दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश
अनन्य बड़ी मुश्किल से अपनी बेकरारी को सँभालते हुए हवा को चीरता ठीक 9 बजकर 15 मिनट में अनन्या के कमरे के नजदीकी अमूल पार्लर पर खड़ा था। हँलमेट उतारते ही उसने अपने बेताब दिल की धक-धक को सुना, जो उसके गाँव के लोहार काका नोनेलाल की धौंकनी से तेज धड़क रहा था। खुद को थोड़ा संयत करते हुए उसने सबसे पहले घड़ी की सुइयों को ओर देखा। वह मानता था कि भले लड़के अक्सर मोहब्बत में माशूक को इंतजार नहीं कराते, बल्कि हाथों में गुलदस्ता लिए उसकी राह तकते हैं। इसमें अपनी खुशनसीबी समझते हैं। इसीलिए यह देखकर वह आश्चर्य से भर गया कि महज 15 मिनट में उसने अपाचे से फर्राटा भरते हुए मिनाल रेसिडेंसी से एमपी नगर तक का रास्ता नाप दिया था। हालाँकि अनन्या अभी तक उसे नजर नहीं आ रही थी।
उसे यह देखकर तसल्ली हो रही थी कि उसे समय पर पहुँच गया है। उसने जींस के जेब से नोकिया 2600 को आजाद करते हुए मोहतरमा का नम्बर डायल कर फोन कान पर रखा ही था कि ‘वीर जारा’ फिल्म के गाने ‘तेरे लिए हम हैं जिए हर आँसू पिये, दिल में मगर जलते रहे तेरी चाहत के दिए’ वाली सुपरिचित सी रिंगटोन बज उठी। इसी रिंगटोन ने एक रात पहले उसकी गहरी निद्रा को भंग कर दिया था, क्योंकि शनिवार का साप्ताहिक अवकाश होने के कारण उस रोज वह दफ्तर से मुक्त था और 11 बजे ही घोड़े बेचकर सो गया था। अब भला उसे क्या पता था कि अगले पहर 12 बजते ही उसकी जिन्दगी में मोहब्बत का साइक्लोन फिर दस्तक देने वाला है।
बहरहाल कॉल रिसीव करते ही उधर से शिकायती लहजे में कहा गया, “मैं अमूल पार्लर के पास हूँ। तुम पहुँचे नहीं अब तक?” अनन्य कुछ बोलता कि इसके पहले ही सफेद लिबास में लिपटी उसकी जिन्दगी सामने से आती हुई दिखाई दी। अनन्या की तमाम बेअदबियों के बावजूद अनन्य ने आज तक कभी उससे ऊँची आवाज में बात तक नहीं की थी। सो आज भी उसने हँसते हुए शायराना अंदाज में अपनी लिखी दो पंक्तियाँ चिपका दीं-
“वो शिकायत करते हैं कि मेहरबाँ आते-आते बड़ी देर कर दी,
हम तो उनकी राहों में दिल बिछाए बैठे हैं, उन्होंने हद कर दी”
अनन्या ने अपाचे की पिछली सीट पर अपना हक जताते हुए बैठते ही कहा, “अपनी चीप शायरी छोड़ो और जल्दी चलो। आज सण्डे है मेरे बॉस का वीक ऑफ रहता है। मुझे स्पोर्ट डेस्क अकेले ही सँभालना होगा। ये कोई मजाक नहीं है।” अनन्य ने भी हाजिर जवाबी से कहा, “ये साला तुम्हारा अखबार भी न, पिद्दी सी सैलरी में खून चूसता है खून। मुझे देखो, कल सैटरडे का अपना वीक ऑफ तो था ही और आज मैंने एडवांस में वेलेन्टाइन डे मनाने के नाम पर बॉस का ही वीक ऑफ चाट लिया।” अपाचे का सेल्फ और आँख मारते हुए अनन्य बोला, “मोहतरमा मोहब्बत और जंग में सब जायज है। बॉस का एक वीक ऑफ नहीं खा सकीं तुम..क्या यार? फिर सालों बाद की इस मुलाकात का क्या मतलब, जब तुम्हारे पास वक्त ही नहीं है? मुझे मिलने का वक्त ही क्यों दिया?”
