India-US-Britain Flags

वैश्विक अर्थव्यवस्था के दुष्चक्र में फँसा भारत इससे बाहर कैसे निकल सकता है?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

अमेरिका आज भ्रमित है। वहीं जोहरान ममदानी (अमेरिका के विपक्षी दल- डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता और वहाँ के प्रमुख शहर न्यूयॉर्क के नवनिर्वाचित भारतवंशी महापौर) और ‘मागा’ (‘अमेरिका को फिर महान बनाएँ’ अभियान) के समर्थकों से दुत्कारे जाते अमेरिकी भारतवंशियों को देखकर भारतीय दोहरे किंकर्त्तव्यविमूढ़ हैं। रही सही कसर यूरोप, एशिया, अरब-अफ्रीका की अस्थिरता ने पूरी कर दी है। इस सबने मिलकर हमारे लिए स्थिति को अधिक पेचीदा कर दिया है।

यह बदलते समय का सबसे बड़ा चिह्न है, जो बता रहा है कि अमेरिकी–यूराेपीय मूल्यों वाली विश्व-व्यवस्था दरक रही है।
औपनिवेशिक और अंग्रेजी मानसिकता के कारण पश्चिमोन्मुख रहे हमारे नीति-नियन्ता और सत्ता का नेतृत्त्व करने वाले वर्ग के हाथों के तोते उड़ गए लगते हैं। अमेरिका और यूरोप से लाए अधकचरे ज्ञान और पैसे से यहाँ नीतियाँ बनाने वालों को अब समझ नहीं आ रहा कि जब उनके विदेशी आका ही बर्बाद जमींदार की तहत ठगी पर उतर आए हैं तो फिर वह करें ताे क्या करें? हालाँकि वह तो अब भी यही आस लगाए बैठे हैं कि दिन फिरेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारी-भरकम सीमा शुल्क, आदि को छोड़कर फिर भारत का हाथ थाम लेंगे।

बकौल एक अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध विशेषज्ञ, “अमेरिका को लेकर भारतीय नीति नियन्ताओं का व्यवहार उस ठुकराए हुए आशिक जैसा है जो अपनी माशूका की अस्वीकृति को हर्गिज पचा नहीं रहा है। लेकिन अब मिलाप होने का नहीं है। हमें अपने लिए नए रास्ते खोजने होंगे।” इसमें कोई दोराय नहीं कि पिछले एक-दो साल में जो बहुध्रुवीयता घटित हो रही है, उसमें हर राष्ट्र को खरे अर्थों में आत्मनिर्भर और ताकतवर बनना पड़ेगा। क्योंकि बदली विश्व-व्यवस्था में कोई देश किसी दूसरे देश की तब तक मदद करने की स्थिति में नहीं होगा। खास तौर पर जब तक कि इससे उसके हित प्रभावित न होते हो। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया ने लगभग 70 साल का जो कृत्रिम कमोबेश शान्त संघर्षरहित समय भोगा है, वह टूट रहा है। आज वह व्यवस्था गिर रही है, ऐसे में अपने को बचाने के लिए और अपने इतिहास सिद्ध स्थान को हासिल करने के लिए चाहे-अनचाहे हमें अब अपने लिए खुद जिम्मेदार बनना पड़ेगा।

भारत के दृष्टिकोण से बात करें तो अमेरिकी और पाश्चात्य विचार तंत्र के बल पर हम अंतर्विरोध और आपसी खींचतान की स्थिति में ही रहेंगे। कारण साफ है कि उनका पूरा तंत्र शोषण के आधार पर स्थापित है। अब जब अर्थनीति, रणनीति, कूटनीति और राजनीति के स्तर पर विभेद खत्म हो रहे हैं, तो इसका मतलब है कि अब भारत को खुली और गला-काट प्रतिद्वन्द्विता, घात-प्रतिघात, संघर्ष, छद्म युद्ध और आक्रमणों से रूबरू होने के लिए तैयार होना होगा। यद्यपि इसका हर्गिज यह मतलब नहीं कि सारे देश हमारे विरोधी ही रहेंगे। बहुध्रुवीयता का सीधा-साधा मतलब यही है कि जिस तरह किसी मुद्दे पर हम दूसरे देशों के साथ व्यवहार में अपने हित के अनुरूप रूख लेने को स्वतंत्र हैं। उसी तरह वे सारे देश भी हमसे सम्बन्धित किसी मुद्दे पर मनमाफिक रूख ले सकते हैं। सीधे लफ्जों में कहें तो वैश्विक स्तर पर देशाें के बीच व्यवहार और नीति का जो एक ढीला-ढाला अघोषित समझौता था, अब वह टूट रहा है। शक्तिसम्पन्न होने पर ही हम विरोधियों से परास्त या दूसरे देशों की सहायता आकर्षिक कर पाएँगे।

