भोपाल गैस त्रासदी के समय बड़े पदों पर रहे कुछ अफसरों के साक्षात्कार…

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 27/1/2022

तत्कालीन गृह सचिव कृपाशंकर शर्मा : मुझे सीएस ने कुछ नहीं बताया 

• एंडरसन को बचाने में कौन किसके दबाव में था? कलेक्टर ने कहा कि सीएस ने कहा था?

→यदि सीएस ने ऐसा कहा तो सीएम की मर्जी से ही किया होगा। वैसे अर्जुनसिंह की कार्यशैली ऐसी नहीं थी कि वे एंडरसन जैसे अहम मामले में सिर्फ सीएस को कहकर फारिग हो जाते। उन्होंने सीएस के साथ कलेक्टर और एसपी को बुलाकर सीधी बात की होगी। ताकि ऊपर से नीचे तक यह स्पष्ट हो कि हुक्म किसका है? मैं तो कहता हूं कि भोपाल के उस वक्त के हालात के मद्देनजर उस वक्त ये अधिकारी ऐसा हुक्म मानने से इंकार कर सकते थे। 

अगर इकार कर देते तो ज्यादा से ज्यादा अफसरों का क्या होता सिर्फ तबादला, जिसके लिए किसी भी अफसर को हमेशा तैयार रहना चाहिए। इससे ज्यादा कुछ नहीं होता।…

● आप गृह सचिव थे। तब आपको किस स्तर पर किसने क्या बताया? 

→ मुझे सीएस ने कुछ नहीं बताया। एंडरसन को रिहा करने के पहले मुझसे सलाह लेनी चाहिए थी। सीएस को चाहिए था कि वे मुझे विश्वास में लेते। मुझे एसपी से एंडरसन के आने और उसकी गिरफ्तारी की सूचना मिली, लेकिन मुझे ताज्जुब हुआ कि उसे पुलिस स्टेशन ले जाने की बजाय यूनियन कार्बाइड के आरामदेह गेस्ट हाऊस में रखा गया। दोपहर 12 बजे मैंने इस पर पूछताछ की। मुझे बताया गया कि सीएम ऐसा चाहते थे। 

● कलेक्टर की गाड़ी में एसपी खुद ड्राइव करके एंडरसन को एयरपोर्ट सरकारी विमान तक छोड़ने गए। ये क्या चल रहा था उस दिन? 

→ यह वाकई शर्मनाक था। एंडरसन की सुरक्षा की ही बात थी तो वह दूसरे कई तरीकों से हो सकती थी। गैस हादसे के इतने बड़े आरोपी की ऐसी अगवानी और विदाई बेहद चौंकाने वाली थी।… 

तत्कालीन पुलिस महानिदेशक बीके मुखर्जी : एसपी ने कुछ गलत नहीं किया 

• साधारण चोर-उचक्कों के साथ अमानवीय सख्ती के साथ पेश आने वाली पुलिस ने एंडरसन के सामने उसके निजी नौकरों की तरह सुलूक किया, क्या यह कानूनी तौर पर ठीक था? 

→ एक शरीफ और वेल इस्टब्लिश बड़े आदमी व चोर-उचक्कों के प्रति फर्क हमेशा रहेगा। 

● उस दिन आप कहां थे, जब एंडरसन आया? क्या एंडरसन को छोड़ना ठीक था?

→ मैं प्रधानमंत्री राजीव गांधी के चुनावी दौरे के सुरक्षा इंतजाम का जायजा लेने आईजी इंटेलीजेंस नरेंद्रप्रसाद के साथ भोपाल से बाहर था। अगर एंडरसन को भोपाल में रखा जाता या गेस्ट हाऊस की बजाए पुलिस स्टेशन ले जाया जाता तो लोग उसकी पिटाई करते। हमें लाठी चार्ज गोली चलाने तक की नौबत आती और हो सकता है सौ-दो सौ लोग और हताहत हो जाते, क्योंकि लोगों में बहुत गुस्सा था। जब उसे रवाना किया गया तो मैंने भी राहत महसूस की।’ 

• कानून को हाशिए पर रखकर पुलिस ने उसके साथ जो किया, क्या वह ठीक था, क्या मुख्यमंत्री का दबाव था? 

→सीएम मेरे बॉस थे। उनसे मेरे अच्छे ताल्लुक थे। लेकिन अब मैं 80 साल का हूं। ठीक से याद नहीं कि तब क्या हुआ था। इतने साल बीत गए। एक पीढ़ी गुजर गई। मुझे लगता है कि कानून ने सही भूमिका निभाई। एसपी ने भी कुछ गलत नहीं किया। 

• पुलिस ने उसे अदालत में पेश क्यों नहीं किया?