इससे पहले कि अनन्य एक्सलरेटर देकर गाड़ी आगे बढ़ाता महबूबा ने दोनों हाथों से बड़े दिनों बाद मिले महबूब के कमर की दोनों बगलों की प्यार से चिकोटी काट ली और कहा, “चलो न बाबा प्लीज…यहीं खड़े-खड़े सारा पचौरा कर लोगे क्या? मैंने सर को बोल दिया है मॉर्निंग मीटिंग नहीं करूँगी और आज थोड़ा लेट भी जाऊँगी शाम को छह बजे तक। कुछ समझ आया।” इतना सुनते ही आशिक की रगों में 120 की रफ्तार से जैसे खून नहीं मोहब्बत दौड़ गई हो। उसने अपने कन्धे तक आ रही जुल्फों को सँवारते हुए हेलमेट लगाया और अगले ही पल उसकी बाइक हवा से बातें कर रही थी। एमपीनगर के बोर्ड ऑफिस चौराहा से वाया न्यू मार्केट-वीआईपी रोड होते हुए मनुआभान टेकरी के लिए अनन्य ने बाइक दौड़ा दी। वह जल्द से जल्द टेकरी पहुँचना चाह रहा था। उसे जून 2012 की इस सुबह की धूप आज बिल्कुल तेज नहीं लग रही थी। बहुत हल्की तपिश में घुली हवा भी उसे ठंडक दे रही थी।
न्यू मार्केट रोड पर 74 बंगले वाला मोड़ क्रॉस होते ही अनन्य खुद को महबूबा की बाहों की गिरफ्त में महसूस किया। उसे फिर पुराने दिन याद आ गए। प्रेस कॉम्प्लेक्स स्थित एमसीयू कैम्पस में हुई उसकी पहली मुलाकात और पहले सेमेस्टर के खत्म होने से पहले ही फ्रेशर्स पार्टी वाले दिन अनन्या का इजहार-ए-मोहब्बत। सब उसकी आँखों में तैर गया। जैसे सामने कोई फिल्म चल रही हो। तभी अचानक हेलमेट से बाहर आकर झण्डे की चोटी की तरह फहरा रही उसकी जुल्फों को घोड़े की लगाम समझकर अनन्या से जोर से खींचा। अगले ही पल अनन्य बाइक के ब्रेक पर एकदम चढ़ गया। वह आईटीआई चौराहे को क्रॉस ही करने वाला था, लेकिन चौतरफा ट्रैफिक के बीच सिग्नल तोड़कर जाते बाइक सवार से लड़ते-लड़ते उसकी जुल्फों वाली लगाम ने उन दोनों को ही बचा लिया।
अनन्या ने जोर से चिल्लाते हुए कहा, “कहाँ खो गए हो? सामने वाला नशे में है शायद..! लगता है, तुम भी आज सुबह-सुबह भाँग चढ़ाकर आए हो?” इसी बीच सिग्नल हरा हो गया और अनन्य ने बाइक आगे बढ़ाते हुए लापरवाह अन्दाज में कहा, “मैंने कल ही हमारी इस तय मुलाकात पर लिखा था- सोए तो हम पहले भी थे तेरी गोद में सर रखकर, मगर आज रूह को मिले सुकून ने कहा या खुदा दम निकल जाए यहीं सिसक-सिसक कर।” अब तुम ही कहो कि यूँ भी तुम्हारे साथ जिन्दगी नसीब हो नहीं रही है, तो कम से कम तुम्हारे साथ मौत ही आ जाती। भला इससे बेहतर क्या होता। अनन्या का मन जैसे कसैला हो गया हो। वह भी न जाने किस सोच में डूब गई। उसने अनन्य की बातों पर प्रतिक्रिया देने में कुछ ज्यादा का ही वक्त ले लिया। बाइक अब कमला पार्क तक पहुँच चुकी थी। अनन्य ने ब्रेक मारते हुए बाइक ठीक पार्क के उलट बड़ी झील की मुण्डेर पर लगा दी। अचानक बाइक रुकने से अनन्या का सिर हेलमेट से टकरा गया। उसकी तन्द्रा टूट गई और गुस्सा जाग गया। उसने लगभग डाँटते हुए अनन्य से कहा, “क्या करते हो यार? तुम्हें एकदम शऊर नहीं है बाइक चलाने का। ये अपाचे तुम्हारे बस की नहीं है। अपनी पल्सर ही लेकर आए होते। बड़ा लड़कियों को इम्प्रेस करने आए हैं अपाचे लेकर। सर फोड़ दिया मेरा। अभी सालभर पहले ही सीखी है न, तुमने बाइक। उससे पहले मेरी ही स्कूटी में पीछे बैठकर पूरा भोपाल घूमा है तुमने। यहाँ बाइक क्यों रोकी अचानक?”
