दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश
अनन्य की आँखों में नींद ही नहीं थी। यूँ तो रोज उसकी रात इतनी ही काली होती है, लेकिन आज तो अंधेरा छँटने का नाम ही नहीं ले रहा था। न जाने कौन सी लगी थी जो कमबख्त आज तक नहीं छूटी। शायद जिन्दगी में कुछ भी बेवजह नहीं होता। अनन्य को आज कुछ ऐसा ही लगा था, उसे वर्षों बाद सुनकर। पूरे दो साल 18 दिन बाद उसे करीब से सुना था। जिसे कभी गजल की तरह गुनगुनाता था, बीते दो सालों में उसे करीब से देखना तक मुनासिब न हुआ था। मगर आज अनन्या की आवाज सुनते ही उसकी तबीयत फिर मचल उठी थी। या यूं कहें कि कुछ नासाज सी होने लगी थी। उसे लगा कि अब फिर वही ज्वर (बुखार) जोर पकड़ने वाला है।
उसके पूरे बदन में सिहरन सी दौड़ गई थी। अपने 10 बाइ 10 के मिनाल रेसिडेंसी के दड़बे (छोटा कमरा) से बाहर निकलकर वह काफी देर से अकेला निशाचर की तरह टहलता रहा। सिगरेट के हर कश के साथ धुआँ बाहर फेंकते हुए, वह पुरानी यादों में खो गया था। उसे भान ही नहीं रहा कि कब सुबह हो गई। सहसा उसकी तर्जनी को जब सिगरेट की चिंगारी ने छुआ, तब उसे वक्त का एहसास हुआ। सिगरेट के तेज कश तो कब का उसे लील चुके थे। बची चिंगारी उसकी दो अँगुलियों तक पहुँच गई थी। उसने झटके से सिगरेट नीचे फेंकी और कंक्रीट के जंगल में नींद तलाशने तेजी से कदम बढ़ाते हुए गार्डन से निकलकर कमरे की ओर बढ़ गया।
अनन्य कमरे पर पहुँचा ही था कि सूरज की रोशनी तेज हो चली। जून का सवेरा यूँ भी बहुत सुखद नहीं होता। आलस्य से भरे उन दिनों में अब उसकी आँखें बोझिल हो रही थीं। सूरज को नमस्कार कर दबे पाँव वो कमरे के अन्दर दाखिल हुआ। जमीन पर बिछे बिछौने में एक ओर उसका छोटा भाई खर्राटे मार रहा था। दूसरी तरफ, दुनिया की भीड़ में यूँ ही अचानक मिला उसका बड़ा भाई राजा अपनी रोज की एक बोतल ‘रोमानोव’ वोदका गटकने के बाद चैन से सो रहा था। अनन्य ने उन दोनों के बीच अपनी जगह बनाते हुए धीरे से अपनी बेसुध काया को वहीं ढहा दिया। मानो कि जैसे कोई जिन्दा लाश खड़े-खड़े गिर गई हो। राजा अनन्य का सबसे बड़ा राजदार था। वह पहले ही इसकी वकालत कर चुका था कि अनन्या के मामले में अनन्य खुद को एक और मौका दे।
अलबत्ता, नींद के आगोश में आते ही अनन्य भूतकाल और वर्तमान के बीच कहीं पेंडुलम सा झुलता हुआ सपनों में खो गया। सोते हुए भी उसे अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी। मगर रूह में सुकून था कि एक बार फिर अनन्या उसकी जिन्दगी में लौट रही है। उस दरम्यानी रात अनन्या के एक फोन कॉल ने उसकी नींद उड़ा दी थी। लगभग साढ़े तीन घंटे लम्बी चली बातचीत में भी अनन्य बिना किसी सवाल के बस उसे सुनता रहा। जैसे अनन्या के शब्दों में शहद घुला हो। उसने ये पूछना भी गवारा नहीं समझा कि बीते पाँच सालों में तुम यूँ तीसरी बार उसकी जिन्दगी में क्या फिर से चले जाने के लिए आई हो, या कुछ देर ठहरोगी भी? अब साथ चलोगी ताउम्र, एक-दूसरे के चेहरे में झुर्रियाँ पड़ जाने तक या बीच राह फिर रास्ता बदल लोगी? वह तो इतना बदनसीब था कि अनन्या की मनमर्जियों के आगे उसने सिर झुका लिया था। इसे किस्मत का लेखा मान लिया था। फिर भी आज उसने पक्का मन बना लिया था कि अगली सुबह तय समय में नौ बजे मनुआभान की टेकरी पर वह अनन्या से मिलने जाएगा।
