समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश
पुरानी लेकिन बड़े मायने की लोकोक्ति है, “एक ‘विदूषक’ जब राजसत्ता पर काबिज होता है, तो वह सम्राट नहीं बनता, राजपाट ‘प्रहसन’ बन जाता है।” आज यह लोकोक्ति अमेरिका की स्थिति बयां करती है। विश्व व्यवस्था के स्तर पर हो रहे बदलावों की ओर देखें ताे हम एक बेहद रोमांचक दौर से गुजर रहे हैं। याद नहीं पड़ता कि इससे पहले कब विश्व-व्यवस्था में परिवर्तन इतने सहज, अहिंसक और लगभग रंगमंचीय तरीके से हुए थे।
घटनाओं की एक बार पुनरावृत्ति कर लें– अमेरिका एक समय पर चीन, यूरोप समेत सभी देशों से आयात पर कर लगाने को उद्यत था। डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रध्यक्ष बनने के बाद भारत ने सबसे पहले दोनाें पक्षों के लिए लाभप्रद होने वाली सन्धि के लिए प्रतिनिधिमंडल भेजकर काम शुरू किया। इसी बीच, अमेरिकी प्रशासन ने कनाडा, ब्राजील, ईयू (यूरोपीय संघ) पर बढ़ा हुआ टैरिफ (सीमा शुल्क) थोपकर उनसे अप्रत्याशित छूट हासिल कर ली। यही कोशिश चीन के साथ भी की, लेकिन उससे मुँह की खानी पड़ी। इसके बाद अगस्त में अमेरिका ने भारतीय आयात पर भी 25 प्रतिशत और फिर 25 प्रतिशत अतिरिक्त यानी कुल 50 प्रतिशत का सीमा शुल्क लगा दिया।
इसका कारण? भारत घुटने टेक कर, जोड़-तोड़ कर अमेरिकी हितवाली सन्धि के लिए तैयार नहीं हुआ था। बल्कि इसके उलट अमेरिका से बढ़ा हुआ सीमा शुल्क लगने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में शामिल होने के लिए चीन जा पहुँचे। इस तरह उन्होंने भारत के सामने उपलब्ध दूसरे विकल्पों की ओर स्पष्ट इशारा कर दिया। ट्रम्प इस पर नाराज हुए। उनके सहयोगी अनर्गल प्रलाप करने लगे। मगर प्रधानमंत्री मोदी की सरकार अपने रूख पर कायम रही। सो, सितम्बर के पहले हफ्ते के आखिरी दिन ट्रम्प ने फिर पैंतरा बदला। उन्होंने भारत के साथ सम्बन्धों को मजबूत और महत्त्वपूर्ण बताकर मोदी की तारीफ कर डाली। बहुत संभव है, अब तक उन्हें अपनी गलती और माेदी को अपने प्रभाव क्षेत्र के घेरे में रखने की एहमियत का एहसास हो चुका हो! इसीलिए उन्होंने अपने तेवरों में नरमी बरतने के संकेत देने शुरू किए हैं।
तो अब आगे?
वृहद प्रश्न यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति के कारण दुनियाभर में पैदा होने वाले अस्थिर प्रभावों को अमेरिका कितना सह पाएगा? दूसरा प्रश्न यह है कि भारत क्या अमेरिकी प्रभाव और प्रभुत्त्व के भीतर रह सकता है? प्रकारान्तर से पूछें तो यह कि अमेरिका जिन आर्थिक समस्याओं से रू-ब-रू हो रहा है, उनको सुलझाने में क्या भारत उसकी मदद कर सकता है? क्या वह सक्षम है? यदि हाँ तो किस हद तक? यह बात भी देखने योग्य होगी कि अमेरिकी माँगों के समक्ष भारत ने जो रूख अपनाया है, उसके अन्य देशों पर परिणाम क्या हाेंगे?
