प्रियंका पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश
भारतीय संस्कृति का एक लोकप्रिय पर्व है करवा चौथ। इसकी परम्परा प्रेम और समर्पण से जुड़ी है, लेकिन आधुनिक समाज में यह त्योहार समानता और साझेदारी के भाव से मनाया जाने लगा है। यह रिश्तों में आपसी सम्मान, प्रेम और विश्वास का उत्सव भी है। परम्परा तभी सार्थक है, जब उसमें आत्मा के साथ-साथ समय की समझ हो। भारतीय समाज में स्त्री के जीवन को ‘सुहाग’ से जोड़ा गया है। इसी कारण करवा चौथ जैसे व्रत स्त्री के समर्पण, त्याग और सहनशीलता का उत्सव बन गए हैं।
करवा चौथ का व्रत उत्तर भारत, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु के लिए सूर्योदय से चन्द्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं। जब चाँद निकलता है तो पत्नी छलनी से पति का चेहरा देखकर व्रत तोड़ती है। कभी यह व्रत गाँव की औरतों के बीच अपनेपन और सहयोग का प्रतीक था। महिलाएँ एक-दूसरे के घर जातीं, मिट्टी के करवे (घड़े) में जल भरतीं, गीत गातीं “करवा चौथ का व्रत है भाई, करवा लाना भूली न जाई”। इस तरह, यह त्योहार उनके लिए आपसी मिलन का अवसर भी था, जहाँ वे जीवन की तकलीफों को साझा करतीं थीं।
परम्पराओं को केवल अन्धविश्वास कहकर नकार देना भी उचित नहीं। हर संस्कृति की अपनी आत्मा होती है। ‘करवा’ यानी मिट्टी का घड़ा, जो प्राचीन भारत में जल का प्रतीक था, और ‘चौथ’ मतलब चतुर्थी का दिन। इस त्योहार का मूल भाव केवल पति की आयु से नहीं, बल्कि स्त्री के सामाजिक सहयोग से भी जुड़ा है। यह सच है कि समय के साथ इसके स्वरूप में बदलाव आया है। अब कई जगह पति भी व्रत रखते हैं। कई जोड़े इसे ‘रिलेशनशिप रिचुअल’ की तरह मनाते हैं। यह बदलाव बताता है कि समाज धीरे-धीरे समानता की ओर बढ़ रहा है।
त्योहार का अर्थ वही रहता है, पर दृष्टिकोण बदल जाता है। करवा चौथ जहाँ पहले यह स्त्री के कर्तव्य का प्रतीक था, वहीं अब यह रिश्तों की साझेदारी का रूप ले रहा है। इसलिए करवा चौथ को न तो केवल रूढ़िवादिता समझें, न ही इसे सिर्फ दिखावे का त्यौहार बनाएँ। इसके भीतर के प्रेम, भाव और समर्पण को सच्चे अर्थों में आत्मसात करें। यदि इस व्रत के बहाने पति-पत्नी एक-दूसरे को समझने, एक-दूसरे के त्याग की कद्र करने और रिश्ते में नयापन लाने का अवसर पा सके, तो यह त्योहार वास्तव में सफल होगा। आखिर, करवा चौथ सिर्फ पति की लम्बी उम्र का पर्व नहीं, उस रिश्ते की स्थिरता और संवेदनशीलता का प्रतीक भी है, जो दो आत्माओं को जोड़ता है।
आज जब हम समानता, स्वतंत्रता और पारस्परिक सम्मान की बात करते हैं, तो यह व्रत भी एकतरफा नहीं रहना चाहिए। कहते हैं, शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं देती, बल्कि वह जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है। किन्तु उस शिक्षा का प्रयोग कौन-सी दिशा में होगा, यह निर्णय हर व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है। तो पति भी पत्नी की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए समान भाव से प्रार्थना करे, यही सच्चा प्रेम और समानता है।
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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।)
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