→(याददाश्त पर जोर डालकर..) उस समय मामला तो सीबीआई को सौंप दिया गया था।

• जब सीबीआई को सौंप ही दिया था तो फिर पुलिस को जमानत देकर सुरक्षित विदा करने का हक किसने दिया?  

→ (उनकी याददाश्त फिर धुंधला जाती है..) असल में तब क्या हुआ था, 25 साल बाद अब कुछ याद नहीं आता.. ।’ 

तत्कालीन कलेक्टर मोतीसिंह : भोपाल को भूल जाईए, बनारस-इलाहाबाद की बात कीजिए

● तबाही के उस मंजर में जैसी आवभगत एंडरसन की हुई, कलेक्टर के नाते आपसे ऐसी उम्मीद नहीं की जाती। क्या आपको अपने किए का अब भी पछतावा नहीं है?

→ आई हेव डन माई जॉब मैंने कोई गलत काम नहीं किया।

• कुछ दिन पहले आपने कहा कि सीएस के कहने पर एंडरसन को छोड़ा गया। सच क्या है? उस दिन हुआ क्या था? 

→ किसी का कोई दबाव नहीं था। मैं इन आरोपों को नकारता हूं। उस दिन सीएस ने मुझे और एसपी को बुलाया था। उस सात तारीख को एंडरसन आया। इस सात तारीख को ही फैसला हुआ और दुनिया में आग लग गई। जरा इस दौर को गुजर जाने दीजिए फिर इस बारे में बात करेंगे। उस सात तारीख को भूल जाइए। कोई और बात कीजिए।

• क्या उस दिन एंडरसन को पुलिस स्टेशन और अदालत में पेश नहीं करना था। उसे जेल भेजने की बजाए आप उसकी सेवा में बिछ गए?

→ इस बारे में कुछ नहीं कहना। नो कमेंट। यह सब निपट जाए फिर हाजिर हूं। अपन बात करेंगे।

● कितनी शर्म की बात है गिरफ्तारी के नाम पर एंडरसन की अगवानी के लिए आप एसपी के साथ एयरपोर्ट गए और रिहाई के नाम पर उसे सेल्यूट कर विदाई दी। ऐसे दबाव में आने से इंकार कर सकते थे?

→ मैंने सेल्यूट नहीं किया जो ऐसा कह रहे हैं, उन्हें मजा आ रहा है। कहने दीजिए। जो कह रहे हैं, वे क्षम्य हैं। मैं गीता में विश्वास रखता हूँ कर्म कीजिए फल की इच्छा मत कीजिए। दुनिया जानती है कि मोतीसिंह दबाव में काम करने का आदी नहीं है। मैंने उस दिन कुछ भी गलत नहीं किया। जानबूझकर में कभी कोई गलत काम नहीं करता। इसलिए लोगों का कोपभाजन भी बना और बदनाम भी हुआ। 

• एंडरसन के खिलाफ गैर जमानती धाराएं लगी थीं। उसे पुलिस स्टेशन की बजाए गेस्ट हाऊस ले जाया गया और अदालत की बजाए पुलिस अधिकारी ने जमानत दी। आपने यह सब होने दिया। क्यों? 

→मैं अपनी किताब में सब कुछ लिख चुका हूं। फिलहाल नो कमेंट। 

• उस वक्त जब हजारों लाशें भोपाल में बिखरी थीं। लाखों बेबस लोग भटक रहे थे। अनगिनत मूक जानवर सड़कों पर मरे पड़े थे। ऐसे बुरे वक्त में आपने एक कीमती दिन एंडरसन की सेवा में गंवाया। क्या ऐसा फर्ज निभाकर उस रात आप बेफिक्री से सो पाए ? 

→ मैंने मेहनत से अपना फर्ज पूरा किया। सोने को ही नहीं मिलता था तब। हजारों काम मेरे पास थे। सुबह सीएस ने बुलाया था। जब तक एंडरसन का प्लेन उड़ नहीं गया, तब तक का समय बरबाद हुआ। लेकिन वह भी मेरी ड्यूटी का हिस्सा था। मैं एंडरसन को छोड़ने नहीं गया। अब आप कोई और बात कीजिए।

• जवाबदेही से आप बच नहीं सकते। कुछ तो कहिए, कौन सी मजबूरी थी? अब भी कहीं से कोई दबाव है क्या? अब सब कुछ हो चुका है। नौकरी का भी डर नहीं है। अपनी भूमिका से संतुष्ट हैं आप?

