टीम डायरी
देश में जनगणना होने वाली है। मतलब जनसंख्या कितनी है और उसका स्वरूप कैसा है, यह जानने की प्रक्रिया। यानि किस समुदाय के लोग कितने हैं, महिला-पुरुष कितने हैं, बच्चे-युवा कितने हैं, गरीब-अमीर कितने हैं, रोजगार प्राप्त और बेरोजगार कितने हैं, आदि सब चीजें इस जनगणना से सामने आएँगी। जनगणना प्रकिया कागजरहित होगी, सब आँकड़े, जानकारियाँ डिजिटल प्रक्रिया से दर्ज होंगे। सूचना के लिए बता दें कि भारत की यह 16वीं जनगणना प्रक्रिया है।
वैसे, मोटे तौर पर भारत की जनसंख्या कितनी है इसका अनुमान अधिकांश लोगों को है ही। साल 2023 में भारत ने आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया था और दुनिया में पहले पायदान पर पहुँच गया था। उस वक्त देश की आबादी 1 अरब 42 करोड़, 86 लाख के आस-पास थी। उसके बाद से ढाई-तीन साल बीत चुके हैं। अनुमान है कि हर साल करीब 1 अरब 20-25 करोड़ के लगभग आबादी भारत में बढ़ रही है। इस हिसाब से ढाई-तीन साल में तीन-साढ़े तीन करोड़ लोग और बढ़ चुके होंगे। यानि 1 अरब 45-46 करोड़ के आस-पास आबादी 2026 में हो चुकी होगी। जब तक जनगणना पूरी होगी, यह आँकड़ा 1 अरब 48 करोड़ के करीब पहुँच जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इतनी बड़ी आबादी को सँभालना अपने आप में बड़ी चुनौती होती है। सबके लिए राशन, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि का बंदोबस्त करना। जीवनोपयोगी मूलभूत सुविधाओं का इंतजाम करना। ऐसा सब करते हुए प्राकृतिक संसाधनों के साथ संतुलन बनाना। यह कठिन चुनौती है। इस चुनौती से क्या तो प्रदेश और क्या देश-दुनिया, हर कहीं की सरकारें दिन-प्रतिदिन जूझ रहीं हैं। विशेषज्ञ लगातार इस पर जोर दे रहे हैं कि जनसंख्या नियंत्रण आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है, खासकर उन देशों में जहाँ आबादी की बढ़त विस्फोट का रूप ले रही है। यानि भारत जैसे देशों में।
अलबत्ता, इसी भारत में विरोधाभास देखिए कि कुछ राज्य बड़े पैमाने पर देश की चिंता करने के बजाय अपने प्रदेश की भर फिक्र कर रहे हैं। मसलन- आंध्र प्रदेश की सरकार ने घोषणा की है कि जो माता-पिता दूसरी और तीसरी संतान पैदा करेंगे, उन्हें इनाम दिया जाएगा। पहली के बाद वाली दोनों संतानों के एवज में 25-25 हजार रुपए। इसके अलावा तीसरी संतान के लिए उसकी उम्र पाँच साल होने तक हर महीने 1,000 रुपए की अतिरिक्त सहयोग राशि भी मिलेगी। साथ ही, उसके लिए 18 साल की उम्र तक मुफ्त शिक्षा का बंदोबस्त भी प्रदेश सरकार की तरफ से ही किया जाएगा।
ऐसा क्यों किया जा रहा है? राज्य सरकार के अनुसार, आंध्र में प्रजनन दर यानि किसी महिला द्वारा अपने जीवनकाल में जन्म लेने वाले बच्चों की औसत संख्या, लगातार गिर रही है। साल 1993 में यह प्रदेश में 3.0 थी जो 1.5 हो चुकी है। जबकि आदर्श प्रजनन दर 2.1 मानी जाती है। लिहाजा, जनसांख्यिकी का संतुलन बनाए रखने की गरज से सरकार यह प्रोत्साहन नीति लेकर आई है। अच्छी बात है, लेकिन इससे देश पर समग्र रूप से जो असर होगा, उसका क्या? और फिर इसी तरह की दलील के साथ दूसरे राज्यों में भी जनसंख्या बढ़ाने की जो होड़ लगेगी, उसका क्या? इन सवालों के जवाब किसी के पास अभी तो उपलब्ध नहीं हैं। वैसे, आंध्र सरकार की दलील है कि ज्यादातर लोग एक संतान पैदा कर रहे हैं, इसलिए यह जरूरी था। तो भाई, प्रोत्साहन नीति दो बच्चों तक भी सीमित की जा सकती थी न?
खैर, इसी क्रम में एक दिलचस्प तथ्य देखिए। देश के गृह मंत्री ने जनगणना के लिए दो शुभंकर जारी किए हैं। एक पुरुषों का प्रतिनिधित्त्व करने वाला और दूसरा महिलाओं का। पुरुष शुभंकर का नाम रखा गया है ‘विकास’ और महिला वाले का ‘प्रगति’। गंभीरता से देश-दुनिया को यह संदेश देने के लिए कि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना-बनाना ही है। अलबत्ता, बढ़ती और ‘बढ़वाई जाती’ आबादी के बीच ‘विकास’ और ‘प्रगति’ का क्या होगा, कोई बताने की स्थिति में हो तो बताए जरा?
