समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल, मध्य प्रदेश
इतिहास के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो एक साथ अनेक सत्य उद्घाटित कर देते हैं। जब तीन जनवरी 2026 को अमेरिकी सैन्य अभियान ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को काराकास से उठाकर न्यूयॉर्क की अदालत में खड़ा कर दिया, तो दुनिया ने जो देखा वह महज एक राजनीतिक नाटक नहीं था। वह उस वैश्विक खेल का खुला प्रदर्शन था जो दशकों से परदे के पीछे चल रहा था। ट्रम्प प्रशासन की नजर में जीवाश्म ईंधन अब केवल मुनाफे या ऊर्जा सुरक्षा का मामला नहीं, यह शक्ति का एक सुनिश्चित औजार बन चुका है।
वेनेजुएला के तेल पर नियंत्रण का प्रतीकात्मक और रणनीतिक मूल्य यह है कि यह महज कच्चे तेल के बैरलों तक नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को आकार देने की अमेरिकी क्षमता की पुनर्स्थापना तक जाता है। यह अकेली घटना नहीं थी। ग्रीनलैण्ड पर अमेरिकी नियंत्रण की माँग फिर से सामने आई, जहाँ 1.23 करोड़ मीट्रिक टन दुर्लभ खनिज भण्डार दबे हैं, जो अमेरिकी भण्डार के लगभग बराबर हैं। ट्रम्प ने वेनेजुएला अभियान के अगले ही दिन कहा कि ग्रीनलैण्ड अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। और फिर आया ईरान पर हमला, जो कि इस क्षेत्र पर इजराइल की गिरफ्त कायम रखने के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन गहरे आर्थिक, रणनीतिक स्तर पर यह मध्य-एशिया में अमेरिकी हितों की नई इबारत लिखने की तैयारी है।
अमेरिका की 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति ने ऊर्जा क्षेत्र के विकास को राष्ट्रीय सुरक्षा का केन्द्रीय स्तंभ घोषित किया था। वेनेजुएला अभियान उसी रणनीति का पहला खुला क्रियान्वयन था। ग्रीनलैण्ड, वेनेजुएला, ईरान, ये अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। जब इन्हें एक साथ देखा जाए तो एक सुसंगत अमेरिकी रणनीति उभरती है- चीन के साथ एआई और तकनीकी प्रतिस्पर्धा में जीत के लिए ऊर्जा और खनिज संसाधनों पर वर्चस्व स्थापित करना। यह भूराजनीतिक भूकंप है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिससे विश्व का 20% तेल गुजरता है, व्यावहारिक रूप से बंद हो गया है। इसके झटके सबसे पहले भारत जैसे देशों को महसूस हो रहे हैं जो इस तेल-आधारित वैश्विक व्यवस्था पर सबसे अधिक निर्भर हैं।
होर्मुज बंद है- भारत का क्या?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 89% आयात करता है। पश्चिम एशिया इस आपूर्ति का सबसे बड़ा स्रोत है। जब होर्मुज का जलगलियारा बंद होता है, तो भारत की खाद्य सुरक्षा सीधे खतरे में आ जाती है, क्योंकि वह डीजल जो ट्रैक्टर चलाता है, वह गैस जो यूरिया बनाती है, वह ऊर्जा जो सिंचाई पंप चलाती है, सब इसी मार्ग से आती है। विश्लेषकों ने कहा है कि ट्रम्प का उद्देश्य ईरान को रणनीतिक रूप से झुकाना है, दबाव और अप्रत्याशितता के जरिए। लेकिन इस खेल में भारत एक मोहरा नहीं बन सकता। उसे अपनी ऊर्जा संप्रभुता का रास्ता खुद बनाना होगा।
आश्चर्य की बात यह है कि वह रास्ता हमारे खेतों में, हमारी गोशालाओं में, हमारी उस परंपरा में छुपा है, जिसे हमने ‘पुराना’ और ‘अनुपयोगी’ मानकर पीछे छोड़ दिया था। इससे यह भी साबित होता है कि भारत गणराज्य का नेतृत्व आज भी उस औपनिवेशिक लबादे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं जो देसी जरूरतों के लिए अनुपयोगी साबित हो रहा है। विकास जिस जीडीपी, ताकत और उपभोगवादी प्रतिमानों के लिए जीवाश्म और अन्य ऊर्जा के अंधाधुंध इस्तेमाल के लिए तैयार है, वैश्विक स्तर पर वह भी गलत साबित हो रहा है।
बैल की पीठ पर टिकी है 60,000 करोड़ रुपए की बचत!