ये और बात है कि कॉलेज में पढ़ाई से लेकर अखबार की नौकरी तक बीते पाँच सालों में तीसरी दफा अनन्या लौटाबहुरी की रस्म निभा रही थी। इस बीच अनन्य कई बार तड़प-तड़प कर मरने जैसे एहसास से गुजर चुका था। पत्रकारिता का छात्र होने के बावजूद वह उतना खुले विचारों वाला नहीं था कि 21वीं सदी के ‘मॉडर्न लव’ को समझ सके। शायद इसीलिए उसके सभी दोस्त उसका मजाक उड़ाते हुए नहीं थकते थे। यूँ तो झीलों की नगरी भोपाल की धरती पर ही उसका इश्क परवान चढ़ा था, लेकिन उसके उतार-चढ़ाव अनन्य को भोपाल की सुकून भरी फिजा में भी कभी-कभी बेहद बेचैन कर देते थे। अनन्य अपने इश्किया ज्वर से कभी उबर ही नहीं पाया था। इसीलिए उसका पेशेवर जीवन बेहतर नहीं हो पा रहा था। बावजूद इसके वो इश्क़ और अश्क की दास्तां को आगे बढ़ाने के लिए अपने दिल के हाथों मजबूर था। भला दिल के आगे दिमाग की भी चली है क्या?
उस रोज तड़के 3.50 पर अनन्या का कॉल खत्म होते ही अनन्य ने लगभग सारा वक्त यह सोचते हुए बिता दिया कि वो अब और नहीं सहेगा। नहीं इस बार नहीं…बिल्कुल नहीं, वो अबकी बार हरगिज नहीं झुकेगा। इस दौरान लगभग दो डिब्बी गोल्ड फ्लैक की सिगरेट फूँक डालीं। लेकिन सुबह के पाँच बजते-बजते उसका इरादा बदल गया। नींद में जाने से पहले वह इन्हीं खयालों में डूबा हुआ था कि वह कैडबरी सिल्क, फ्रूट एण्ड नट और गुलाब का बुके लेकर अनन्या से मिलने जाए या यूँ ही खाली हाथ चला जए? शायद उसे ये इल्म भी नहीं था कि तकदीर उसकी जिन्दगी की किताब में दर्द की स्याही से अभी क्या कुछ लिख डालने वाली थी!
अनन्य के लिए रिश्ते-नाते पेशेवर जिन्दगी से बहुत बड़े थे। वह जिन्दगी की इबारत को इश्क के इतर से महकाना चाहता था। तभी तो भोर में सोने से पहले उसने अपने नोकिया-2600 मोबाइल से चार शायरी भरे स्वरचित मैसेज अनन्या भेज डाले थे। दर्द भरे शब्दों से आँसुओं में भीगे उसके अल्फाज़ अनन्या से सुबह की सम्भावित मुलाकात की गवाही दे रहे थे। उसने एक मैसेज में होने वाली मुलाकात के पहले ही लिखकर भेजा था, “सोए तो हम पहले भी थे तेरी गोद में सिर रखकर, मगर आज रूह को मिले सुकुँ ने कहा या खुदा दम निकल जाय यहीं सिसक-सिसक कर।” नींद के आगोश में चले जाने के बाद भी उसकी आत्मा पर फैला प्रेम का प्रकाश उसे आज सूरज की किरणों से ज्यादा महसूस हो रहा था। गोया कि आँखों के ठीक ऊपर किसी ने 200 वॉट का बल्ब जला दिया हो। तभी यकायक अनन्य की आँखें खुल गई। ये उसकी जिन्दगी की एक और खूबसूरत सुबह थी। घड़ी की टिक-टिक ने आठ बजा दिए थे। अनन्य नौ बजे की मुलाकात के लिए लेट नहीं होना चाहता था। सो, वह आनन-फानन में सिरहान रखी सिगरेट की डिब्बी और लाइटर लेकर कमरे के एक छोर पर बने गुसलखाने की तरफ बढ़ गया।
