकी सेना’ कहकर सम्बोधित कर रहे थे। श्री गुरुजी कुछ देर तो सुनते रहे, फिर उन्हें टोकते हुए बोले, “आप ‘हमारी सेना’ कहिए। भारत की सेना हम सबकी, हमारी अपनी है। उसके प्रति हमारी आत्मीयता होनी चाहिए।” भारत-पाकिस्तान के बीच वह युद्ध 22 दिन चला। उस दौरान दिल्ली की पूरी यातायात व्यवस्था का जिम्मा संघ के स्वयंसेवकों के जिम्मे रहा, ताकि पुलिस अन्य सुरक्षा कार्यों का निर्वाह कर सके। यही नहीं, अपने स्वाभाविक सेवाभाव के अनुसार सेना के अफसरों से सूचना पाते ही दिल्ली के सैनिक अस्पताल में 500 से अधिक स्वयंसेवक रक्तदान के लिए भी उपस्थित रहे।

आज संघ अर्थात् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बन्धित ये प्रसंग सुनाने का विशेष अवसर यह है कि इसी माह की 27 की तारीख को 100 वर्ष पहले, 1925 में डॉ हेडगेवार जी द्वारा संघ की नींव  रखी गई थी। इस अवसर को ध्यान में रखते हुए हम संघ के कार्यों पर, चाहे वे राजनैतिक हों या सामाजिक, सांस्कृतिक हों या आर्थिक, चर्चा करेंगे। क्योंकि संघ के विषय में समाज में अनेक धारणाएँ और भ्रान्तियाँ हैं। इस चर्चा के माध्यम से उन्हें दूर करने का प्रयास रहेगा। कारण कि संघ के बारे में राय बनाते समय हमें पुख्ता तथ्यों पर विचार करना आवश्यक है। इसलिए कि संघ अपनी स्थापना के समय से ही देश के राजनैतिक परिदृश्य में स्वयं गैरराजनैतिक होते हुए भी हमेशा प्रभावकारी रहा है। 

यद्यपि संघ की पृष्ठभूमि जानने से पहले इसके संस्थापक डॉ हेडगेवार जी के जीवन के कुछ प्रसंगों को जानना समीचीन होगा। डॉ हेडगेवार बाल्यकाल से ही सामाजिक जीवन से जुड़े रहे। देश जब स्वतंत्रता के लिए आन्दोलित था। कई छोटे-बड़े संगठन देश की स्वतंत्रता हेतु अपनी सामर्थ्य और विचारसारणी अनुसार प्रयास कर रहे थे। उसी दौर में महाराष्ट्र में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक सर्वमान्य राष्ट्रवादी नेता के तौर स्थापित हो चुके थे। उनके ‘केसरी’ पत्र को पढ़कर बड़े ही क्या, बच्चे भी स्वतंत्रता आन्दोलन में उत्साह से भाग ले रहे थे। उन्हीं में एक हेडगेवार भी थे।

कुछ लोग स्वतंत्रता आंदोलन में संघ और डॉ हेडगेवार की भूमिका पर अक्सर प्रश्न खड़ा करते हैं। तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि प्रत्येक व्यक्ति विविध कार्यों में अपने-अपने अनुरूप भूमिकाएँ निभाता है। इस दृष्टि से देखने पर ज्ञात होता है कि डॉक्टर साहब अन्य बहुसंख्यक युवाओं की तरह देशभक्ति के भाव हृदय में समेटे हुए थे। उन्होंने भी अपने बाल्यकाल और युवावस्था में अपने समाज के नेतृत्त्वकर्ता व्यक्तियों के सान्निध्य में देशसेवा का कार्य किया। साथ ही अपनी व्यक्तिगत वैचारिकी को भी पुष्ट किया। उस समय पूरे देश में बहुत से संगठन कार्य कर रहे थे। यद्यपि ये माना जा सकता है कि कांग्रेस एक देशव्यापी संगठन अवश्य था, जिसे स्वतंत्रता आन्दोलन के नेतृत्त्व का अवसर भी इसी नाते मिला। मगर इससे यह नहीं कह सकते कि जो कांग्रेस में नहीं था, वह देशभक्त नहीं था।

हम अनगिनत ऐसे क्रान्तिकारियों के नाम तक नहीं जानते, जिनके बलिदानों के फलस्वरूप हमें स्वतंत्रता मिली है। जो किसी भी संगठन से जुड़े नहीं रहे, परन्तु छोटे-छोटे समूहों में अपनी सामर्थ्य के अनुसार देश सेवा का कार्य करते रहे। उन्होंने भी देश के लिए बलिदान दिए। ऐसी ही देशभक्ति की भावना से डॉ हेडगेवार भी प्रेरित रहे। उन्होंने विद्यालयीन जीवन में डॉ पांडुरंग राव खानखोजे के स्वदेश-बान्धव समूह से जुड़कर उसकी गतिविधियों में भाग लिया। आगे चलकर अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान कलकत्ता में श्री पुलिन बिहारीदास की ‘अनुशीलन समिति’ से जुड़े। प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने पर तत्कालीन ब्रिटिशभारत सरकार की और से रणक्षेत्र में डॉक्टर्स की भर्ती शुरू हुई।  उसमें हेडगेवार जी ने चिकित्सक का व्यवहारिक अनुभव अर्जित करने के उद्देश्य से अपना नाम लिखवाया। लेकिन सरकार की प्रतिबन्धित क्रान्तिकारियों की सूची में नाम शामिल होने के कारण उन्हें यह अवसर नहीं दिया गया।

आगे चलकर डॉक्टर हेडगेवार जी कांग्रेस से भी जुड़े। सन् 1920 के कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के दौरान वह व्यवस्था आदि कार्यों से जुड़े रहे। लेकिन इसी अधिवेशन से डॉक्टर हेडगेवार को एक नई दिशा भी मिली। कांग्रेस अधिवेशन के दौरान अखिल भारतीय कार्यसमिति की एक विशेष घटना ने डॉक्टर साहब की विचारसरिणी को बदलकर रख दिया। आगे फिर उसी के फलस्वरूप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना भी हुई।

वह घटना क्या थी? और उसके आगे क्या हुआ? जानेंगे अगली कड़ी में….

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