निकेश जैन, इन्दौर मध्य प्रदेश
क्या कभी किसी ने हमें-आपको बताया कि सिकन्दर को भारत की सीमा के भीतर अपने आधिपत्य का विस्तार करने से वास्तव में चाणक्य ने रोका था? हमारी किताबें सिकन्दर की उपलब्धियों को बढ़-चढ़कर बताती हैं। उसका खूब यशोगान करती हैं। लेकिन उनमें चाणक्य के बारे में कम ही जानकारी मिलती है और न ही इस पर चर्चा की जाती है कि उन्होंने समूचे भारतवर्ष को किस तरह एकसूत्र में पिरोया। चाणक्य के लिए उत्तर में हिमालय से दक्षिण में समुद्र तट तक पूरा भारतवर्ष एक था, भले भारतभूमि पर कई गणराज्यों का शासन रहा हो।
चाणक्य के समय में गणराज्यों की व्यवस्था वैसी ही थी, जैसे कि आज पूरा भारतवर्ष कई प्रदेशों में बँटा हुआ है। बस, उस वक्त का हर प्रान्त अपने आप में स्वतंत्र था। चाणक्य खुद पाटलिपुत्र (आज का पटना) के रहने वाले थे। मगर वह पढ़ाई करने के लिए तक्षशिला गए। उस वक्त तक्षशिला में सबसे बड़ा विश्वविद्यालय होता था। आज वह क्षेत्र पाकिस्तान में है। चाणक्य उच्च शिक्षा प्राप्त कर वहीं पढ़ाने लगे। शिक्षक हो गए।
तक्षशिला तब भारत का संवेदनशली सीमावर्ती इलाका था। भारत पर अधिकांश विदेशी हमले उसी तरफ से होते थे। मतलब पूरा देश गणराज्यों में बँटा हुआ और सीमाई क्षेत्र कमजोर। इसी को देखते हुए सिकन्दर भी भारत पर आधिपत्य जमाने की गरज के साथ अपनी सेना को लेकर आगे बढ़ा। चाणक्य को जब यह पता चला, तो वे चिन्तित हो उठे। उन्होंने देश के तमाम राजाओं को एकजुट करने का प्रयास शुरू कर दिया।
हालाँकि उनके प्रयासों और विचार का उस समय के कुछ राजाओं ने आदर किया, उससे सहमति जताई। लेकिन कई राजाओं ने उनकी अनसुनी ही की। कुछ ने उनका तिरस्कार तक कर दिया। लेकिन चाणक्य अपने अभियान में लगे रहे। उन्हें सिकन्दर नामक सुनामी की भयावहता का एहसास हो चुका था। वे समझ गए थे कि अगर इस सुनामी को न रोका गया तो समूचा भारतवर्ष तबाह हो जाएगा। इसलिए उन्होंने खुद ही उस सुनामी को रोकने का बीड़ा उठाया और अपने शिष्य चन्द्रगुप्त की अगुवाई अपनी ही एक अलग फौज बनाने लगे।
गणराज्यों को एकजुट करने का अभियान भी उन्होंने नहीं छोड़ा और इस उद्देश्य से उन्होंने मगध (आज का बिहार और उसके आस-पास का इलाका) का रुख किया। उस समय मगध एक शक्तिशाली राज्य था। चाणक्य जानते थे कि अगर मगध उनके पक्ष में आकर खड़ा हो गया, तो दूसरे कई राज्य खुद उसके छत्र के नीचे आ जाएँगे। इस तरह एक केन्द्रीय सत्ता (मगध) के अधीन विशाल और एकजुट भारत का स्वरूप बनेगा।
