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भांजी के नाम पत्र : जीवन की निर्ममता से पार पाने के लिए अपनी हँसी को बनाए रखना होगा

दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश

प्रिय गुल्लू

मैं तुम्हें यह पत्र तब लिख रहा हूँ, जब तुम समय के रथ पर सवार होकर जीवन के 21 वर्ष पूरे कर चुकी हो। यह पहली बार है, जब तुमने घर की चारदीवारी से बाहर कदम रखा है। यह तुम्हारे सपने की ओर तुम्हारा पहला कदम है। इस पत्र को पूरा लिखने में मुझसे थोड़ी देरी अवश्य हो गई है। लेकिन मेरा प्रेम और आशीर्वाद कभी भी तुम्हारे पास देर से नहीं पहुँचेगा। तुम्हारे 21वें जन्मदिन के ठीक एक सप्ताह बाद मैं यह पत्र तुम्हें लिख रहा हूँ। लेकिन तुम जानती हो कि हालिया दुर्घटना के बाद लिखना इन दिनों मेरे लिए थोड़ा कठिन हो चला है। बावजूद इसके सीधे हाथ की कुछ ही अँगलियों से मैं तुम्हें इस पत्र के बहाने अपनी कुछ भावनाएँ सम्प्रेषित कर रहा हूँ।

प्रिय गुल्लू

तुम्हें आज भी इस नाम से सम्बोधित करते हुए मुझे वो दिन याद आ जाता है, जब तुम्हें पहली बार गोद में लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। तुम्हारी तोतली जबान को अब मैं यज्ञा के बहाने फिर सुन पा रहा हूँ। तुम्हारे बचपन से लेकर अब तक तुम्हारे साथ हुई यात्राएँ मेरे भी जेहन में अब भी ताजा हैं। तुम्हें यूँ बड़ा होता देखकर अब सच में लगता है कि समय पंख लगाकर उड़ता है। तुमने अपने जीवन के प्रारम्भिक सबसे खूबसूरत 21 साल जी लिए हैं। अब तुम हमारे घर-आँगन से निकलकर असल दुनिया के मैदान में चौके-छक्के लगाने के लिए निकल चुकी हो। अपने मास्टर्स की पढ़ाई के लिए तुमने देश की राजधानी को चुना है। या यूँ कहें कि तुम्हें ही दिल्ली यूनिवर्सिटी ने चुन लिया है, तो भी गलत नहीं होगा। तुम्हें ढेर सारी बधाई, प्यार और आशीर्वाद।

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मेरी बच्ची

तुम्हें अब घर से बाहर निकलकर भविष्य में कई मुश्किलात का सामना करना पड़ेगा। तो जीवन में जो छूट गया है, उसका अफसोस कभी मत करना और वर्तमान को गढ़ने के लिए सदैव तत्पर रहना। भविष्य में क्या होगा और क्या नहीं, इसकी चिन्ता में अपना आज मत बर्बाद कर लेना। आज जो तुम्हारे सामने है, उसे हँसकर बेहतर ढंग से जी लेना ही सुखद है। मेरा मानना है कि बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए वर्तमान को गढ़ते रहना ही सबसे कारगर तरीका है। इसलिए अपने सपनों को पूरा करने के लिए समय के साथ ताल मिलाकर चलती रहना। हमेशा याद रखना कि कुदरत ने तुम्हारे अन्दर वो हर खूबी उड़ेली है, जिससे तुम अपने हर सपने को पूरा कर सकती हो। अब आगे तुम्हारे जीवन की डगर आसान नहीं होगी, लेकिन धैर्य, संयम, मेहनत और सच्ची लगन के साथ कुछ भी पाना असम्भव नहीं है।

