समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश
भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनकी जगह नए मुख्य न्यायाधीश को चुने जाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अगले कुछ दिनों गवई की जगह नए मुख्य न्यायाधीश ले लेंगे। चेहरा बदल जाएगा, लेकिन कुछ सवाल पहले की तरह ही बने रहने वाले हैं, ऐसा लगता है। इनमें एक यह भी कि क्या कठघरे में न्याय का पुतला ‘नवोन्मेष का चिह्न’ हो सकता है? तो जवाब है- हाँ।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राकेश किशाेर द्वारा सीजेआई गवई को जूता दिखाना अशोभनीय कृत्य था। लेकिन वह जिस आत्ममुग्ध और निरंकुशता प्रदर्शित करने वाले विवादास्पद वक्तव्य के विरोध में किया गया, वह भी कोई प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। यह घटना पूरे मामले को समग्रता से देखने का आह्वान करती है। क्योंकि न्याय तंत्र एक राष्ट्र का वह मूल आधार होता है जो नैतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों के आधार पर समाज को धुरी देता है। सत्ताएँ चाहे वे लोकतांत्रिक ही क्यों न हो, समसामयिक पूर्वग्रह, कमजोरियों और कमियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहतीं। ऐसे में न्याय तंत्र से ही अपेक्षा होती है कि वह दीर्घकालीन साभ्यतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप समाज का संरक्षण और संवर्धन करें।
वे देश यकीनन दुर्भाग्यशाली होते हैं, जहां न्याय तंत्र अपने मूलभूत मूल्यों से भटक जाते हैं। ऐसा पथभ्रष्ट न्यायतंत्र दीर्घकालिक हित ने नाम पर ताकत की तलवार तो चलाता है, किन्तु विचारधारा के स्तर पर अमूमन संकीर्ण, आयातित या औपनिवेशिक हितों का प्रसार करता रहता है। यानि, एक विकृत न्याय तंत्र नागरिकों के हितों की बात करता है, वह यथार्थ में हित की आड़ में बाहरी औपनिवेशिक तंत्र के फायदे के लिए ही होता है। इस मायने में भारत भी बदनसीब है। ब्रितानवी सरकार से आजाद होने के बाद उसी की मदद से गणतंत्र बने भारत ने अपने निजी मूल्यों को संवर्धित करना उपयोगी नहीं समझा।
संभव है, दासता के लम्बे इतिहास ने हमारे नेतृत्त्व का पौरुष रौंद दिया हो। इसीलिए सत्ता तंत्र ने अपनी सभ्यता के संवर्धन के कठोर अनुशासन की माँग करने वाला परिश्रमजन्य मार्ग छोड़कर औपनिवेशिक ढाँचे को गणतंत्र का आधार बनाया। कार्यपालिका और न्याय तंत्र भी औपनिवेशिक व्यवस्था के विस्तार-सी रही। लिहाजा, विधायिका-कार्यपालिका और न्यायपालिका का यह अन्योन्याश्रय, भारतीय सभ्यता के विरुद्ध दुरभिसन्धि बन गया। इससे बचना या कह लें इसे पराजित करना ही हर भारतीय के सामने निजी और सार्वजनिक कर्त्तव्य के स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती है।
इस दुरभिसन्धि के दुष्परिणाम हमारे लिए घातक हैं। यह दीमक की तरह हमारे मूल्यों को चट कर रही है। पहले के समय में हमारा सामाजिक आर्थिक दर्शन होता था- उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी, भीख निदान। मतलब सबसे बढ़िया काम है खेती करना, फिर व्यवसाय, ये दोनों न मिलें तो भिक्षा माँगकर जीविकोपार्जन कर लें लेकिन चाकरी नहीं क्योंकि वह अधम, सबसे निकृष्ट है। अब स्वातंत्र्योत्तर भारत की स्थिति को देखें, जहाँ हम विकास और प्रगति के नए सोपान चढ़ रहे हैं लेकिन उत्पादन करने वाले कृषि, उद्योगों में लोगों रुचि नहीं लेते। आखिर क्यों? इसी तरह, देश में सरकारी या बहुराष्ट्रीय कम्पनी के प्रति उन्माद घटने की जगह बढ़ क्यों रहा है? आधुनिक शिक्षा हासिल किया हुआ पढ़ा लिखा आदमी नौकरीपेशा जिन्दगी जीने को ही क्यों तरजीह देता है?
