Gutkha-Social Media

ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सरकारों ने ऐसा क्या है, जिसकी तारीफ होनी चाहिए?

टीम डायरी

लोकतंत्र में सरकारों को ‘कल्याणकारी’ माना जाता है। यानि जनता के कल्याण का ध्यान रखने और उसके लिए जरूरी कदम उठाने वाली व्यवस्था। हालाँकि लोकतांत्रिक सरकारों की ‘राज-नीति’ में कल्याण की परिभाषा के तहत उतना ही जनकल्याण आता है, जितने से उनकी ‘राजनीति’ पर विपरीत असर न पड़े, जनता नाराज न हो। इसीलिए सरकारें जब कभी कोई ‘जनकल्याण’ की घोषणाएँ करती हैं, कदम उठाती हैं, तो उन्हें ‘लोकलुभावन’ का विशेषण दे दिया जाता है। क्योंकि उनके पीछे मकसद सिर्फ जनता को लुभाने का रहता है। 

अलबत्ता, फिर भी कुछ लोकतांत्रिक सरकारें पहले से खिंची लकीर से हटकर जनकल्याण के ऐसे कदम भी उठा लेती हैं, जिनसे जनता भले नाराज हो जाए, लेकिन उसका वास्तविक कल्याण हो। मसलन ओडिशा सरकार ने अभी हाल में ऐसा कदम उठाया है। वहाँ गुटखा के सभी प्रारूपों पर प्रतिबंध लगाया गया है। साथ ही चबाकर खाए जाने वाले तम्बाकू के सभी उत्पाद भी प्रतिबंधित किए गए हैं। अब उन्हें किसी रूप में, किसी भी माध्यम से बेचना, बनाना, आदि दण्डनीय अपराध होगा। सरकार सख्ती से यह प्रतिबंध लागू कर रही है। 

इसी तरह आंध्र प्रदेश की सरकार के मंत्री नारा लोकेश ने बताया है कि उनके राज्य में 16 साल से कम उग्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी की जा रही है। इस बारे में गंभीरता से विचार किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया में उठाए गए ऐसे की कदम का अध्ययन किया जा रहा है, जहाँ पिछले साल ही इतने छोटे बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया था। आंध्र अगर इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो वह देश का पहला राज्य होगा, जहाँ बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित होगा।

निश्चित रूप से यह दोनों ही कदम तारीफ के काबिल हैं, अनुकरणीय हैं। क्योंकि गुटखा, तम्बाकू जैसा नशा हो या सोशल मीडिया का ‘महानशा’, दोनों से ही हमारी युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है। किस तरह? इसकी बानगी भी देखिए। बिहार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में आया है। एक व्यक्ति ने नौवीं में पढ़ने वाले बच्चे को गुटखा खाते पकड़ लिया। उससे पूछा कि “तुम्हें पता है, गुटखा जानलेवा है?” तो उसका जवाब आया, “शाहरुख खान नहीं मरा, तो हम कैसे मर जाएँगे।”  मतलब अभिनेता शाहरुख खान के ‘बोलो जुबाँ केसरी’ से प्रभावित इस पीढ़ी को सहज भाव से रोक पाना अब मुश्किल है। सिर्फ सरकारें ही कुछ कर सकती हैं। 

इसीलिए लिखा गया कि ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सरकारों के फैसले न सिर्फ प्रशंसनीय हैं, बल्कि अनुकरणीय भी हैं। अन्य सरकारों को ‘सच्चे जनकल्याण’ के लिए ऐसे कदमों का अनुकरण करना चाहिए। 

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