Dr Lopa Mehta

डॉक्टर लोपा मेहता जीवित हैं, लेकिन उन्होंने ‘देहावसान’ को सहज स्वीकार किया है!

टीम डायरी

मुम्बई के केईएम (किंग एडवर्ड्स मेमोरियल) अस्पताल में शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी) विभाग की प्रमुख रहीं डॉक्टर लोपा मेहता जीवित हैं। पहले ही वाक्य में यह जानकारी क्यों देनी पड़ी? क्योंकि डॉक्टर लोपा मेहता के निधन की सूचना सोशल मीडिया पर कई दिनों-महीनों से चल रही है। बावजूद इसके कि 80 बरस की हो चलीं डॉक्टर मेहता ख़ुद स्पष्ट कर चुकी हैं कि वे ‘पूरी तरह स्वस्थ और तन्दुरुस्त हैं”। 

स्वाभाविक रूप से ऐसे में सवाल हो सकता है आख़िर क्या बात है जो डॉक्टर मेहता के ‘देहावसान की झूठी सूचना’ इस तेजी से कथित सोशल मीडिया पर प्रसारित हुई? तो इसका ज़वाब है, डॉक्टर मेहता की वसीयत। यह कोई ऐसी वसीयत नहीं है, जिसमें लिखा हो कि मेरे निधन के बाद इतना धन यहाँ दे देना और इतनी सम्पत्ति वहाँ दे देना। इस वसीयत में बल्कि उन्होंने यह लिखा कि उनके देहावसान के वक्त, यानि कि जीवन के अन्तिम क्षणों में उनके साथ क्या किया जाए और क्या नहीं! इसको ‘लिविंग विल’ कहा गया है।  

उनकी वसीयत पढ़िए। यह ज़िन्दगी का जीवन्त फ़लसफ़ा और मृत्यु का मर्म सामने रखती है। डॉक्टर डॉ. लोपा मेहता ने 78 वर्ष की उम्र में यह वसीयत बनाई। इसमें वे लिखती हैं… 

“जब शरीर साथ देना बन्द कर देगा, और सुधार की सम्भावना नहीं रहेगी, तब मुझ पर इलाज़ न किया जाए। न वेन्टिलेटर, न ट्यूब, न अस्पताल की व्यर्थ भाग-दौड़। मेरे अन्तिम समय में शान्ति हो, जहाँ इलाज के ज़ोर से ज़्यादा समझदारी को प्राथमिकता दी जाए। जब मेरी बारी आए, तो मुझे केईएम अस्पताल ले जाइए। वहाँ मुझे यक़ीन है कि मेरे साथ अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होगा। इलाज के नाम पर कोई दीर्घकालिक कष्ट नहीं दिया जाएगा। मेरे शरीर को रोका नहीं जाएगा, उसे जाने दिया जाएगा।”

डॉ. लोपा ने मृत्यु पर एक शोध-पत्र भी लिखा है। उसमें उन्होंने मृत्यु को प्राकृतिक, निश्चित और जैविक प्रक्रिया के रूप में स्पष्ट किया है। उन्होंने तर्क दिया है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने मृत्यु को कभी स्वतंत्र अवधारणा के रूप में देखा ही नहीं। चिकित्सा विज्ञान का आग्रह रहा है कि मृत्यु हमेशा किसी रोग के कारण होती है। यदि रोग का इलाज हो जाए, तो मृत्यु को टाला जा सकता है। लेकिन शरीर का विज्ञान इससे कहीं गहरा है।