मगध पर उस समय घन नन्द का शासन हुआ करता था, जो एक अक्षम और भ्रष्ट राजा था। उसने चाणक्य का प्रस्ताव ही अस्वीकार नहीं किया बल्कि भरे दरबार में उनका अपमान भी किया। इस तिरस्कार की प्रतिक्रिया में चाणक्य ने संकल्प लिया कि वे धन नन्द की सत्ता को उखाड़ फेंकेंगे। इस बीच, सिकन्दर की फौज भारत पर चढ़ आई थी। चाणक्य ने एक बार फिर सीमाई गणराज्यों को प्रेरित तथा प्रोत्साहित किया कि वे सिकन्दर से सीधा मुकाबला करें। इस प्रोत्साहन के परिणामस्वरूप उन राजाओं ने मुकाबला किया भी, लेकिन कोई जीत नहीं सका। कुछ हार गए, और कुछ राजाओं ने आत्मसपर्मण कर दिया। इनमें पुरु गणराज्य के राजा पौरुष (पोरस) और सिकन्दर के बीच की लड़ाई सबसे भयंकर हुई। पौरुष हार गए लेकिन उनकी वीरता से सिकन्दर भी प्रभावित हुआ।
इस तरह चाणक्य ने लगातार अपने राजनैतिक, राजनयिक, कूटनीतिक और सामरिक प्रयासों से सिकन्दर के आगे बढ़ने की राह में लगातार रोड़े डालने का काम किया। उसके आगे बढ़ने की गति को धीमा किया। इसका नतीजा यह हुआ कि सिकन्दर और उसकी फौज का हौसला पस्त हो गया। उसने वापस लौटने का निर्णय कर लिया और लौटते समय बीच रास्ते में अज्ञात बीमारी से उसका निधन हो गया। लौटने से पहले सिकन्दर भारत के जीते हुए हिस्सों का शासन अपने सेनापति सेल्युकस को सौंप गया था, जिसे चन्द्रगुप्त की फौज ने हरा दिया।
इस प्रकार के चाणक्य के प्रयासों से सिकन्दर के शिकंजे में आने से न सिर्फ भारत बच गया, बल्कि एक सीमित क्षेत्र में हुआ उसका आधिपत्य भी जल्द ही खत्म किया जा सका। इतना ही नहीं, इसके बाद चाणक्य ने चन्द्रगुप्त और उसके नेतृत्त्व वाली फौज की मदद से घन नन्द को भी मगध की गद्दी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मगध पर चन्द्रगुप्त का शासन स्थापित कर दिया और वहाँ से मौर्य राजवंश आगे बढ़ा। चन्द्रगुप्त ने एक-एक कर भारत के कई गणराज्यों को मगध के शासन में समाहित कर लिया। इस तरह अपने गुरु चाणक्य का अखण्ड भारत का सपना साकार कर दिखाया। प्राचीन भारत के इतिहास में यह एक विलक्षण घटना थी।
चाणक्य बहुत चतुर तथा बुद्धिमान व्यक्ति थे। कुशल रणनीतिकार थे और उससे भी बढ़कर एक सच्चे राष्ट्रभक्त। वह जानते थे कि अगर भारत को अपनी शक्ति और सामर्थ्य स्थापित करनी है, स्वयं को बचाकर रखना है, तो सभी गण राज्यों को एक सूत्र में पिरोना होगा। उन सभी को एक होकर रहना होगा। यही वह सबसे बड़ी सीख है, जो 2,500 साल बाद भी अक्षरश: प्रासंगिक है। अगर हमें शक्तिशाली राष्ट्र के तौर पर स्थापित होना है, तो एकजुट होकर रहना होगा। पूर्व काल में ऐसे उदाहरण हैं कि जब भी हमने इस सीख को नजरंदाज किया, हमें गुलाम बना लिया गया। पहले मुगलों ने, और फिर अंग्रेजों ने। इसीलिए आज प्रश्न है :
.क्या हम अपने इतिहास और चाणक्य जैसे इतिहास-पुरुषों से कुछ सीख रहे हैं?
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निकेश का मूल लेख
Did anyone ever tell you that 𝗖𝗵𝗮𝗻𝗮𝗸𝘆𝗮 resisted 𝗔𝗹𝗲𝘅𝗮𝗻𝗱𝗲𝗿’𝘀 advancement to then 𝗕𝗵𝗮𝗿𝗮𝘁? Our books were full of Alexander’s achievements but never taught us much about Chanakya and how he united Bharat.