→ कोई मजबूरी नहीं थी। वह मेरी ड्यूटी थी। मुझ पर कोई दबाव न था, न है और न रहेगा। आज इतना छप रहा है दिल्ली से लेकर भोपाल तक हंगामा है। इसे पढ़कर मुझे लग रहा है कि क्या इतने बड़े मामले से हम जुड़े थे। मैं अपनी भूमिका से संतुष्ट रहा हूं। आप बार-बार इसी विषय पर क्यों आ रहे हैं? भोपाल को छोड़िए आप इलाहाबाद और बनारस की बात कीजिए। कितने सुंदर शहर हैं ये। मैं इलाहाबाद में ही पढ़ा हूं। मैथ्स में एमएससी किया था। मैंने गैस त्रासदी पर किताब लिखी है। लिखी तो सर्विस में रहते ही, लेकिन छपने नहीं दी। वर्ना मामलों पर असर पड़ता। जैसे डॉमिनिक लापिएर की किताब में ज्यादातर झूठ है।  

• चेहरे पर कोई तनाव नहीं है.. 

→तनाव काहे को होना? लेट पीपुल एंजॉय। 

• यह आनंद की बात नहीं है। आनंद आपको आ रहा हो तो यह अलग बात है.. 

→हमें क्यों आनंद आएगा। लोग गाली दे रहे हैं, क्यों आनंद आएगा।

•  इस समय दूसरे लोग आनंद ले रहे हैं। आप चाहें तो सबके मुंह बंद कर सकते हैं..

→ लेकिन मकसद तो तब पूरा होगा जब एंडरसन का प्रत्यर्पण होगा। क्या नहीं होना चाहिए?

• तो सात दिसंबर 1984 को आपने उसे क्यों जाने दिया? आप इतिहास बना सकते थे..

• फिलहाल 7 दिसंबर को भूल जाइए। 

तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराजपुरी : मैं बात नहीं कर सकता

भाई की मृत्यु के कारण शोकाकुल स्वराज पुरी से फोन पर बात की। उन्होंने कहा, ‘मेरी मनःस्थिति इस समय एंडरसन मामले में बात करने को नहीं है। मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश की जाए।’ 
(जारी….)
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(नोट : विजय मनोहर तिवारी जी, मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। उन्हें हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 का शरद जोशी सम्मान भी दिया है। उनकी पूर्व-अनुमति और पुस्तक के प्रकाशक ‘बेंतेन बुक्स’ के सान्निध्य अग्रवाल की सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर यह विशेष श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके पीछे डायरी की अभिरुचि सिर्फ अपने सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित है। इस श्रृंखला में पुस्तक की सामग्री अक्षरश: नहीं, बल्कि संपादित अंश के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसका कॉपीराइट पूरी तरह लेखक विजय मनोहर जी और बेंतेन बुक्स के पास सुरक्षित है। उनकी पूर्व अनुमति के बिना सामग्री का किसी भी रूप में इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही का कारण बन सकता है।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
24. वह तरबूज चबाते हुए कह रहे थे- सात दिसंबर और भोपाल को भूल जाइए
23. गैस हादसा भोपाल के इतिहास में अकेली त्रासदी नहीं है
22. ये जनता के धन पर पलने वाले घृणित परजीवी..
21. कुंवर साहब उस रोज बंगले से निकले, 10 जनपथ गए और फिर चुप हो रहे!
20. आप क्या सोचते हैं? क्या नाइंसाफियां सिर्फ हादसे के वक्त ही हुई?
19. सिफारिशें मानने में क्या है, मान लेते हैं…
18. उन्होंने सीबीआई के साथ गैस पीड़तों को भी बकरा बनाया
17. इन्हें ज़िन्दा रहने की ज़रूरत क्या है?
16. पहले हम जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं… गुलाम, ढुलमुल और लापरवाह! 
15. किसी को उम्मीद नहीं थी कि अदालत का फैसला पुराना रायता ऐसा फैला देगा
14. अर्जुन सिंह ने कहा था- उनकी मंशा एंडरसन को तंग करने की नहीं थी
13. एंडरसन की रिहाई ही नहीं, गिरफ्तारी भी ‘बड़ा घोटाला’ थी
12. जो शक्तिशाली हैं, संभवतः उनका यही चरित्र है…दोहरा!
11. भोपाल गैस त्रासदी घृणित विश्वासघात की कहानी है
10. वे निशाने पर आने लगे, वे दामन बचाने लगे!
9. एंडरसन को सरकारी विमान से दिल्ली ले जाने का आदेश अर्जुन सिंह के निवास से मिला था
8.प्लांट की सुरक्षा के लिए सब लापरवाह, बस, एंडरसन के लिए दिखाई परवाह
7.केंद्र के साफ निर्देश थे कि वॉरेन एंडरसन को भारत लाने की कोशिश न की जाए!
6. कानून मंत्री भूल गए…इंसाफ दफन करने के इंतजाम उन्हीं की पार्टी ने किए थे!
5. एंडरसन को जब फैसले की जानकारी मिली होगी तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी रही होगी?
4. हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन…
3. फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई
2. फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!
1. गैस त्रासदी…जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया!

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