शरीर कोई हमेशा चलने वाली मशीन नहीं है। यह एक सीमित प्रणाली है। इसमें एक निश्चित जीवन-ऊर्जा होती है। यह ऊर्जा किसी टंकी से नहीं, बल्कि सूक्ष्म शरीर के माध्यम से आती है। वही सूक्ष्म शरीर, जिसे हर कोई महसूस करता है, पर देख नहीं सकता। मन, बुद्धि, स्मृति और चेतना, इन सबका सम्मिलन ही यह प्रणाली बनाता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जीवन-ऊर्जा का प्रवेशद्वार है। यह ऊर्जा पूरे शरीर में फैलती है और शरीर को जीवित रखती है। दिल की धड़कन, पाचन क्रिया, सोचने की क्षमता, ये सब उसी के आधार पर चलते हैं। मगर यह ऊर्जा असीमित नहीं है। हर शरीर में इसका एक निश्चित स्तर होता है। जैसे किसी यंत्र में लगी फिक्स्ड बैटरी, जो न बढ़ाई जा सकती है, न घटाई जा सकती है। “जितनी चाबी भरी राम ने, उतना चले खिलौना’, कुछ वैसे ही।

जब शरीर की यह ऊर्जा समाप्त हो जाती है, तब सूक्ष्म शरीर देह से अलग हो जाता है। वही क्षण होता है जब शरीर स्थिर हो जाता है, और हम कहते हैं- प्राण चले गए। यह प्रक्रिया न किसी रोग से जुड़ी है, न किसी गलती से। यह शरीर की आन्तरिक लय है, जो गर्भ में शुरू होती है, और पूरी होकर मृत्यु तक पहुँचती है। इस ऊर्जा का खर्च हर पल होता है। हर कोशिका, हर अंग अपना जीवनकाल पूरा करता है। और जब पूरे शरीर का ‘कोटा’ समाप्त हो जाता है, तब शरीर शान्त हो जाता है। मृत्यु का क्षण घड़ी से नहीं मापा जा सकता। वह एक जैविक समय होता है, जो हर किसी के लिए अलग होता है। किसी का जीवन 35 साल में पूरा होता है, तो किसी का 90 साल में। पर दोनों अपनी सम्पूर्ण यात्रा करते हैं। अगर हम उसे पराजय या ज़बरदस्ती न मानें, तो कोई भी अधूरा नहीं मरता।

जब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान मृत्यु को टालने का हठ करती है, तब न सिर्फ मरीज़ का शरीर थकता है, बल्कि पूरा परिवार टूट जाता है। आईसीयू (गहन चिकित्सा इकाई) में महीने भर की साँसों की कीमत कभी-कभी जीवन भर की जमा-पूँजी को खत्म कर देती है। रिश्तेदार कहते रहते हैं, ‘अभी आशा है’, पर मरीज़ का शरीर पहले ही कह चुका होता है, ‘अब बस’। परन्तु सवाल यह है कि क्या हमने अपने लिए ऐसा कुछ तय किया है? क्या हमारा परिवार उस इच्छा का सम्मान करेगा? और जो करेंगे, क्या उन्हें समाज में सम्मान मिलेगा? क्या हमारे अस्पतालों में ऐसी इच्छाओं का सम्मान होता है, या अब भी हर साँस पर बिल बनेगा और हर मृत्यु पर दोष?

यह इतना आसान नहीं है। तर्क और भावना का सन्तुलन साधना शायद सबसे कठिन कार्य है। अगर हम मृत्यु को शान्त, नियत और शरीर की आन्तरिक गति से आई प्रक्रिया मानना सीख जाएँ, तो शायद मृत्यु का भय कम होगा। डॉक्टरों से हमारी अपेक्षाएँ अधिक यथार्थवादी होंगी। मेरे अनुसार, मृत्यु से लड़ना बन्द करना चाहिए। उससे पहले जीवन के लिए तैयारी करनी चाहिए। और जब वह क्षण आए, तो शान्ति से, सम्मान के साथ उसका सामना करना चाहिए। बुद्ध की भाषा में कहें तो, ‘मृत्यु जीवन की यात्रा का अगला चरण है।’ 

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(#अपनीडिजिटलडायरी तक यह बेहद अहम सामग्री डायरी के सरोकारों को जानते-समझते हुए भोपाल के व्यवसायी विपिन दुबे ने भेजी है। विपिन डायरी के पाठकों में शामिल हैं।) 

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