कारण साफ है कि गणतंत्र वास्तव में उत्पादन में विश्वास नहीं करता। वह तो उपनिवेशी सोच में है, जहाँ उत्पाद, व्यवसायी, उद्योगी लोग गुलामों की तरह है। स्वतंत्र भारत के लोक साहित्य और मनोरंजन माध्यमों में उत्पादक, धनार्जन करने वाले मेहनती लोग ‘खलनायक‘ है। और उच्च शिक्षण संस्थानों से कुछ अट्टपट्ट पढ़ा लिखा हर जिम्मेदारी से स्वतंत्र, स्वच्छंदवादी भोगाकांक्षी ‘नायक’ है। ऐसे असंख्य अधकचरे आयातित मूल्यों की जबरन स्थापना हमारे अस्तित्व की जड़ें खोद रही है, और गणतंत्र के अंग इस वैचारिक हिंसाचार के सबसे बड़े झंडाबरदार बने होते हैं।
समस्या तब विकराल रूप ले लेती है, जब सत्ता तंत्र को इन अधोगामी मूल्यों को निर्लज्जता से स्थापित करने के लिए न्यायपालिका से नित नया समर्थन मिलता है। अनर्गल बयान कर चुहलबाज मीडिया तंत्र में खुद को शेर साबित करने की नई वासना ने कचहरी के कई कारिन्दों को जकड़ लिया है। इसके बाद वही होता है, जिसकी उम्मीद की होती है। लोग ऐसे बयानों पर बहस-मुबाहिसा कर व्यर्थ की बौद्धिकता में जुट जाते हैं। उपनिवेशकाल में जिस वर्ग को मुकदमेबाजी का शगल था अब वह बहसबाज भारतीय ऐसे वाद-विवादों में अपना समय खपाता है। अमर्त्य सेनगुप्ता की किताब ‘द आर्गमेंटेटिव इण्डियन’ इसी प्रहसन का जश्ननामा है।
न्याय व्यवस्था में औपनिवेशिकता की सफलता की नायाब मिसाल जूरी प्रणाली के उन्मूलन में दिखता है। हमें यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि जब भविष्य में भारतीय न्यायपालिका का इतिहास लिखा जाएगा तो जूरी प्रणाली के उन्मूलन को उस प्रथम बिन्दु के रूप में दर्ज किया जाएगा, जहाँ सेे नागरिकों की अदालत से दूरी और पारस्परिक अविश्वास का सूत्रपात हुआ था। आज अदालतें जिस बेतकल्लुफी से सामान्य बुद्धि के मामलों में जटिल तकनीकियत से मामलों को लम्बित कर देती है, आदतन गम्भीर अपराधियों को जमानत दे देती है, इसकी ताकत उन्हें जूरी प्रणाली के खात्मे से ही मिलना शुरू हुई। औपनिवेशिक परिवेश में अदालत में काम करने वाले सभी कारिन्दे किसी व्यवसायी की तरह काम करते हैं।
अब पिछले कुछ सालों से विधायिका और न्यायपालिका की सन्धि में दरार आई है। उच्च अदालत की निरंकुशता की आकांक्षा सत्ता से टकराई है। यह तब हो रहा है जब हिन्दूवाद का तमगा प्रदर्शित करने वाले दल के पास सत्ता है और जो कुछ अंश में विऔपनिवेशीकरण की बात करता है। यह भी भूलना नहीं चाहिए कि हिन्दूवादी दल के सत्ता में आने से समाज के एक वर्ग में सशक्तिकरण की एक धारणा बलवती हुई है, जिससे अदालतों पर अधिक उग्र-स्वतंत्रतावादी बनने का दबाव बनाना शुरू किया है। मामलों की सुनवाई के दौरान जजों के व्यंग्यभरे, तीखे, कटाक्ष टिप्पणियाँ भी बढ़ी हैं। । घटनाएँ कई हैं। मसलन- दिल्ली उच्च न्यायालय के जज के घर जले नोटों के बण्डल मिलना और फिर इस मामले में कोई प्रभावी कार्रवाई न कर पाने की लाचारी ने संस्था के भरोसे को हिला दिया है। अभिव्यक्ति की आजादी का गुणगान करने वाली अदालतें भी अब तौबा-तौबा करती सुनी जाती है।
लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान में समाज और सत्ता के अंगों के बीच जो मंथन चल रहा है, वह एक सामाजिक नव-उन्मेष का सूचक है। पुरानी घिसी-पिटी लीक से एक बदलाव है। ऐसा कहने के दो कारण है। पहला कि भगवान विष्णु के खिलाफ हल्की टिप्पणी करने के विरोध में जिन अधिवक्ता राकेश किशाेर ने जूता उछालकर विरोध जताया, वे कोई ब्राह्मण, श्रत्रिय या वैश्य नहीं, बल्कि एक अत्यंत संघर्षशील परिवार से उठे सनातनी दलित हैं। इसके विपरीत सीजेआई भूषण गवई एक राजनेता के परिवार से आते हैं, जो सांस्कृतिक रूप से बाबा साहेब आम्बेडकर प्रणीत नव बौद्ध परम्परा से जुड़ा है।
ऐसा नहीं कि राकेश किशोर को अंदाजा नहीं होगा कि उनकी हरकत का हश्र क्या होगा, लेकिन उन्होंने विरोध जताया। यह बदलाव कोई छोटा नहीं है। दूसरा उच्चतम अदालत में तमाम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य समाज के ताकतवर किरदार इस मामले में जिस तरह चुप्पी साधकर या सीजेआई के पीछे लामबन्द हुए, उससे इन संस्थाओं का चरित्र, नैतिक मूल्य और हकीकत उजागर हो गई। रही सही कसर सोशल मीडिया में आजादी ने पूरी कर दी। वहाँ जिस तरह, जनचेतना का संचार हुआ उससे यह तो लगता है कि अब हम प्रौढ़ हो रहे हैं और फर्जी बहुजनप्रिय गल्प की असम्यकता पर सवाल खड़ा कर सकते हैं।
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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।)
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