अनुज राज पाठक, दिल्ली
डॉक्टर हेडगेवार ने संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की स्थापना राष्ट्रवाद के भाव को हिन्दुओं के हृदय में जागृत करने तथा राष्ट्र के हित की रक्षा के उद्देश्य से की। यद्यपि उपनिवेशकाल में इस लक्ष्य को लेकर चलना सत्ता के लिए चुनौती ही थी। देश के अन्दरूनी राजनीति भी अलग थी। इसीलिए कुछ लोग संघ को मुस्लिम लीग के विरुद्ध हिन्दुओं का संगठन मानने लगे। वहीं, कांग्रेस में भी संघ से विरोध के स्वर सुनाई देने लगे। जबकि 1928 में साइमन आयोग के विरोध-आन्दोलन के समय कांग्रेस द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की कार्यसमिति के सदस्य हेडगेवार भी थे।
इतना ही नहीं, संघ की स्थापना के मात्र चार के अन्तराल में ही कांग्रेस संघ को अपना प्रतिद्वन्द्वी मानने लगी। इसके परिणामस्वरूप कांग्रेसी नेता विविध कार्यक्रमों में संघ का विरोध करने लगे। ऐसे ही, कांग्रेस सेवा दल के संस्थापक श्री हार्डीकर ने अगस्त 1929 में नागपुर सभा में संघ के विषय में कहा, “नागपुर में युवकों का आन्दोलन है, ऐसा हमने सुना है। हमारे शरीर पर चिपकी हुई परकीयों की जोंक जब चूस रही है, ऐसे समय में यह कहना कि हमारा आन्दोलन राजनीतिक नहीं, सामाजिक है, तो आन्दोलन होकर भी न होने के समान है।” इस तरह कांग्रेस के भीतर 1930 तक आरएसएस के विरुद्ध विरोध के स्वर स्पष्ट सुनाई देने लगे थे।
डॉक्टर हेडगेवार इस विरोध की प्रतिक्रिया सहज रूप से दे रहे थे। एक वाकिआ है। कांग्रेस नेता जमनालाल बजाज ने 1934 के प्रारम्भ में डॉक्टर जी के पास एक प्रश्नोत्तरी भेजी। इसमें खादी, अस्पृश्यता, कांग्रेस और महात्मा गाँधी के प्रति संघ का दृष्टिकोण जानना चाहा। इसके उत्तर में डॉक्टर हेडगेवार ने सिर्फ जवाबी पत्र नहीं भेजा, बल्कि जमनालाल जी को नागपुर ही आमंत्रित कर लिया। बजाज तब डॉक्टर हेडगेवार से मिलने नागपुर आए भी थे। लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस संघ को अपना प्रतिद्वंद्वी मानना शुरू कर चुकी थी। कांग्रेस की यवतमाल इकाई ने तो एक परिपत्र जारी कर निर्देश दे दिया कि संघ से सम्बन्धित व्यक्ति कांग्रेस कमेटी में नहीं रह सकेंगे। इसे डॉक्टर हेडगेवार ने पाँच जुलाई 1937 में लिखे एक पत्र में ‘कांग्रेस द्वारा संघ पर अत्याचार’ की संज्ञा दी।
इसी प्रकार, डॉ हेडगेवार हिन्दू महासभा की नागपुर इकाई के 1927 तक सचिव रहे। लेकिन आगे चलकर महासभा से भी कुछ विषयों पर संघ का मतभेद रहा। मुख्य रूप से दोनों में तात्त्विक भेद था। महासभा स्वयं को हिन्दू राजनीति का केंद्र मानती थी, वहीं संघ हिन्दू को संगठित करने का कार्य कर रहा था। ऐसे में, हिन्दू महासभा के साथ भी संघ की बहुत से विषयों में सहभागिता नहीं हुई। महासभा के प्रमुख नेता वीर सावरकर ने तो एक सभा में यहाँ तक कह दिया, “संघ के स्वयंसेवकों की कहानी होगी कि वह जन्मा, संघ में शामिल हुआ और बिना कुछ किए मर गया।” इस कथन से समझा जा सकता है कि महासभा और संघ परस्पर सहयोगी के नहीं रहे।