यूँ तो अनन्य बेहद गुस्सैल स्वभाव का था, लेकिन न जाने क्यों अनन्या के सामने वह गुस्से को गंगाजल की तरह पी जाता था। उसने थोड़ी तेज मगर सधे हुए स्वर में कहा, “ये मेरा हुनर है कि एक गाँव का लड़का सालभर में बाइक सीखकर सीधा राजधानी की सड़कों पर दौड़ा रहा है। तुम तो जानती हो कि मुझे अपनी कमाई से खरीदी दुपहिया से ड्राइव करना सीखना था। इसीलिए कभी नहीं सीखा और हाँ मैंने पल्सर सर्विसिंग के लिए कल दोपहर बाद ही एजेंसी में दी है। अब सोमवार को ही मिलेगी। दूसरा कि ये बाइक भी मेरे भाई की है। कोई उधार या चोरी की नहीं। देखो सुबह-सुबह बेमतलब में मत उलझो। अभी चन्द घण्टे भी नहीं हुए मिले कि झगड़ा शुरू कर दिया। तुम्हें फूल बहुत पसन्द हैं, वो देख उस तरफ पार्क के सामने तेरे लिए बुके बनवाने जा रहा था। बस, इसीलिए खड़ी की है बाइक। मुझे डिवाइडर क्रॉस करके उस तरफ जाना पड़ेगा।” अनन्य बिना एक और शब्द बोले आगे बढ़ गया। तेजी से रोड के उस पार जाते ही उसने पार्क के सामने फूलों की छोटी सी दुकान में बैठी बुर्के वाली अम्मा से कहा, “कों चची जे बुके कित्ते में?” “24 गुलाब बाले गुलदस्ते पूरे 200 रुपे का हेगा “, वह बोलीं।
अनन्य ने छुट्टे देकर फटाक से बुके लेकर लौटने में ही भलाई समझी, क्योंकि उस तरफ गुस्से में लाल टमाटर हो रही खूबसूरत बला जो खड़ी थी। वरना उसे भोपाली में बात करना बहुत भाता था। हालाँकि भोपालियों का हर दूसरी बात पर गाली देना उसे एकदम गैरजरूरी लगता था। अलबत्ता उसे यह पता नहीं था कि बनारस में तो हर हर महादेव कहते हुए भी लोग गाली देना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। तो जैसे वह भद्दपन भाषा की देशज मिठास लिए बनारस की नस-नस में है। वैसे ही भोपाली जबान भी “कों खाँ, मियां, जैसे शब्दों और स्थानीय लहजे वाले अपशब्दों के बिना विधवा सी लगेगी शायद। स्थानीय बोलियों की यह सुन्दरता मुझे बाद में समझ आई।
उस पार खड़ी लाल-पीली हो रही लड़की ने जैसे ही उम्मीद से ज्यादा दो दर्जन रंग-बिरंगे गुलाब देखे, तो खुशी से जैसे बावली हो गई। अनन्य जानता था कि मेरी इस कली को फूल बहुत पसन्द हैं। उसने रोमांटिक अन्दाज में झुककर बुके देते हुए कहा, “अब भी गुस्सा हो जानेमन।” “तुम मुझे मनाना अब तक नहीं भूले,” उसने कहा, “अच्छी तरह जानते हो कि छोटी-छोटी बातों और चीजों से मुझे खुशी मिल जाती है। अब चलो भी धूप तेज हो रही है। यूँ भी तुम बहुत धीमी रफ्तार से बाइक चलाते हो।” अनन्या को मुस्कराते देखकर अनन्य ने राहत की सांस ली और हेलमेट उसे पकड़ाते हुए अपनी जुल्फों को झटकर कर चश्मा ठीक किया और अपाचे का सेल्फ दबा दिया।
अनन्या ने उसके लड़कियों जैसे लम्बे इतने प्यारे घुँघराले बाल इतनी करीब से पहली बार देखे थे। यूँ तो वो उससे बीते दो सालों में जब भी टकराई एकदम किनारा कर लिया था। लेकिन अनन्य का बदला हुआ लुक हो या अनन्या का जाग उठा जमीर, वह उसे फिर से अपनी जिन्दगी में वापस देखना चाहती थी। उसने अपाचे के रफ्तार भरते ही अनन्य के कान में चिल्लाकर कहा, “क्या बात है अनन्य…मेरे बाद किसी और लड़की से मोहब्बत हो गई है क्या? बड़े स्टाइलिश रहने लगे हो आजकल। लम्बे बाल, चश्मा, फटी रिब जींस, शॉर्ट अरमानी कुर्ता, स्नीकर शूज और ये बाइसेप्स। एकदम नए अवतार में लग रहे हो, मॉडलिंग का इरादा है क्या?” जवाब में अनन्य ने जोर से ठहाका लगाया और कहा, “सब तुम्हारा करम है मेरी जान। तुमने जैसे ही मुझ पर ध्यान देना छोड़ दिया, तो लगा कि अन्दर सब खोखला हो रखा है। जिस्म को ही बाहर से मढ़ लेता हूँ। शायद मुझ पर नजर पड़े और तुम्हारा इरादा बदल जाए। इसीलिए तो भोपाल भी नहीं छोड़ा।” यूँ ही दोनों एक-दूसरे को छेड़ते, नोक-झोंक करते मनुआभान की टेकरी पहुँच गए।
