प्रणीण झा, कॉन्ग्सबर्ग, नॉर्वे से, 26/3/2021
हिन्दी के लेखक लोग #NoToFree चला रहे हैं, माने मुफ़्त में कुछ नहीं। इसके विरोध में मेरा #YesToFree है। मैं सभी तरह के कार्यक्रमों, मंचों, शादी, बियाह, जनेऊ, मुंडन के लिए उपलब्ध हूँ। कुछ श्रद्धा से खर्चा-पानी दे दीजिएगा। एक समय का मैथिल भोजन काफ़ी है। रसगुल्ला न मिले तो गुलाबजामुन चलेगा। इक्यावन व्यंजन का जोर न देंगे, ग्यारह से काम चल जाएगा।
वैसे, आज एक रहस्य से पर्दा उठाता हूँ। दरअसल नॉर्वे का वीसा मिलना बहुत मुश्किल है। लेकिन एक स्वघोषित शान्तिदूत होने के वजह से ये देश शरणार्थी वीसा देता है। मैंने इसके लिए अर्जी डाली तो पूछा गया कि तुम्हारे देश पर कोई बम-वम गिरा है? मैंने कहा- नहीं। उन्होंने वीसा रिजेक्ट कर दिया। फिर मुझे किसी ने आइडिया दिया कि चिकित्सक बोलोगे, तो वीसा नहीं मिलेगा। हिन्दी के लेखक बन जाओ, और उससे भी अधिक पक्का करना है तो पाठक बन जाओ। लेखक कंगाल है, पाठक बेहाल है। यकीन मानिए! पहली किताब छपी नहीं कि वीसा आ गया। उन्होंने कहा कि भाई! तुमसे जियादा त्रस्त दुनिया में कोई नहीं, ये लो शरण!
बस वह दिन है और आज का दिन। उनकी शर्त है कि वीसा तब तक रहेगा बसन्ती! जब तक तुम्हारी कलम चलेगी। हिन्दी में लिखना ही तुम्हारी शरण अर्हता (Eligibilty) का प्रमाण है। सो, मैं भी रगड़े जा रहा हूँ, जब तक है जान। तीस हज़ार शब्द प्रति मास तो माल-ए-मुफ़्त दिल-ए-बेरहम लिख ही देता हूँ। बदले में नॉर्वे सरकार मुझे रसगुल्ला-पंतुआ खिलाती है कि मचाए रहो बेट्टा आतंक! जनता को इतना फ्री बाँटो कि वही कहने लगे कि भाई! नहीं लिखने का कितना लोगे?
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(प्रवीण मूल रूप से दरभंगा, बिहार से ताल्लुक रखते हैं। फिलहाल नॉर्वे में रहते हैं। पेशे से चिकित्सक हैं। हालाँकि हिन्दी लेखन में भी इनका अच्छा-खासा दख़ल है। ‘खुशहाली का पंचनामा’, ‘वाह उस्ताद’ और ‘कुली लाइन्स’ जैसी पुस्तकें लिख चुके हैं। हिन्दी लेखन और लेखकों की स्थिति पर लिखा यह व्यंग्य हाल ही उन्होंने फेसबुक पर साझा किया था। इसे वहीं से, उनकी अनुमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। डायरी के अपने ‘सरोकार’ की वज़ह से।)
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