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‘देश’ को दुनिया में शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है क्योंकि कानून तोड़ने में ‘शर्म हमको नहीं आती’!

टीम डायरी

अभी इसी शुक्रवार, 13 दिसम्बर की बात है। केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान एक प्रश्न का उत्तर दे रहै थे। इस दौरान उन्होंने बेबाकी से माना कि तमाम “क़ोशिशों के बावज़ूद देश में सड़क दुर्घटनाओं में कमी नहीं लाई जा सकी। इसकी वज़ह से जब भी मैं अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्त्व करता हूँ, सड़क-सुरक्षा विषय पर आयोजित सम्मेलनों में हिस्सा लेता हूँ, तो मुझे शर्मिन्दगी महसूस होती है। मैं ऐसी जगहों पर अपना मुँह छिपाने की क़ोशिश किया करता हूँ।”  

गडकरी ने बताया, “हमने 2024 तक सड़क दुर्घनाओं को 50% तक कम करने का लक्ष्य रखा था। इसके लिए ज़रूरी क़दम भी उठाए। लेकिन दुर्घटनाएँ कम होना तो भूल ही जाइए। इसके बज़ाय वे पहले की तुलना में वे बढ़ ही गईं हैं। इसलिए मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं कि इस मामले में मेरा मंत्रालय नाक़ाम रहा है।” उन्होंने यह भी बताया, “भारत में सड़क दुर्घटनाओं में 2023 के दौरान क़रीब 1,78,000 जानें चली गईं हैं। दुर्घटनाओं में मारे जाने वालों में लगभग 60% महज 18 से 34 साल के युवा रहे हैं।” 

फिर उन्होंने यह भी जानकारी दी, “उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा 23,000 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए। इसके बाद तमिलनाडु का नम्बर दूसरा रहा। वहाँ सालभर में 18,000 लोग मारे गए। फिर तीसरे पर महाराष्ट्र (15,000 मौतें) और चौथे पायदान पर मध्य प्रदेश (13,000 मौतें) रहा। शहरों में दिल्ली पहले और बेंगलुरू दूसरे नम्बर पर रहा। वहाँ क्रमश: 1,400 और 915 मौतें सड़क दुर्घटनाओं से, सालभर में हुईं।” वैसे, आँकड़े बताते हैं कि 2018 से 2022 के बीच 5 साल में 7.77 लाख मौतें सड़क दुर्घटनाओं से हुईं हैं, देश में। 

सो, अब ग़ौर करते हैं उन कारणों पर जिनकी वज़ह से ‘देश’ (मंत्री/अधिकारी/नेता विश्व मंच पर देश का ही चेहरा होते हैं) को दुनिया में शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है। इसका बहुत सीधा सा एक कारण यही है कि सड़क पर कानून तोड़ने में ‘शर्म हमकों नहीं आती‘। सड़कों, ख़ासकर राजमार्गों, आदि पर चलते समय हम सीट बैल्ट नहीं लगाते। दाएँ या बाएँ मुड़ने से पहले इंडिकेटर नहीं देते। लेन और रफ़्तार के निर्देशों का पालन नहीं करते। सड़क किनारे लगे निर्देशकों को तो देखते ही नहीं हैं। दोपहिया वाहन चलाते समय हैलमेट लगाने से हमारे बाल ख़राब हो जाते हैं। इसलिए भले ज़ुर्माना भरना पड़े पर हैलमेट नहीं लगाएँगे। शहर के भीतर सिग्नल तोड़ने से हमारी शान बढ़ती है। लिहाज़ा, लाल-हरी-पीली बत्तियाँ हमारे लिए सजावटी होती हैं। और पार्किंग का तो हमें शऊर ही नहीं आया है। कहीं भी, जहाँ जगह मिले, आड़ी, तिरछी, सीधी अपनी गाड़ी खड़ी करने से मतलब है। बाकी अगला देखे। 

तो भाई, फिर कैसे रुकेंगी दुर्घटनाएँ? नहीं रुक सकतीं। लेकिन अगर हमें देश के मान-सम्मान का थोड़ा भी ख़्याल है, तो थोड़ा शर्म करें। हैलमेट लगाएँ, सीट बैल्ट पहनें, यातायात के अन्य नियमों का भी पालन करें। जिससे कि दुनिया में देश की शर्मिन्दगी का कारण कम से कम हम तो बनें! 

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