अब टेकरी तक ऊपर जाने वाली खड़ी चढ़ाई की तीन किलोमीटर लम्बी सड़क पार करनी थी। अनन्य ने बाइक बन्द करके अनन्या के हैण्डबैग से पानी की बोतल निकालकर दो चार घूँट मारते हुए पाँच मिनट का पॉज लिया। इसके बाद गाड़ी को पहले और दूसरे गियर में रोटेट करते सीधे ऊपर की ओर रुख कर लिया। अगले कुछ ही मिनटों में दोनों टेकरी के ऊपर थे। अनन्य ने पार्किंग में बाइक पार्क की। हालाँकि ये बात और है कि उसके दिल की जमीं पर अनन्या नाम का जहाज उतर तो गया था, लेकिन उसकी स्थायी पार्किंग नहीं हो पा रही थी। इसी बीच, अनन्य ने बाइक से उतरते ही अनन्या के हाथों में हल्का का चुम्बन दे दिया। अनन्या चौंक गई। उसने हाथ झटकते हुए कहा, “क्या कर रहे हो? पागल हो गए हो क्या?” अनन्य को ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी।
उसके चेहरे के भावों को अनन्या ने तुरन्त ताड़ लिया और बोली, “अरे बाबा, तुम बुरा मत मान जाया करो। मेरी तरफ से लड़की होकर भी सोचा करो। सामने मन्दिर है। यहाँ सब लोग आते हैं? किसी पहचान वाले ने देखा तो बातें बनाएँगे। चलो अब, हम पहले वहाँ मन्दिर में जाकर भगवान के दर्शन करेंगे। फिर उसके पीछे जो चट्टानों और हरे-भरे पेड़ों से भरी ये टेकरी है, उसी की गोद में इत्मिनान से बैठेंगे। वहाँ बैठकर बहुत सारी बातें करेंगे।” अनन्या की लड़खड़ाती सी आवाज बीच-बीच में हवा के झोंके से जैसे उड़ सी रही थी। दो कदम के फासले पर खड़े अनन्य को भी सही से सुनाई नहीं दे रही थी। लेकिन उसकी आँखों में झर आए आँसुओं को अनन्य देख चुका था।
अनन्या कह रही थी, “मुझे तुमसे ढेर सारी बातें करनी हैं। बीते दो सालों में जो हुआ, उसके बारे में बताना है। प्लीज चलो न अनन्य। वहाँ से भोपाल का नजारा भी बहुत प्यारा दिखता है। तुम्हें तो पसन्द है न यह सब? यकीनन इसे देखकर तुम्हें गाँव का कोई पहाड़ याद आ जाएगा। तुम गाँव को याद करना और मैं तुम्हारे साथ वहीं बैठकर शान्ति से जी भरकर बातें करूँगी। मैं तुम्हारी आँखों में खुद को निहारना चाहती हूँ। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई है अनन्य। मैं तुम्हारी आँखों में आँखें डालकर तुमसे दिल से एक आखिरी बार माफी माँगना चाहती हूँ। क्या तुम मुझे माफ नहीं करोगे यार? हम इस रिश्ते के पहले एक-दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त थे न? तुम्हें उसी दोस्ती की कसम।”
अनन्य कुछ और सोचता या समझता कि उससे पहले ही अनन्या की डबडबाई आँखों से उसका दिल पसीज गया। न जाने क्यों अलबत्ता, उसकी रूह में अनन्या का माफीनामा सुनने के बाद भी एक अजीब सा डर था कि जैसे कोई समुद्री तूफान (साइक्लोन) आने वाला हो और उसकी मोहब्बत का जहाज डूब जाने वाला हो। इसके पहले कि अनन्य कोई और प्रतिक्रिया देता, अनन्या उसका हाथ पकड़कर उसे मन्दिर की ओर ले जाने लगी..!!
क्रमशः…आगे पढ़िए, “आवारा की डायरी”-3, बहुत जल्द।
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नोट : यह ‘आवारा की डायरी’ नामक अप्रकाशित उस पुस्तक के स्मृति शेष अंश हैं, जिसकी पांडुलिपि तकनीकी खामियों से सालों पहले लैपटॉप से उड़ गई। अब स्मृतियों के जखीरे से यादों को कुरेद- कुरेदकर कड़ी-दर-कड़ी उसे फिर से जीवित करने का यह प्रयास मात्र है।
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2 – आवारा की डायरी-1 : जख्म पर तुम्हारी यादों के फाहे रख दिए हैं
1- आवारा की डायरी : प्रेम हर जख्म का सबसे बड़ा मरहम है!
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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं से अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। कभी लेख तो कभी कविता की सूरत में। अपने लिखे हुए को #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा भी करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक पहुँचें।)