बात यह है कि अमेरिका की हरकत ने भारत को चाहते न चाहते हुए भी वैश्विक स्तर पर एक बड़ा हाथ खोलने को मजबूर कर दिया है। या यूँ कह लेंं कि ईयू, जापान, कनाडा जैसे अपने पिछलग्गुओं के समर्पण से भारत का अत्यंत सम्यक रूख भी एक चुनौती के रूप में सामने आता है। चीन की ललकार तो सर्वश्रुत है, लेकिन वह कितनी कारगर साबित होगी, वह अंतत: भारत से निर्णित होगी। इतिहास ने भारत को एक असाधारण महत्त्वपूर्ण भूमिका में खड़ा कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय पटल पर अमेरिका की जगह लेने के लिए चीन तत्पर है। ऐसे में, यथार्थ एवं प्रामाणिक बहुध्रुवीय विश्व के विचार के पोषक के तौर पर भारत ही सामने नजर आता है।
लेकिन इस उभरती बहुध्रुवीयता से मित्रसन्धियों में सेंध लग रही है। उदाहरण के लिए इजराइल और भारत के सम्बन्धों को लें। भारत के बहुसंख्य गैर-मुस्लिम इजराइल के पक्षधर रहे हैं। अमेरिका की मैत्री और समर्थन के कारण इजराइल बेहद दबंग कदम उठाने में कामयाब रहा है। भारत सरकार ने भी इजराइल से अच्छे सम्बन्ध रखे हैं और नाजुक मौकों पर इजराइल से मदद भी ली है। लेकिन आज अमेरिका के भारत पर अनावश्यक दबाव का असर भारत के इजराइल से सम्बन्धों पर भी पड़ रहा है। इसके समानांतर, इजराइल-अमेरिका की गाजा पट्टी के विनाश और पुन:निर्माण की नीति से होने वाली अस्थिरता को भी भारत समर्थन देने की स्थिति में नहीं है।
भूराजनैतिक और साभ्यतिक स्तर पर भारत का चीन सहित पूर्वी एशियाई देशों की ओर आमुख होना तय लगता है। नई परिस्थितियों में इस्लामी वैश्विकता से निपटने के लिए हमारे लिए अब्राहिमी यहूदी नीति अपनी प्रासंगिकता खो रही है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि विविध मजहब, मत-मतान्तरों के राजनीतिक मुद्दों को देखने और हल करने के लिए भारत अब चीन-जापान जैसे देशों की नीति का अनुसरण करेगा। इतना ही नहीं, नैतिक, राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर हमें उपनिवेशोत्तर काल की हर उस तथाकथित लोकरंजनकारी, समानतावादी नीति से भी मुक्त होना होगा जो हकीकत में महज चुनावी सत्ता हासिल करने का हथकण्डा होती थीं।
अमेरिकी वर्चस्व वाली विश्व-व्यवस्था का टूटना अपने आप में अवसरों के साथ कई छिपे और प्रकट खतरे भी समेटे हुए है। विश्व-व्यवस्था एकदेशीय अधिनायकवाद के प्रभाव से मुक्त होकर धीरे-धीरे एक सीमित अराजकतावाद की ओर बढ़ रही हैं। बतौर राष्ट्र नीति हिंसा का अधिकार अमेरिका और एक दो देशों के पास सीमित था। लेकिन अब यह खिसक कर सबके पास आ गया है। गैरसरकारी किरदारों की भूमिकाएँ भी हर देश में बढ़ी हैं। इन किरदारों में कई तो ऐसे भी हैं, जिन्हें आतंकी या चरमपंथी समझा जाता है। मसलन- तालिबान, जिसे अब दुनिया ने उसी की शर्तों पर स्वीकार कर ही लिया है। इस सबके मद्देनजर यह कहने की जरूरत नहीं है कि भारत के लिए आगे का मार्ग बेहद चुनौतीपूर्ण है। मगर अपरिमित सम्भावनाओं से भरा हुआ भी है। इस तरह स्थितियों को सुधारने के मौके बार-बार नहीं आते। हालाँकि हम इसका कितना लाभ उठा पाएँगे यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम कितनी शिद्दत से अपने साभ्यतिक नीति-मूल्यों को अपने व्यवहार और राजनीतिक तंत्र में उतारते है।
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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।)
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