Sanskrit Sambhashanam

आज एआई और मशीन लर्निंग के दौर में संस्कृत भाषा फिर से चर्चा में क्यों है?

रोहिणी जैन, टीकमगढ़ मध्य प्रदेश

आज जब विश्व अगले चरण की औद्योगिक क्रान्ति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग के दौर में प्रवेश कर चुका है, तब संस्कृत के महत्त्व पर नए सिरे से चर्चा हो रही है। अभी हाल ही में ‘संस्कृत भारती’ ने दिल्ली में इस बाबत एक आयोजन किया। इस संस्था ने 108 ‘संस्कृत संभाषणम्’ कार्यक्रमों की श्रृंखला चलाई। इनमें दो-दो घण्टे की कक्षाओं में लोगों को संस्कृत में बातचीत करना सिखाया गया। इस श्रृंखला के समापन कार्यक्रम में देश के गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हुए और उन्होंने संस्कृत के महत्त्व पर प्रकाश डाला।

तो सवाल हो सकता है कि आखिर ऐसी क्या बात है कि एआई और मशीन लर्निंग के दौर में विश्व की आदिभाषा संस्कृत एक बार फिर चर्चा में आ रही है? इसका सीधा जवाब है कि संस्कृत महज एक भाषा नहीं है। यह प्राचीन ज्ञान और भविष्य की तकनीक का सेतु है। संस्कृत ने हजारों-हजार वर्षों से ज्ञान, विज्ञान, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाई है। यह केवल भारत की ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की सबसे प्राचीन, सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक भाषाओं में से एक है। यह तथ्यात्मक रूप से सिद्ध है। 

संस्कृत भाषा मानव सभ्यता की एक अद्भुत धरोहर का नाम है। संस्कृत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी व्याकरणिक संरचना है। पाणिनि का अष्टाध्यायी व्याकरणिक दृष्टि से विश्व की सबसे सटीक और तार्किक रचना मानी जाती है। इसकी व्यवस्थित संरचना और नियमबद्धता इतनी अद्भुत है कि आधुनिक कंप्यूटर की कूट-भाषाओं के निर्माण में भी इसको आदर्श माना जा रहा है। जहाँ अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में शब्दों और वाक्यों के प्रयोग में अनेक असंगतियाँ देखने मिलती हैं, वहीं संस्कृत में एक प्रकार की पूर्ण स्पष्टता और तार्किकता है। इसीलिए जब विश्व में एआई और मशीन लर्निंग का दौर प्रारम्भ हुआ, तब अनेक शोधकर्ताओं ने पाया कि संस्कृत भाषा इन तकनीकों को समझने और विकसित करने के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकती है। इसलिए उन्होंने इसमें रुचि दिखाई। 

दरअसल, कंप्यूटर किसी भी भाषा को तब आसानी से समझ सकता है, जब उसमें अस्पष्टता न हो। और संस्कृत की विशेषता भी यही है कि इसमें प्रत्येक शब्द और वाक्य का एक निश्चित और स्पष्ट अर्थ होता है। यही कारण है कि कई शोध संस्थान संस्कृत को भविष्य की तकनीकी भाषा कह रहे हैं। जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन सहित विश्व के अनेक देशों के विश्वविद्यालय संस्कृत का गहन अध्ययन कर रहे हैं। जर्मनी के कम से कम 14 विश्वविद्यालयों में संस्कृत का पाठ्यक्रम चल रहा है। वहाँ संस्कृत को केवल धार्मिक या दार्शनिक दृष्टि से ही नहीं पढ़ाया जाता, बल्कि उसे आधुनिक विज्ञान और तकनीक की दृष्टि से भी महत्त्व दिया जाता है।

इससे स्पष्ट है कि दुनिया अब समझ रही है कि भविष्य की वैज्ञानिक प्रगति में संस्कृत की भूमिका निर्णायक हो सकती है। यह वैश्विक समझ भारत के लिए लाभप्रद है। संस्कृत का पुनर्जीवन भारत को ज्ञान और तकनीक की दिशा में विश्व का नेतृत्त्वकर्ता बना सकता है। यह भाषा हमारी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए आधुनिकता के साथ तालमेल बैठाने में सक्षम है। संस्कृत में न केवल प्राचीन भारत की आत्मा बसती है, बल्कि इसमें देश के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी भी है। यानि यह केवल हमारे अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य की सम्भावना भी है। यदि इसे विज्ञान और तकनीक का सेतु बनाया गया, तो यह भारत के स्वर्णिम भविष्य की आधारशिला बनेगी। 

———— 

(नोट : रोहिणी जैन टीकमगढ़, मध्य प्रदेश के समाजसेवी एवं राजनेता पवन जैन ‘घुवारा’ के परिवार की सदस्य हैं।) 

सोशल मीडिया पर शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *