टीम डायरी
अमेरिका ने कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान की हवा निकाल दी। अभी पाँच फरवरी को पाकिस्तान ने ‘कश्मीर एकजुटता दिवस’ मनाया। अलग-अलग जगहों पर इससे जुड़े कार्यक्रम हुए। इनमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ सहित सेना और राजनीति के दिग्गजों ने वही पुरानी बातें दोहराईं, “एक दिन आएगा इंशा अल्लाह, जब पूरा कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा होगा”, “हम पाकिस्तान के लोग कश्मीर के लोगों की लड़ाई में मरते दम तक साथ देंगे”, “कश्मीर हमारे गले की नस है, इसे हम कटने नहीं देंगे”, आदि। शाहबाज शरीफ पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर की विधानसभा में भाषण देने पहुँच गए और वहाँ के ‘फेल्ड मार्शल’ भारत से लगी सीमा की अग्रिम सैन्य चौकियों पर जा पहुँचे। यह दिखाने के लिए कि पाकिस्तान की अगुवाई करने वाले लोग हर कदम पर ‘आजाद कश्मीर’ की लड़ाई लड़ने वालों के साथ हैं। अलबत्ता, उनके द्वारा ऐसा अति-उत्साह दिखाए जाने का एक स्वाभाविक कारण था।
कारण यह था कि कुछ समय पहले पाकिस्तान को चलाने वालों के साथ अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति ने नजदीकियाँ बढृाई थीं। इन नजदीकियों के दौरान पाकिस्तान को अमेरिका की ओर से वित्तीय मदद दिए जाने का भरोसा दिया गया। वहाँ निवेश करने की योजनाएँ बनाई गईं। यहाँ तक कि देशों के हितों को पूरी तरह किनारे रखकर बेहद निजी स्तर पर किए जाने वाले कारोबार की भी सहमतियाँ बनीं। ऐसे में पाकिस्तान वालों का उत्साह लाजिम था। हालाँकि इस चक्कर में वह ये भूल गए कि अमेरिका के मौजूदा प्रशासन पर भरोसा करना कोई अक्लमंदी की बात नहीं है। अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति सिर्फ कारोबार की भाषा समझते हैं। और कारोबार में नफा-नुकसान सबसे ऊपर होता है।
इसका प्रमाण यह है कि जब अमेरिका को भारत के साथ कारोबारी समझौता करने के लिए भारतीय नेताओं पर दबाव बनाना था, तब उसने पाकिस्तान से नजदीकियाँ बढ़ाकर उसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। लेकिन जब भारत के नेता दबाव में नहीं आए और उन्होंने यूरोपीय संघ जैसा दमदार कारोबारी साझेदार ढूँढ लिया और उससे कारोबारी समझौता किया तो अमेरिका को अपना तरीका बदलना पड़ा। उसने न सिर्फ अपने सुर ढीले किए, बल्कि भारत के साथ आनन-फानन में कारोबारी समझौता करने का रास्ता भी बना लिया। इतना ही नहीं, शायद भारत को खुश करने के लिए ही अमेरिकी प्रशासन की ओर से समझौते सम्बन्धी सूचना देते हुए एक नक्शा भी जारी किया गया है। इसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और चीन के अधिकार वाले अक्साई चिन को भारत का हिस्सा दिखाया गया है। इस लेख के साथ लगी तस्वीर देखी जा सकती है। यही नक्शा अमेरिका ने सात फरवरी, शनिवार को जारी किया है।
निश्चित रूप से अमेरिका का यह कदम पाकिस्तान के लिए शर्मिन्दगी की स्थिति बनाने वाला है। लेकिन इससे अमेरिका को क्या फर्क पड़ता है। उसे तो सिर्फ अपना मुनाफा देखना है। और भारत के साथ उसे अपना मुनाफा, हर लिहाज से अधिक दिखाई दे रहा है। यद्यपि सवाल हम भारतीयों के सामने भी है। खास तौर पर भारतीय मीडिया के सामने, जो इस वक्त अमेरिका की कार्रवाई को काफी बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है। सवाल यह है कि क्या अमेरिका की इस कार्रवाई से, सच में हमें खुश होना चाहिए? ‘नहीं’। बल्कि हमें सचेत होना चाहिए क्योंकि जैसा पहले लिखा कि अमेरिका के मौजूदा प्रशासन की नीतियाँ अस्थिर हैं। वहाँ इस वक्त सिर्फ कारोबारी नफे-नुकसान की भाषा ही बाेली और समझी जा रही है। और इस तरह की भाषा और अस्थिर नीतियाँ कभी भरोसे के लायक नहीं होतीं। ध्यान रहे।