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हुए एक हालिया शोध का आँकड़ा चौंकाने वाला है। इसके मुताबिक यदि भारत के उपलब्ध पशुधन का पूरी कार्यक्षमता का उपयोग किया जाए, तो प्रतिवर्ष 60,000 करोड़ रुपए का जीवाश्म ईंधन बच सकता है। देश के पशुधन में 21,924 अरब किलोवॉट ऊर्जा प्रतिवर्ष उत्पन्न करने की क्षमता है, लेकिन अभी उसका केवल 25% उपयोग हो रहा है। एक देसी बैल की जोड़ी प्रतिवर्ष 247 लीटर डीजल की जगह लेती है। डीजल, जो कि होर्मुज के रास्ते आता है।
पशुधन केवल ऊर्जा नहीं देता, वह धरती को जीवन भी देता है। गोबर की खाद से मिट्टी का जैविक कार्बन 35% से अधिक बढ़ता है। इसका अर्थ है कि मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है। रासायनिक उर्वरकों की जरूरत घटती है, और फसल की जड़ें गहरी होती हैं। यूरिया और डीएपी प्राकृतिक गैस से बनते हैं। वही गैस, जो आज पश्चिम एशिया के युद्ध में जल रही है। गोबर इस दोहरे संकट का एक प्राकृतिक उत्तर है।
इससे भी आगे, पशु अपशिष्ट और कृषि अवशेषों से बायोगैस के रूप में 3,011 टेराजूल प्रतिदिन ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है, जो देश के 55% से अधिक ग्रामीण जिलों की संपूर्ण ऊर्जा जरूरत पूरी कर सकती है। यह वह ऊर्जा है, जो न होर्मुज की परवाह करती है, न वेनेज़ुएला की, न ट्रम्प की। यदि हम विकास के इस नैसर्गिक और टिकाऊ मॉडल को उचित स्थान देते हैं तो यह हमारी जैव-विविधता और प्रकृति के संरक्षण के लिहाज से अप्रत्याशित लाभ होगा।
हल्लीकर, कंगायम, ओंगोल… ये नाम नहीं, राष्ट्रीय संपदा हैं
भारत के गौवंश की देसी नस्लें- हल्लीकर, कंगायम, खिल्लारी, ओंगोल, गिर, कांकरेज… सदियों के सहजीवन की उपज हैं। इन्होंने भारत की धरती, जलवायु और परिस्थितियों के साथ एक गहरा जैविक रिश्ता बनाया है। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि इन नस्लों के बैल 40°C से अधिक तापमान में भी खेत जोत सकते हैं। इनकी ढीली त्वचा, बड़ा गलकंबल और विशेष पसीने की ग्रंथियाँ इन्हें भारतीय गर्मी में यूरोपीय नस्लों से कहीं बेहतर बनाती हैं। जर्सी और होल्स्टीन जैसी विदेशी नस्लें 25°C से ऊपर तापमान में उत्पादकता खोने लगती हैं। वह तापमान, जो उत्तर भारत में फरवरी में ही पार हो जाता है। इन देसी पशुओं पर एक और आरोप लगाया जाता रहा है कि ये अधिक मीथेन छोड़ते हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। लेकिन 2025 के एक व्यापक वैज्ञानिक विश्लेषण ने स्थापित किया कि देसी जेबू नस्ल का मीथेन उत्सर्जन यूरोपीय डेयरी गायों की तुलना में आधे से कम है। यानि भारतीय गाय पर लगाया जाने वाला पर्यावरणीय आरोप वैज्ञानिक रूप से ही गलत सिद्ध हो चुका है।
भारतीय सभ्यता का वह ज्ञान जो ‘पुराना’ नहीं आज भी मौजूं है
जब संस्थाएँ कमजोर पड़ती हैं, जब वैश्वीकरण की चमक फीकी पड़ती है, तो दुनिया फिर से भूगोल, संसाधन और रणनीतिक स्थिति की ओर लौटती है। पश्चिमी विद्वान आज जो कह रहे हैं, भारतीय सभ्यता ने यही बात हजारों साल पहले कही थी, लेकिन एक गहरे अर्थ में। उसने कहा था, “धरती के साथ जियो, प्रकृति के चक्र से जुड़ो, उतना ही लो जितना लौटा सको।” आज जब अमेरिका वेनेजुएला और ग्रीनलैण्ड पर नियंत्रण के लिए युद्ध लड़ रहा है, जब होर्मुज बंद है और डीजल महँगा हो रहा है, तब भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि ऊर्जा की असली सुरक्षा किसी आयात समझौते में नहीं, अपनी मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जंतु और अपने पशुधन में है।
आगे का रास्ता
यह माँग नहीं है कि भारत ट्रैक्टर छोड़े और बैल की ओर पूरी तरह लौट जाए। अपेक्षा यह है कि हम उस 75% पशु-ऊर्जा क्षमता को पहचानें जो अभी बेकार पड़ी है। देसी नस्लों का संरक्षण और सुधार हो, बायोगैस संयंत्रों का विस्तार हो, गोबर खाद को नीतिगत प्रोत्साहन मिले, और छोटे किसान को यह विश्वास दिलाया जाए कि उसकी ऊर्जा संप्रभुता उसके अपने खेत में है।
दुनिया के इस पुनर्गठन में जो देश अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानेगा, वही दीर्घकाल में टिकेगा। भारत के पास वह ज्ञान है, वह परंपरा है, वह जैव-विविधता है। बस जरूरत है उसे ‘पुराना’ मानने की भूल न दोहराने की। होर्मुज बंद हो या खुला, वेनेजुएला अमेरिकी हो या स्वतंत्र, ईरान झुके या लड़े, भारत का हल्लीकर बैल सुबह उठकर खेत जोतता रहेगा। यही हमारी असली ऊर्जा सुरक्षा है। यही हमारी सभ्यता की विरासत है। और यही, आज के संकट में, हमारा सबसे विश्वसनीय भविष्य है।
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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।)
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