इन परिस्थितियों में भारत जैसा देश किस तरह खुद को शक्तिशाली बना सकता है? वे सोपान कौन से हैं जिनसे हम आत्मनिर्भर, अनुशासित और जिम्मेदार होकर खड़े हो सकेंगे? इन प्रश्नों से जुड़ी सम्भावनाएँ देखिए…

  • सबसे पहले भारत को खुद अपना अन्वेषण करना होेगा। अपने वजूद को हासिल करने के लिए हमें शिक्षा-दीक्षा और संस्कारों के लिए सुदूर पश्चिमी देशों की जगह अड़ोस-पड़ोस के देश जैसे चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, ईरान, इण्डोनेशिया, वियतनाम आदि से जुड़ना होगा। जहाँ से हमें जो श्रेष्ठ मिले, भारतीय साभ्यतिक सोच के अनुसार वहाँ से वह सब लेना होगा। इसके लिए हमें उन पारम्परिक जीवन मूल्यों को भी सुदृढ़ करना होगा, जिनकी बदौलत हम अपने मूल्यों के अनुरूप योग्य विचारों को आत्मसात कर सकेंगे।
  • दूसरा हमें और अधिक स्थानीयतावादी होना होगा। स्थानीयतावादी होने से तात्पर्य है, विदेश नीति स्तर पर हमें अपने आस-पड़ोस के सांस्कृतिक-साभ्यतिक रूप से साम्य रखने वाले देशों को पहले तरजीह देनी होगी। वहीं हमें संकीर्ण खेमेबन्दी, मैत्री सन्धियों से परे जाकर स्वधर्म आधारित भारतीय दृष्टिकोण को आधार बनाना होगा। इसके लिए हमें देश में स्थानीय भारतीयों को कला-कौशल सम्पन्न बनाकर उनके साथ समावेशी विकास करना होगा।
  • अपने कामकाज से रचनात्मकता के आनंद को हासिल करने वाला उत्पादक युवा वर्ग ही देश ही सम्पत्ति है। ब्रिटिश उपनिवेशकाल के पूर्व भारत और चीन का बल ऐसा कलाकौशल सम्पन्न उत्पादक समाज था। तब से भारत में उद्योग लाकर सभी पारम्परिक उत्पाद बनाने वाले कारीगरों से कामकाज और कला छीन कर उन्हें कला-कौशलहीन मजदूर बनाकर रख दिया गया है।
  • सरकार को नागरिकों को अब शैशविक और नाजुक बनाने की जगह मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना होगा। उन्हें स्वाभिमानी उत्पादक कारीगर, किसान या सेवाएँ उपलब्ध करने की राह में आने वाले बाजार, कॉरपोरेशन्स, सप्लाईचेन लाॅजिस्टिक्स और विदेशी उत्पादकों के प्रयासों को विफल करना होगा। भारत सरकार आज मनरेगा, सस्ता अनाज और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से जो पैसा बाँट रही है, वह हमारी यही विफलता है। इसके चलते देश में एक बड़ी आबादी आज निखट्‌टू और अपनी आवश्यकताओं के लिए सरकारी रेवड़ियों पर निर्भर हो रही है। उसके पास न धर्म-नीति बची है, न ही आत्मगौरव। ऐसे में सरकार को अपने हर निर्णय और घोषणा से आत्म-अनुशासन, त्याग, परिश्रम और उससे उपजे नैतिक गौरव को स्थापित करना होगा।
  • कहने की आवश्यकता नहीं कि चीन, जापान, सिंगापुर, ताइवान, जैसे देशों के मेहनतकश लोगों से हम फिर अपना स्वावलबमन सीख सकते हैं। इसके लिए सरकार को नए और रचनात्मक तरीके से संस्थागत और सरकारी सोच की जगह खुली सर्वसुलभ कलाकौशल की शिक्षा-दीक्षा को प्रसारित करना होगा। यानी शिक्षा नौकरी के लिए नहीं हो, बल्कि बेहतर सेवा और उत्पाद पैदा करने वाले गुणों के पोषण के लिए होनी चाहिए। और गुणवत्ता वाले उत्पाद और सेवाओं के लिए बाजार विकसित किए जाने चाहिए।
  • नि:संदेह इसमें सरकार के साथ आम लोगों को जोड़ना होगा। ऐसे कार्यों के लिए खुले दिलो-दिमाग से युवाओं को अवसर उपलब्ध करवाने होंगे। चीन, जापान, आदि देशों की उत्पादकता प्रशंसनीय है। लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि यह पर्यावरण विरोधी औद्योगिक उत्पादन टिकने वाला नहीं। कल नहीं तो परसों, निश्चित ही इससे हो रहे नुकसान हमें इन नीतियों कोे पलटने को बाध्य करेंगे।
  • ऐसे में भारत के नीति निर्माण को सरकारी तंत्र की जगह धार्मिक या सांस्कृतिक स्तर पर काम करने वाला बनाना होगा। इतना ही नहीं हमे ज्ञान प्रणाली, सामाजिक परम्पराओं को शासन के अनुरूप बनना होगा। यानी कि हमें ऐसे वर्ग और समूहोें में नेतृत्त्व पैदा कर सामाजिक स्तर पर उन्हें प्रोत्साहित करना होगा, जो उन समूहों को रचनात्मक और कामकाज के स्तर पर नियोजित करे। ऐसे वर्ग के लोग अपने काम को आगे बढ़ाने में स्वयं प्रेरित हों और इस तरह एक सामाजिक तंत्र विकसित हो। यह मानव समाज के लिए नैसर्गिक भी है।
  • सरकार को उच्च गुणवत्ता के उत्पाद और सेवाओं से प्रतिद्वन्द्विता करने वाले हल्के और मशीनी उत्पादों को प्रोत्साहन देने के प्रयासों से परहेज करना होगा। इसलिए कि भारतीय आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों पर आधारित पर्यावरण चक्र को साथ लेकर चलने वाली अर्थव्यवस्था को समानांतर रूप से पोषित करना बेहद अहम है। 
  • —-