For Chanakya Bharat was one – 𝗳𝗿𝗼𝗺 𝗛𝗶𝗺𝗮𝗹𝗮𝘆𝗮 𝗶𝗻 𝗻𝗼𝗿𝘁𝗵 𝘁𝗼 𝗢𝗰𝗲𝗮𝗻 𝗶𝗻 𝘁𝗵𝗲 𝘀𝗼𝘂𝘁𝗵. It was just ruled by different “Gan Rajya” like today’s state structure.
Chanakya himself was from Patliputra (today’s Patna) but went to Taxila (that times largest university, today in Islamabad, Pakistan) for study and later became a teacher of politics in the same university.
Taxila being a border state was vulnerable to foreign attacks. Chanakya saw that risk and warned all the border states of that time to stay united against Alexander.
A few kings understood his warning and few humiliated him.
Chanakya could sense the tsunami called Alexander and started building his own army in the leadership of his disciple 𝗖𝗵𝗮𝗻𝗱𝗿𝗮𝗴𝘂𝗽𝘁𝗮.
To keep such fragmented “Gan Rajya” together he knew he needed one King who could rule them all. The state of 𝗠𝗮𝗴𝗮𝗱𝗵 (Today’s Bihar) was ruled by “𝗡𝗮𝗻𝗱𝗮” dynasty that time and was very powerful. But the King was corrupt and incapable.
Chanakya united few “Gan Rajya” and challenged Nanda dynasty. In parallel he motivated border states to fight with Alexander – some states lost and some just surrendered. 𝗣𝗼𝗿𝘂𝘀 𝗮𝗻𝗱 𝗔𝗹𝗲𝘅𝗮𝗻𝗱𝗲𝗿 fight was the most deadly one.
The resistance force built by Chanakya slowed down Alexander’s advancement. Alexander died because of some unknown disease and Chandragupta defeated Alexander’s general Seleucus to completely remove Alexander’s rule in India.
Post this Chanakya threw away Nanda dynasty and started 𝗠𝗮𝘂𝗿𝘆𝗮 dynasty under the leadership of Chandragupta Maurya.
That’s how a majority of small “Gan Rajya” came under Maurya dynasty’s rule to call it a united Bharat.
Chanakya was a smart and intelligent strategist but most importantly he was a true patriot. 𝗛𝗲 𝗸𝗻𝗲𝘄 𝗶𝗳 𝗕𝗵𝗮𝗿𝗮𝘁 𝗵𝗮𝗱 𝘁𝗼 𝗿𝗲𝗺𝗮𝗶𝗻 𝗼𝗻𝗲 𝗮𝗹𝗹 “𝗚𝗮𝗻 𝗥𝗮𝗷𝗮𝘆” 𝘄𝗶𝗹𝗹 𝗵𝗮𝘃𝗲 𝘁𝗼 𝘀𝘁𝗮𝘆 𝘂𝗻𝗶𝘁𝗲𝗱.
If we had kept this learning from our 2500 years old history in our DNA, we would not have allowed any foreign force to rule us – neither Mughals nor British.
𝗧𝗵𝗲 𝗹𝗲𝗮𝗿𝗻𝗶𝗻𝗴 𝗶𝘀 𝟮𝟱𝟬𝟬 𝘆𝗲𝗮𝗿𝘀 𝗼𝗹𝗱 𝗯𝘂𝘁 𝗵𝗶𝗴𝗵𝗹𝘆 𝗿𝗲𝗹𝗲𝘃𝗮𝗻𝘁 𝘁𝗼𝗱𝗮𝘆 𝗮𝗹𝘀𝗼!
Are we learning?
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(निकेश जैन, कॉरपोरेट प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी- एड्यूरिगो टेक्नोलॉजी के सह-संस्थापक हैं। उनकी अनुमति से उनका यह लेख अपेक्षित संशोधनों और भाषायी बदलावों के साथ #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। मूल रूप से अंग्रेजी में उन्होंने इसे लिंक्डइन पर लिखा है।)
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