अभिलाष खांडेकर, भोपाल मध्य प्रदेश
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने गौरवशाली 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं, जिसके लिए यह राजनीतिक-सांस्कृतिक संगठन हार्दिक प्रशंसा का पात्र है। ब्रिटिश भारत में प्रखर राष्ट्रवादी और कांग्रेस नेता डॉ. के.बी. हेडगेवार द्वारा स्थापित संघ का अपने जन्म के साथ अनगिनत विवाद जुड़े रहने का इतिहास रहा है। लेकिन संघ ने तीन विवादास्पद प्रतिबंधों सहित अनेक अन्य विवादों-चुनौतियों को सफलतापूर्वक झेला। संघ अब एक दुर्जेय राष्ट्रीय शक्ति है, जो इसके कट्टर वैचारिक विरोधियों को भी स्वीकार करना होगा। यह अलग बात है कि कई स्वार्थी लोग या बेरोजगार युवा, बिना किसी जाँच-पड़ताल के, अनुशासित संघ या इसके अन्य घटक बजरंग दल, विहिप या भाजपा जैसे सहयोगी संगठनों से तेजी से जुड़ते जा रहे हैं। अधिकतर नए लोग सत्ता का स्वाद जल्दी चखना चाहते हैं!
खैर, पीछे मुड़कर देखें तो सभी सरसंघचालकों – हेडगेवार, गोलवलकर गुरुजी, बालासाहब देवरस, राजेंद्र सिंह, केएस सुदर्शन और डॉ. मोहन भागवत – को निस्संदेह विभिन्न कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन 10 दशकों में कानूनी, वैचारिक और राजनीतिक हमले लगातार होते रहे। सरसंघचालकों के सामने भीतर से भी चुनौतियां आईं, लेकिन संघ ने कभी अन्य संगठनों की तरह कोई विभाजन नहीं देखा। इसलिए संगठन का अनुशासन प्रशंसनीय है। इनमें से ज्यादातर वर्षों में उसे सरकारी समर्थन हासिल नहीं था, जो 2014 के बाद नरेन्द्र मोदी से ठोस रूप से मिला है। कुछ हद तक अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान भी संघ की चमक दिखी थी, किन्तु उदारवादी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान सुदर्शन के सरसंघचालक रहते हुए संघ-भाजपा के रिश्ते तनावपूर्ण रहे। पुरानी पीढ़ी के कट्टर स्वयंसेवक, हालाँकि मानते हैं कि सत्ता हो या न हो, ‘भारत का भाग्य गढ़ना उनका मिशन’ है।”
इसलिए, यह सुदर्शन ही थे जिन्होंने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की शुरुआत करके मुसलमानों को औपचारिक रूप से संघ परिवार में लाया था, जिसे मधुकर देवरस द्वारा गैर-हिन्दुओं को साथ लाकर संघ का आधार बढ़ाने के पहले किए गए प्रयासों का ही विस्तार माना गया। नया और पुराना इतिहास बताता है कि शुरू से ही तीन बातों पर संघ अडिग रहा है: हिन्दू राष्ट्र, संविधान से अनुच्छेद-370 का खात्मा और अयोध्या में राम मन्दिर। इनमें से दो काम पूर्व ‘प्रचारक’ मोदी ने पूरे कर दिए हैं। संघ के जन्म से तीन साल पहले, 1922 में, वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दुत्व’ में जिस हिन्दू राष्ट्र की वकालत की थी, वह आज भी एक सपना है, परन्तु संघ उसे नही छोडेगा। हिन्दू महासभा एक उग्र हिंदू संगठन था, जो हिन्दू एकीकरण के लिए काम करता था। वही काम अब संघ कर रहा है।
दूसरे शब्दों में, राष्ट्रीय चेतना को जगाने और हेडगेवार-सावरकर के विचारों के लिए व्यापक समर्थन प्राप्त करने में एक सदी से भी अधिक समय लग गया लेकिन पिछले 10 वर्ष फायदेमंद रहे। संघ परिवार के लोग अब अधिक आशावादी हो गए हैं। प्राचीन योग को विश्व स्तर पर स्वीकार किए जाने और संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किए जाने के साथ, भारतीय मूल्य और शिक्षाएँ भी जल्द ही अन्य देशों में प्रबल हो जाएँगी, ऐसा वे मानते है। इसलिए, अपनी समय-परीक्षित सौम्य ताकत के माध्यम से भारत के पुनः ‘विश्व गुरु’ बनने के विचार को अब प्रबल होते देखते है।
संघ समर्थित, या उनके कार्यकर्ताओं से बनी सरकार के समय संघ और उसके 32 में से ज्यादातर सहयोगी संगठनों की सदस्यता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. हालाँकि संघ अपनी शाखाओं और स्वयंसेवकों के सामाजिक सम्पर्क कार्यक्रमों के जरिए अपना काम फैलाने में अधिक विश्वास रखता है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं हो सकता कि सत्ता में भाजपा के आने से संघ के कार्य का जाल दूर-दूर तक फैल गया। नए-नए व बड़े कार्यालय खड़े हो चुके है, चाहे संघ हो, विद्यार्थी परिषद या मजदूर संघ हो। संक्षेप में, संघ परिवार मोदी सरकार की मदद से ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के लक्ष्य की ओर बिना संयम खोए बढ़ रहा है। पत्रकार अक्सर संघ-भाजपा के बीच मतभेद पर गहन चर्चा करतें है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि सरसंघचालक डॉ. भागवत के बिना मोदी शायद प्रधानमंत्री नहीं बन पाते।
मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी को तत्कालीन संघ नेतृत्त्व नापसंद करता था। ऐसे में श्रेय तत्कालीन सहकार्यवाह भागवत को जाता है, जिन्होंने उस खाई को पाटा। उन्होंने मोदी के एक पुराने व्यावसायिक मित्र से अनापेक्षित पत्र मिलने के बाद 2007 में अहमदाबाद का दौरा किया और सारे समीकरण नए तरीके से समझे। पत्र में मोदी-मित्र ने मुख्यमंत्री की जोरदार पैरवी की थी। अन्दरूनी सूत्रों का दावा है कि दूरदर्शिता वाले भागवत की उस अहम यात्रा ने ही अगले इतिहास की पहली इबारत लिख दी थी। अपने शताब्दी वर्ष में संघ को एक प्रचारक प्रधानमंत्री ऐसे ही नहीं मिला।
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(नोट : अभिलाष जी मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर जैसे देश के शीर्ष अखबारों में सम्पादक रह चुके हैं। उनका यह लेख मेल के जरिए #अपनीडिजिटलडायरी तक पहुँचा है और उनकी सहमति से ही प्रकाशित किया गया है।)
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