“जब से शिक्षक की नौकरी में लगा हूँ, रोज मानसिक प्रताड़ना झेल रहा हूँ!”

अनुज राज पाठक, दिल्ली

“भाई! सोच रहा हूँ, इस्तीफा देकर कहीं सब्जी का ठेला लगा हूँ।”

“अरे ऐसा क्या हो गया?” मैंने पूछा।

मित्र ने बताया, “बच्चे पढ़ते नहीं। बावजूद कि मैं अपना शत-प्रतिशत प्रयास करता हूँ। लेकिन बच्चे किताब लाते हैं, तो कॉपी नहीं लाते। कॉपी लाते हैं, तो किताब नहीं लाते। हद तो ये कि एक बच्चा 10वीं में आ गया पर उसे हिन्दी तक लिखनी नहीं आती। इसी चक्कर में कल एक बच्चे को डाँट दिया। कह दिया कि काम पूरा नहीं होगा तो पिटाई करूँगा। तो वह लड़का आज पुलिस ले आया। उसके घरवाले आ गए। विधायक तक स्कूल आ गया। सोचो, कितनी शर्मिन्दगी की बात है। मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कोई हत्या कर दी और मेरी जाँच चल रही हो। जबकि मैं ख़ुद एक किसान का बेटा हूँ। मैं भी सरकारी विद्यालय में ही पढ़ा हूँ और शिद्दत से चाहता हूँ कि बच्चे पढ़ें और आगे बढ़ें।” 

मित्र ने आगे बताया, “यही नहीं, आज सुबह-सुबह प्रिंसिपल ने फरमान सुना दिया कि बच्चे फेल हो गए तो ट्रांसफर करा दूँगा। इस सबके बाद पूरे समय कैमरे की निगरानी। जैसे कि हम शिक्षक न होकर कोई चोर हों। मैं जब से शिक्षक की नौकरी में लगा हूँ, रोज ही ऐसी मानसिक प्रताड़ना झेल रहा हूँ।”

अपने मित्र की व्यथा सुनकर मैंने उसे ढांढस बँधाया, “इतना पढ़-लिख कर सरकारी नौकरी मिली है। पढ़ाओ और सीखो कि कैसे काम होना है।” इसके साथ ही मैंने उसे प्रेरणादायक चीजें पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया।

लेकि अब सोचता हूँ कि शिक्षकों की ऐसी दशा तो आज लगभग हर प्रदेश में ही है। शिक्षक और चिकित्सक ये दो ऐसे पेशे हैं, जिनका परिणाम तुरन्त दिखाई देता है। शिक्षक के कार्य का परिणाम नियमित अन्तराल पर दिखाई देता रहता है। उस परिणाम में निरन्तर वृद्धि हेतु वह प्रयासरत भी रहता है। उसके बाद भी उस पर कार्य के प्रति गैरजिम्मेदारी के इल्जाम लगते रहते हैं।

व्यवस्था है कि विज्ञान में कमजोर विद्यार्थी को विज्ञान विषय नहीं दिया जाता। गणित में कमजोर हो तो उसे वाणिज्य संकाय नहीं मिलता। तो फिर येन केन प्रकारेण पास हुए किसी छात्र को कला संकाय में दाखिला देकर विद्वान बनने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? और उसके खराब परिणाम के लिए सिर्फ शिक्षक को जिम्मेदार कैसे मान सकते हैं?

‘पढ़ना’ खाना खाने की तरह स्वयं के लिए की जाने वाली ‘क्रिया’ है। खाना पकाया और परोसा जा सकता है। लेकिन जबरदस्ती खिलाया नहीं जा सकता। वैसे ही पढ़ाई के लिए वातावरण बनाया जा सकता है। पढ़ने में यथासम्भव सहयोग दिया जा सकता है। लेकिन पढ़ना अन्तत: स्वयं को ही होता है। कोई भी, कितना भी महान शिक्षक अपने किसी भी विद्यार्थी के मस्तिष्क में इंजेक्शन से जानकारियाँ और ज्ञान नहीं भर सकता।

हमारी व्यवस्था पढ़ने योग्य वातावरण नहीं बनाती। लेकिन शिक्षक पर दबाव बनाती है कि वह विद्यार्थी को रॉकेट विज्ञानी बना दे। यह कैसे हो सकता है? जिस बच्चे ने प्राथमिक से 10वीं तक मातृभाषा होने पर बाद भी हिन्दी विषय के 10 वाक्य शुद्ध लिखने का प्रयास नहीं किया, वह कैसे कला संकाय के विषयों को पढ़ सकता है? हाँ ऐसे बच्चे के लिए कौशल प्रशिक्षण के कार्यक्रम हो सकते हैं, पर अकादमिक शिक्षण के नहीं। 

हम में से बहुतों के बच्चे निजी विद्यालयों में पढ़ते होगें। यह ध्यान में रखकर सोचकर देखिए कि क्या मात्र विद्यालय के प्रयासों से हमारा वह बच्चा पढ़ रहा है? जब इसका उत्तर मिल जाए, तब सरकारी शिक्षकों कर दबाव डालिए और नकारापन का आरोप लगाइए।

वास्तव में सरकारी अनुशासन और आदेश वास्तविक धरातल पर कसे हों, तो बात बने। तब मालूम चले कि आदेश से किसी को शिक्षित नहीं किया जा सकता। अपितु शिक्षा का सम्बन्ध आत्मप्रेरणा से है। आत्मप्रेरणा शिक्षा के महत्त्व को समझे बिना नहीं आ सकती। कोई भी चीज मुफ्त देने मात्र से महत्त्वपूर्ण नहीं हो जाती।

इसीलिए सकारात्मक प्रयास से पूरी शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल व्यवहारिक परिवर्तन करना जरूरी है। ऐसा हुआ तो फिर देखिए शिक्षक के कार्य कितने धारदार परिणामकारक होंगे।

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