उस दिन उसे वह गुसलखाना भी शाही हमाम जैसा नजर आ रहा था, जहाँ उसने बदन को रगड़ना भी ठीक न समझा। रोज की सप्लाई का पानी भी उसे गुलाब जल से कम नहीं लग रहा था। हालाँकि घंटों गुसलखाने में घुसे रहने के लिए बदनाम हो चुका अनन्य आज 10 मिनट में फारिग होकर बाहर आ गया। और अब अपने पसन्दीदा लिबास से खुद को ढँक ही रहा था कि खटर-पटर सुनकर राजा की नींद खुल गई। अनन्य को इतनी सुबह सजा-धजा देखकर राजा ने तंज कस, “क्यों बे सोया नहीं क्या? इक मुलाकात के वास्ते इतनी भी बेचैनी ठीक नहीं।” अनन्य ने फिल्मी अंदाज में हाजिर जवाबी से एक गाने की लाइनें गुनगुना दीं, “जिन्दा रहने के लिए तेरी कसम, एक मुलाकात जरूरी है सनम”। राजा ने भी नसीहत देते हुए उबासी मारी और कहा, “जाओ मगर लौटकर सही सलामत आना। और सुनो कुछ लेकर जाना। मेरी अपाचे ले जाओ। जींस से 1,000 रुपए निकाल लो। गाड़ी में पेट्रोल नहीं है।” इतना सुनते ही अनन्य उछल पड़ा। फिर ‘लव यू भाई’ बोलकर फ्लाईंग किस देता हुआ बाहर निकल गया।
अनन्य को मिनाल रेसिडेंसी से मनुआभान की टेकरी तक पहुँचने में वक्त लगने वाला था। तभी उसका नोकिया-2600 टुनटुना गया। उधर से ऊँघती हुई आवाज़ में अनन्या ने कहा, “तुम आधे घंटे लेट निकलना। मुझे भी एमपी नगर से लेते हुए चलना। मेरी स्कूटी सुनीता लेकर चली गई है। अब मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगी।” अनन्य की खुशी का तो जैसे ठिकाना ही नहीं रहा। वो बाहर पोर्च में खड़ी टीवीएस अपाचे को पोंछने में जुट गया। वह दो ही मिनट में आनंद के सागर में गोते लगाते हुए बीते दो सालों की कड़वाहट भूल गया। उसे इतना भी याद न रहा कि इसी कमरे में कितनी बार राजा के कन्धे पर सिर रखकर वह रोया है। जैसे इश्क से बड़ा कोई दर्द ही न हो।
एक समय वह कितना असहाय और लाचार हो गया था? वह एक पल में सब भूल गया कि कैसे उसके दिल का दर्द जिस्म में भी नुमाया हो गया। बीते पाँच सालों में उसकी इश्किया दास्तान का एक पन्ना ऐसा भी था, जिसमें उसके जिस्म ने उसका साथ छोड़ना शुरू कर दिया था। कभी आधी रात को तो कभी ठीक कॉलेज के इम्तिहान के बीच में उसे दौरे पड़ जाते थे। वो बेसुध छटपटाता रहता था। अनन्य के दिल का दर्द उसके सीने को चीरता हुआ कब उसके पीठ में खंजर की तरह चुभने लगा था, उसे पता भी नहीं चल सका था।
बहरहाल उसने अपने दर्द को पालना सीख लिया था। वो अब दर्द को आँसुओं से बहा देने का हुनर जानता था। वो अकेले में ही सही बड़ी झील के पानी में अपनी आँखों का सैलाब बुझाता रहता था। ये इश्क़ की मेहर ही थी कि गए सालों में धीरे-धीरे उसके आँसुओं ने भी उसका साथ छोड़ दिया था। मगर दिल के किसी कोने में दफन करके रखी इश्किया किताब के पन्ने फिर हवा के झोंकों से उड़ने लगे थे। घड़ी की सुई उस बीते वक्त पे जाकर ठहर गई थी, जहाँ से उसकी कहानी ने नया मोड़ लिया था। उसे सब कुछ पानी की तरह साफ-साफ नजर आ रहा था। उसका दिमाग कह रहा था, “या खुदा तेरी पनाह में ले ले मुझे। अब उस सूकून में जाने को दिल गवारा नहीं करता। ये इश्क की तासीर ही ऐसी है कि मेरी तबीयत अक्सर नासाज हो जाती है।”
