नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश
आधुनिक दौर की ‘विकास-लीला’ ने सिर्फ बाहरी तौर पर ही माहौल नहीं बदला है। इंसान के भीतर भी बहुत कुछ बदल डाला है। यूँ कि शायद दिल और दिमाग का भी सीमेंटीकरण हो चुका है इंसान के। यकीन न हो तो निजी अनुभव की एक कहानी सुनिए। अभी दो-चार रोज पहले की बात है। इतवार का दिन था। मैं अपने घर के बगल की खुली जगह पर किसी से बतिया रहा था। वहीं कॉलोनी की पानी की टंकी बनी हुई है और उसके महज 10 फीट की दूरी पर पीपल एक पेड़ अब परिपक्व हो चुका है। उस खुली जगह में यही कोई सात-आठ बरस पहले वह पीपल उग आया था। मेरे घर की बाईं दीवार से भी वह महज 15 फीट ही दूर होगा।
तो शुरू में जब पीपल ने पनपना शुरू किया तो कभी उसे कोई गाय खा जाती, कभी कोई दूसरा जानवर। कॉलोनी की समिति के पदाधिकारी भी जब-तब उसे उखड़वा देते। तमाम प्रयास करते कि वह न उगे। उनका डर शायद यह रहा हो कि पेड़ बड़ा हो गया तो उसकी जड़ों से, टहनियों से कॉलोनी की पानी की टंकी को नुकसान हो सकता है। लिहाजा, उस समय उन लोगों का किसी ने खास विरोध नहीं किया, मैंने भी नहीं। मगर वह पीपल भी शायद ठान चुका था, उगना तो इसी जगह पर है। और तमाम प्रतिरोध को दरकिनार करते हुए वह धीरे-धीरे बड़ा होता गया। फिर एक दिन न जाने मुझे क्या प्रेरणा हुई कि मैंने उसकी पूजा शुरू कर दी।
जल्द ही हर शनिवार को उस पेड़ की पूजा का मेरा नियम बन गया। अपने पौराणिक साहित्य में लिखा भी है, पीपल में तमाम देवी-देवताओं, यमराज, पूर्वजों, आदि का वास होता है। उस पर जल चढ़ाने मात्र से जीवन की कई परेशानियाँ दूर हो जाती हैं। उसकी छाँव तले ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति तक हो सकती है, महात्मा बुद्ध को हुई भी थी। और फिर विज्ञान भी इस पेड़ की बड़ी खासियत बताता है, 24 घण्टे ऑक्सीजन की आपूर्ति। दिन में ज्यादा, रात में कुछ कम। वही ऑक्सीजन जिसके लिए कोरोना महामारी के संक्रमण के दौरान लोग मारे-मारे फिर रहे थे और मिल नहीं रही थी। वही, ऑक्सीजन, जिसके बारे में कहा जाता है कि कुछ सालों बाद वह बोतल बंद पानी की तरह ऊँची कीमतों पर बिका करेगी और लोग कतार लगाकर उसे खरीदते नजर आएँगे।
सो, इतने बड़े मुनाफे को भला मैं कैसे नजरंदाज कर देता। लिहाजा, पूजा-आराधना के साथ मैंने वक्त-वक्त पर उसे काटे जाने की किसी भी कोशिश का विरोध करना भी शुरू कर दिया। वक्त बीता, पेड़ परिपक्व होकर अपने पूरे विस्तार में आ गया। अन्य लोग भी देखा-देखी उसकी पूजा-आराधना करने लगे। पानी की टंकी का कुछ हिस्सा भी अब पीपल के पत्तों ने ढँक लिया है। मेरे घर के दीवार तक उसकी टहनियाँ पहुँचने लगी हैं। लेकिन अब तक उसने नुकसान किसी को नहीं पहुँचाया। मुझे भरोसा है कि वह नुकसान पहुँचाएगा भी नहीं। मैंने बचपन से अपनी जन्मस्थली में एक बुजुर्ग पीपल को देखा है। वह चारों तरफ घरों से घिरा है। एक तरफ तो राजमहल की दीवार तक है, महज पाँच फीट की दूरी पर। लेकिन मजाल है कि किसी दीवार पर दरार भी आई हो।
उस पीपल को मुझसे पहले की तीन-चार पीढ़ियों ने भी ऐसा ही देखा है। उम्र शायद 100 बरस से ज्यादा हो चुकी होगी। उसी को देखकर मेरा भरोसा अपने घर के बगल वाले पीपल पर मजबूत हुआ। और फिर यह सोचकर भी कि जिसमें खुद पूर्वज, देवता, त्रिदेव भगवान, सब रहते हैं वह वृक्ष किसी का नुकसान क्यों ही करेगा? लेकिन आधुनिक ‘विकास-लीला’ से प्रभावित सोच वाले लोग शायद यह नहीं समझते। उस रोज जब मैं उसी पीपल की छाँव में किसी से बातचीत में मशगूल था तो पड़ोस में रहने वाले एक बुजुर्ग आ गए। कहने लगे, “पंडित जी, आप इस वृक्ष की खूब पूजा-पाठ करते हैं। अब आप ही इसे काटने-छाँटने का कोई रास्ता बताएँ।”
मैंने हँसकर कहा, “मगर काटना-छाँटना है ही क्यों? आपका घर तो इसके दायरे से बहुत दूर है। अगले 50 बरस तक भी इसकी टहनियाँ, जड़ें आपके घर तक नहीं पहुँच सकतीं। आप क्यों परेशान होते हैं?” तो वे गंभीर होकर बोले, “आप समझते नहीं पंडित जी। अगले कुछ ही सालों में यह पेड़ आपके घर और पानी की टंकी की नीव को कमजोर कर देगा।” मैंने फिर प्रतिउत्तर दिया, “लेकिन अब तक तो ऐसा कोई संकेत नजर नहीं आया, जबकि टहनियाँ और जड़ें, सब पर्याप्त फैल चुकी हैं। थोड़ी-बहुत ही और फैलेंगीं।” “अरे मैं 50 साल बाद की बात कर रहा हूँ, 50 साल बाद की”, उन्होंने कुछ झल्लाहट भरे अंदाज में कहा, और वहाँ से चल दिए।
उनके जाने के बाद मेरे दिमाग में ख्यालों का एक झोंका आया। मसलन- मेरी उम्र 52 साल हो चुकी है और पड़ोस में रहने वाले उन साहब की 60-62 से कम नहीं होगी। क्या हम 50 साल बाद रहेंगे? और रहे भी तो उस वक्त हम पीपल से होने वाले किसी नुकसान को देख रहे होंगे या उससे मिलने वाली ऑक्सीजन जैसे फायदों को? क्योंकि तब तक इंसान को ऑक्सीजन, शुद्ध हवा, आदि के लाले पड़ ही चुके होंगे? जब अभी शहरों, महानगरों में प्रदूषण के हाल-बेहाल हैं, तो 50 साल बाद की हालत क्या होगी, सहज अंदाज लगाया जा सकता है। मगर गजब है, कि आधुनिक सोच वाले लोगों का बड़ा तबका अब भी यह बात क्यों नहीं समझ पा रहा है?