प्रिय गुल्लू 

तुम्हारा यह लाड़ का नाम तुम्हें बचपन में तो बहुत पसन्द था। अब तुम्हें लोग आन्या और वंशिका के नाम से जानते हैं, लेकिन मेरे लिए तुम सदैव गुल्लू ही रहोगी। क्योंकि मेरे मुँह से अब भी ज्यादातर तुम्हारे लिए यही सम्बोधन निकलता है। इसलिए यह पत्र पढ़ते हुए तुम असहज मत महसूस करना। इस पत्र को लिखने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि जीवन की जिस डगर पर आज तुम चल रही हो, उस रास्ते से मैं सालों पहले गुजर चुका हूँ। इसलिए मेरा अनुभव तुम्हारे लिए मददगार साबित हो सकेगा। मैं यह मानता हूँ कि समय बहुत बदल चुका है। विज्ञान और तकनीक अब हमारे जीवन पर हावी हो चली है, इसने जीवन को बहुत आसान बना दिया है। लेकिन जीवन जीने के कुछ उसूल कभी नहीं बदल सकते हैं। मसलन कड़ी मेहनत, धैर्य, संयम और लगन का कोई पर्याय नहीं है। तुम्हें अपने सपने को हकीकत में बदलने के लिए आज भी इन्हीं अस्त्रों का प्रयोग करना पड़ेगा।

मेरी बच्ची

एक बात हमेशा याद रखना कि सपनों को पाने की राह में अपनी जड़ों को मत छोड़ देना। क्योंकि अपनी जड़ों से जुड़े रहने में ही पौधा हरियाता रहता है। अपनी जमीनी हकीकत को स्वीकारते हुए अपने प्रति पूरी ईमानदारी से जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश करना और हाँ अपनी सफलता के मानदण्ड तुम खुद ही तय करो। दुनिया लाख कहे कि सफलता का पैमाना जीवन में नाम, शोहरत और पैसा है, मैं इस बात से बिल्कुल भी इत्तेफाक नहीं रखता हूँ। मेरा मानना है कि हर व्यक्ति की सफलता की अपनी परिभाषा होनी चाहिए। मेरी नजर में तो स्वस्थ शरीर, मानसिक शान्ति और प्रेम से भरा हृदय ही असल सफल व्यक्ति की पहचान है। इसलिए समय की कसौटी पर खुद को कसते रहना और अपनी सफलता की परिभाषा खुद ही गढ़ना। किसी और के लिए सफल होने का कोई मतलब नहीं है। मैं यह अपने अनुभव से कह रहा हूँ।

प्रिय गुल्लू 

अब तुम इतनी बड़ी हो गई हो कि अपना भला और बुरा बेहतर जानती हो। तुम्हारी बेहतर परवरिश में हम सबने कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसलिए ये हमेशा याद रखना कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपने मूल्य और आदर्श खो देने का कोई मतलब नहीं है। सफलता के कई पैमाने हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत को कुचलकर झूठ, फरेब और बेईमानी से मिली दौलत, शोहरत कभी स्थाई नहीं हो सकती है। मैंने अपने पत्रकारिता के 15 वर्षों के पेशेवर जीवन में बहुत से ऐसे लोगों को अर्श से फर्श पर गिरते देखा है। इसलिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने में ही भलाई है। हम जितना अधिक सरल, सहज, सकारात्मकता, प्रेम और करुणा के भावों से भरे होंगे, उतना ही अधिक मनुष्यता की ओर बढ़ते चले जाएँगे।

मेरी बच्ची

एक बात हमेशा याद रखना कि तुम्हें जीवन की निर्ममता से पार पाने के लिए अपनी हँसी को सदैव बनाए रखना होगा। इसे कभी अपने चेहरे से ओझल मत होने देना, क्योंकि दुनिया में तुम्हारी हँसी से बेहतर कुछ भी नहीं है। जब भी जीवन में कोई मुश्किल आए, तो यह याद रखना कि हम जैसे कुछ लोग हैं, जिनके लिए तुम्हारी मुस्कान से ज्यादा जरूरी चीज सारी दुनिया में और कुछ भी नहीं है। जीवन के नए पथ पर चलने के लिए ईश्वर तुम्हें साहस, धैर्य और संयम प्रदान करें। ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद।

-तुम्हारा मामा

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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। उन उकेरी अनुभूतियों काे #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक भी पहुँचें। यह पत्र भी उन्हीं प्रयासों का हिस्सा है।) 

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