ये बात और है कि आज बाइक पोंछते हुए अनन्य का दिल उसके रोकने पर भी नहीं रुक रहा था। वह इसी उधेड़बुन में था कि आगे क्या होगा? इस डगर में और क्या नसीब होगा मुझे? तभी अचानक जैसे उसके दिल से एक आह निकली। उसने मन ही मन ईश्वर को याद करते हुए आकाश की ओर देखा और प्रार्थना करते हुए कहा, “हे मालिक मुझे नहीं पता कि क्या होगा, मगर सच कहूँ तो एक बार फिर मुझे इस गुनाह-ए-अजीम में डूब जाने को जी करता है। या मेरे मालिक, उसे हमेशा खुश रखना। पर न जाने क्यों बहुत डर लग रहा है कि अबकी बार फिर वह गई तो जिन्दगी के इन गलीचों में लौट न सकूँगा। तो, हर बार की तरह मुझे छोड़कर जाने के लिए मत आना रहमदिल। अब जी नहीं पाऊँगा तेरे बगैर।” यूँ तो सबकी जिन्दगी में ख्वाब अधूरे रहते हैं। मंजिल मिलती नहीं और तलाश ताउम्र बनी रहती है। मगर उस प्यासे का क्या कहिए, लहरें जिसके सामने से मचलते हुए निकल जाएँ?
अनन्य ने ऊपर वाले से बस आज के लिए इतनी सी इल्तज़ा की थी। वह मन ही मन प्रार्थना कर ही रहा था कि उसकी सालों से पथराई आँखों में आँसुओं का सैलाब उमड़ आया। घड़ी नौ बजाने वाली थी, तभी नोकिया-2600 फिर टुनटुना गया। कॉल रिसीव करते ही अबोध सी आवाज ने कान में मिसरी घोलते हुए कहा, “तुम निकले नहीं क्या? पूरे नौ बज गए हैं.. मैं अपने कमरे के पास वाले अमूल पार्लर के पास तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ।” अनन्य ने खुद को सँभालते हुए कहा, “बस 10 मिनट में पहुँच रहा हूँ।” उसने मोबाइल को पतलून की जेब में रखा। हेलमेट के खुले शटर से चेहरे को छूती हवा ने उसके आँसू पोंछ दिए और अनन्य ने मन ही मन अनन्या को याद करते हुए कहा, “मैंने पुराने जख्मों पर तुम्हारी यादों के फाहे रख दिए हैं। अब जो होगा, देखा जाएगा।”
अगले ही पल पीले रंग की अपाचे-280 सीसी का सेल्फ स्टार्ट वाला लाल बटन दबा और गाड़ी हवा से बातें करने लगी। एक बार फिर अनन्य अपनी इश्क की अधूरी दास्तां लिखने के सफर पर निकल चुका था…!!
क्रमशः…आगे पढ़िए, “आवारा की डायरी”-2, बहुत जल्द।
#आवाराकीडायरी #aawarakiidiary
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नोट : यह ‘आवारा की डायरी’ नामक अप्रकाशित उस पुस्तक के स्मृति शेष अंश हैं, जिसकी पांडुलिपि तकनीकी खामियों से सालों पहले लैपटॉप से उड़ गई। अब स्मृतियों के जखीरे से यादों को कुरेद- कुरेदकर कड़ी-दर-कड़ी उसे फिर से जीवित करने का यह प्रयास मात्र है।
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पिछली कड़ियाँ
1- आवारा की डायरी : प्रेम हर जख्म का सबसे बड़ा मरहम है!
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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं से अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। कभी लेख तो कभी कविता की सूरत में। अपने लिखे हुए को #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा भी करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक पहुँचें।)
