टीम डायरी
कर्नाटक सरकार ने एक गौर करने लायक पहल की है। उसने राज्य में कार्यरत सभी महिला कर्मचारियों को उनके मासिक धर्म के दौरान सालभर में 12 सवैतनिक अवकाश की सुविधा दी है। मतलब पेड लीव, जिसमें छुट्टी पर होने के बावजूद उन्हें उस दिन की तनख्वाह मिलेगी। यह सुविधा सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी महिला कर्मचारियों के लिए दी गई है। यानि कर्नाटक में संचालित निजी कम्पनियों को भी यह नियम मानना होगा।
ऊपरी तौर पर देखने-सुनने में कर्नाटक सरकार का यह कदम ‘अच्छा’ ही कहा जाएगा। इसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि कर्नाटक सरकार ने देश में पहली बार निजी क्षेत्र की महिला कर्मचारियों को भी इस सुविधा के दायरे में रखा है। इससे पूर्व बिहार, ओडिशा और केरल की सरकारों ने भी महिलाओं को ऐसी ही सुविधा दी है। लेकिन बिहार और ओडिशा में सिर्फ सरकारी नौकरी कर रही महिला कर्मचारियों को मासिक धर्म के दौरान सालभर में 12 दिन की छुट्टी की सुविधा है, निजी क्षेत्र की महिला कर्मचारियों के लिए नहीं। जबकि केरल में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों की प्रशिक्षु महिला कर्मचारियों को यह सुविधा दी गई है, वह भी महीने में एक नहीं, दो दिन की।
इसी तरह के प्रावधानों के कारण इस ‘अच्छी’ पहल से जुड़े कुछ सवाल भी पैदा होते हैं। इनमें सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि महीने में महज एक या दो दिन की छुट्टी का ही प्रावधान क्यों? जबकि मासिक धर्म तो सात दिनों का चक्र होता है। उसमें कई महिलाओं को दो या तीन दिनों तक या कभी-कभी उससे अधिक दिन भी तकलीफ झेलनी पड़ती है। तो इस हिसाब से महीने में एक दिन की छुट्टी का क्या औचित्य बनता है? दूसरी बात- कर्नाटक सरकार ने यह भी प्रावधान किया है कि महिलाएँ चाहें तो हर महीने एक दिन ऐसी छुट्टी ले सकती हैं या फिर साल के किसी भी महीने में एक साथ 12 छुटि्टयाँ भी ले सकती हैं! इसका भी क्या मतलब है? क्योंकि 12 दिन का मासिक धर्म तो शायद ही किसी को होता हो! तो क्या इस तरह के कदमाें को राजनैतिक प्रलोभन मात्र माना जाए? इस सम्भावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। कारण कि अगर ऐसा नहीं होता तो कम से कम हर महीने तीन या चार छुटि्टयों को इंतजाम किया जाता और सालभर में एक साथ सभी छुटि्टयाँ लेने की बात तो शायद नहीं ही होती।
सही बात है या नहीं?