जबकि दोनों संगठनों के नेताओं के व्यक्तिगत सम्बन्धों में दरार नहीं थी। वीर सावरकर का डॉक्टर हेडगेवार बहुत सम्मान करते थे। वहीं, वीर सावरकर के भाई बाबाराव सावरकर संघ के नेता के तौर पर जाने जाते थे। बाबाराव सावरकर ने संघ के विषय में एक बार यह तक लिखा था, “संघ की प्रेरणा से जिन लोगों में मन में हिन्दुत्त्व एवं राष्ट्र के प्रति प्रेम एवं अभिमान जाग्रत हुआ, वे कभी अपने कर्त्तव्य मार्ग से जी नहीं चुरा सकते।” इसी बीच, हिन्दू महासभा ने भावनगर सत्याग्रह के बाद 1939 में ‘हिन्दू मिलिशिया’ संगठन प्रारम्भ करने का विचार किया। इस बैठक में डॉक्टर हेडगेवार को बुलाया, लेकिन वह स्वास्थ्य कारणों से नही आ सके। यद्यपि महासभा ने 1940 में संघ की तर्ज पर ‘राम सेना’ का गठन किया। इसका कार्य आक्रामक हिन्दुत्व की अवधारणा पर आधारित था। इसमें सबसे आश्चर्य की बात यह रही कि ‘राम सेना’ के पदाधिकारियों की सूची में महासभा ने डॉक्टर हेडगेवार का नाम भी छाप दिया था। इसका गोलवलकर जी ने प्रतिवाद छापकर औपचारिक विरोध भी दर्ज कराया।
इससे पहले, 1938 में वर्धा की एक शाखा में डॉक्टर हेडगेवार स्वयं भी महासभा और संघ के सम्बन्धों को स्पष्ट कर चुके थे, ”संघ ने हिन्दुओं को संगठित करने का काम हाथ में लिया है। जबकि हिन्दू महासभा राजनीतिक संगठन है। यह मेरी धारणा है कि जब देश परतंत्र है, तब ‘देशभक्तों’ को राजनीति में अवश्य आना चाहिए। संघ हिन्दुओं में देशभक्ति की भावना जगाकर उन्हें संगठित करने का काम कर रहा है। अतः स्वयंसेवकों के लिए महासभा के कार्यक्रमों में भाग लेना सम्भव नहीं। हाँ, यदि महासभा उन्हें प्रेरित करती है, तो संघ उन्हें नहीं रोकेगा। यह सत्य है कि संघ अपने स्वयंसेवकों को महासभा में भाग लेने के निर्देश नहीं देता है।”
इस प्रकार हम देखते हैं कि उस दौर में हिन्दू महासभा जैसे कई संगठन हिन्दुओं की राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के दावे अपनी सुविधा और अपने तरीके से कर रहे थे। साथ ही, विरोधों-विरोधाभासों के बीच स्वयं भी फंसे थे। जाहिर है, वे हिन्दू जनमानस को एक सूत्र में बाँधने में सफल नहीं हो पा रहे थे। वहीं कांग्रेस मुस्लिमों के लिए पलकें बिछाए बैठी थी। हिन्दू समाज के संगठनों में परस्पर एक्य का अभाव भी सबसे बड़ी कमजोरी बन रहा था। इसी के फलस्वरूप मोपला जैसे हिन्दू नरसंहार भी हुए। इससे हिन्दू समाज और हतोत्साहित हो रहा था।
इस वातावरण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बड़ी तेजी से एक नए विकल्प के रूप में उभर रहा था और लगातार अपनी शक्ति बढ़ाने में सफल होता दिख रहा था। इसलिए कि संघ राजनैतिक कम, सामाजिक संगठन के स्वरूप पर अधिक जोर दे रहा था। संघ की यह रणनीति आगे कितनी कारगर हुई, जानेंगे आगे।
——
(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के सरकारी शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।)
—–
श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
2 – आरएसएस के 100 वर्ष : देखिए, हेडगेवार का कथन अक्षरशः: सत्य भी सिद्ध हुआ!
1- आरएसएस के 100 वर्ष : यह नहीं कह सकते कि जो कांग्रेस में नहीं था, वह देशभक्त नहीं था!
