राजनैतिक दबाव में हँसकर माँगी माफ़ी से क्या ‘देवास की मर्यादा’ भंग करने का पाप कटेगा?

टीम डायरी

मध्य प्रदेश में इन्दौर से यही कोई 35-40 किलोमीटर की दूरी पर एक शहर है ‘देवास’। इसे ‘देव-वास’ अर्थात् देवी-देवताओं का वास’ कहें, तो कोई ग़लत बात न हो क्योंकि आदिशक्ति जगदम्बा के सिद्ध शक्तिपीठों में शुमार एक पीठ देवास में भी है। यहाँ स्थित पहाड़ी पर जगदम्बा दो स्वरूप- चामुण्डा और तुलजा भवानी के रूप में विराजित हैं। तुलजा भवानी महान् मराठा शासक छत्रपति शिवाजी की कुलदेवी हैं। मराठा आज भी उन्हें इस रूप में पूजते हैं।

चूँकि देवास मराठा शासकों से शासित रहा है, तो इसलिए यहाँ स्थानीय पर भी तुलजा भवानी की मान, मर्यादा, प्रभाव, आदि महाराष्ट्र की तरह बहुत अधिक माना जाता है। ऐसे देवास की महिमा और प्रभाव को इस धरा के गन्धर्व कहलाने वाले महान् हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक- शिवपुत्र सिद्धरमैया कोमकलीमठ यानि पंडित कुमार गन्धर्व जी ने स्वयं अनुभव किया। उन्हें अपनी गायकी में नैसर्गिकता, दिव्यता का अनुभव इसी शहर में हुआ। फिर वे यहीं के हो गए। 

हालाँकि, इतने महान सिद्ध स्थल का प्रभाव हमारे आज के विधायक, सांसद, और उनके परिजन, प्रियजन आदि शायद नहीं मानते। वरना क्या मज़ाल कि वे किसी देवस्थल की मर्यादा भंग करने के बारे में सोचते भी। लेकिन उनके सिर पर चढ़ा सत्ता का दम्भ देखिए कि वे अक्सर देवस्थलों की मर्यादा के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं। देवास से ही ताज़ातरीन मिसाल सामने आई है इसकी। इन्दौर-3 विधानसभा क्षेत्र के एक विधायक हैं- गोलू शुक्ला राकेश। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं। हो सकता है, इस कारण से सत्ता का नशा उनके परिजनों-प्रियजनों पर भी हो। 

तभी तो 11-12 अप्रैल की दरम्यानी रात को 12.45 बजे गोलू शुक्ला के बेटे- रुद्राक्ष 10-11 वाहनों में अपने समर्थकों के साथ माँ तुलजा भवानी के मन्दिर में जा पहुँचे। वहाँ शयन आरती के बाद मन्दिर के पट बन्द किए जा चुके थे। पुजारी ने उन्हें इस बात की सूचना दी तो रुद्राक्ष भड़क गए। उन्होंने पुजारी के साथ मारपीट कर दी। फिर ज़बर्दस्ती मन्दिर के पट खुलवाए और दर्शन करने के बाद वापस लौट गए। अगले दिन मामला पुलिस तक पहुँचा तो पहले उसे रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की गई। दबाव बढ़ा तो रुद्राक्ष शुक्ला को छोड़कर अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया।

इसी बीच, समाचार माध्यमों में मामला उछल गया। जनभावनाएँ भड़कने लगीं। बात प्रदेश की राजधानी भोपाल और देश की राजधानी दिल्ली तक पहुँच गई। जनभावनाओं को शान्त करने के मद्देनज़र दिल्ली से दबाव बनाया गया। प्रदेश स्तर पर कार्रवाई हुई। भाजपा के प्रदेश नेतृत्त्व ने विधायक गोलू शुक्ला से सवाल-ज़वाब किया। तब कहीं जाकर रुद्राक्ष को पुलिस ने आरोपी बनाया। इसके बाद तुरन्त रुद्राक्ष ने देवास थाने में जाकर ग़िरफ़्तारी दी। उतनी ही तेजी से उनकी ज़मानत हुई और फिर वह शान से हँसते-मुस्कुराते मन्दिर पहुँचे। वहाँ माथा टेक कर पुजारी से माफ़ी माँगी। 

लेकिन क्या इस तरह के राजनैतिक प्रहसन और दबाव के बाद हँसते-मुस्कुराते माँगी गई माफ़ी से ‘देवास की मर्यादा’ भंग करने का पाप कट जाएगा? क्या लगता है?

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Neelesh Dwivedi

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