दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश
मैं अपना हाल ए दिल कैसे बयाँ करूँ।
दर्द की भट्टी में वक्त-बेवक्त तपा करूँ।
मैं अपना हाल-ए-दिल कैसे बयाँ करूँ।
मौत को बस छूकर फिर से जिया करूँ।
जिंदगी से इसी हुनर का गुर लिया करूँ।
मैं अपना हाल-ए-दिल कैसे बयाँ करूँ।
मुश्किलों से दो-दो हाथ हर रोज़ किया करूँ।
बस यूँ ही आँधियों में चिराग रौशन किया करूँ।
मैं अपना हाल ए दिल कैसे बयाँ करूँ।
इतना सा ही फ़लसफ़ा है कि हँसता रहा करूँ।
हँसना असल हासिल है कि जी भर हँसा करूँ।
मैं अपना हाल ए दिल कैसे बयाँ करूँ।
लिखना कोई शय नहीं कि बस यूँ ही लिख दिया करूँ।
न सही साहित्य तो क्या, आप बीती कह लिया करूँ।
मैं अपना हाल-ए-दिल कैसे बयाँ करूँ।
मुझे शम्मा ना समझ कि बस बुझते-जलते रहा करूँ।
मैं तो आशिक हूँ ‘आवारा’ परवानों सा जलता रहा करूँ।
मैं अपना हाल-ए-दिल कैसे बयां करूँ।
– 8 सितम्बर 2025
#aawarakhayal #आवाराखयाल
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दीपक की पिछली कविताएँ
2- एक कविता…. “मैं लिखूँगा और लिखता रहूँगा”
1- पहलगााम आतंकी हमला : इस आतंक के ख़ात्मे के लिए तुम हथियार कब उठाओगे?
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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं से अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। कभी लेख तो कभी कविता की सूरत में। अपने लिखे हुए को #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा भी करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक पहुँचें। ये कविता भी उन्हीं प्रयासों का हिस्सा है।)