    (नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।) 

    —– 

    समीर के पिछले 10 लेख 

    19- भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई सेवानिवृत्त हो रहे हैं, मगर सवाल छोड़ जा रहे हैं
    18 – क्या डोनाल्ड ट्रम्प एक ‘विदूषक’ और अमेरिकी सत्ता ‘प्रहसन’ बन गई है?
    17- भारत पर अमेरिका का 50 फीसद सीमा शुल्क भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद कैसे? 
    16- विवाह के योग्य न रह जाना भारतीय समाज में आज आम प्रचलित बात कैसे हो गई? 
    15- खुद के मूल्यों पर खड़ा होना ही भारत के लिए चुनौती और अवसर भी!
    14- समझने की बात है कि अमेरिकी-चीनी मानदंडों वाला विकास भारत में नहीं चल सकता! 
    (दूसरा भाग)
    13- अमेरिकी ‘रिलीजियस लिबर्टी कमीशन’, यानि भारत में ईसाई धर्मान्तरण का षड्यंत्र फिर तेज!
    12- इजरायल-ईरान संघर्ष क्या तीसरे महायुद्ध की सुगबुगाहट है?
    (पहला भाग)  
    11- ‘आज्ञा सम न सुसाहिब सेवा’ यानि बड़ों की आज्ञा मानना ही उनकी सबसे बड़ी सेवा है!
    10- कोशिश तो खूब कर रहे हैं, मगर अमेरिका को ‘ग्रेट’ कितना बना पा रहे हैं ट्रम्प?

सोशल मीडिया पर शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *