प्रियंका पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश
भारतीय समाज में परिवार की भूमिका जीवन के हर पड़ाव पर महत्त्वपूर्ण होती है। लेकिन आज के व्यस्त और डिजिटल जीवन में संवादहीनता परिवार, समाज की बड़ी चुनौती बन रही है। बातचीत की कमी भावनात्मक दूरी गलतफहमियाँ और मानसिक तनाव बढ़ा रही है। परिवार में बच्चे और बड़े एक-दूसरे की भावनाओं को साझा नहीं कर पाते। इससे समाज में भी सहयोग और सामूहिक प्रयास कमजोर पड़ते हैं।
इसका समाधान है- नियमित संवाद, साझा गतिविधियाँ, सकारात्मक सुनना और डिजिटल सीमाएँ तय करना। संवाद को केवल बातचीत तक सीमित मानना ठीक नहीं है। यह आपसी विश्वास, समझ और सम्बन्धों की नींव है। इसे प्राथमिकता देकर हम परिवार और समाज को मजबूत और भावनात्मक रूप से स्वस्थ बना सकते हैं। परिवार के साथ भोजन, चाय या सप्ताहान्त में बातचीत को प्राथमिकता दी जा सकती है।
दूसरी अहम बात है, सुनने-समझने की आदत। आलोचना से बचकर, एक-दूसरे की बात ध्यानपूर्वक सुनने-समझना से संवाद बढ़ता है। तीसरी बात, साझा गतिविधियों का महत्त्व। खेल, यात्रा, शौक या सामाजिक कार्यों में परिवार और दोस्तों को शामिल करने से भी संवाद स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। लिहाजा, मोबाइल-टीवी को पीछे रखकर इन तौरञतरीकों को आजमाना चाहिए। बच्चों को भी भावनाएँ व्यक्त करने देना चाहिए।
भावनाओं को खुलकर व्यक्त करना आवश्यक है। डर या शर्म से अपनी भावनाओं को दबाना संवाद को कमजोर करता है। संवाद जीवन का वह आधार है जो रिश्तों में विश्वास और सहयोग को मजबूत करता है। वहीं, संवादहीनता परिवार व समाज की संरचना को प्रभावित करने वाली गम्भीर समस्या है। इसे समय रहते पहचानना और इसका समाधान जरूरी है। खुली बातचीत, ध्यान से सुनना और साझा गतिविधियाँ न केवल परिवार और समाज को मजबूती देती हैं, बल्कि व्यक्तिगत विकास तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक हैं।
जब घर में नए बच्चे का जन्म होता है, तब यह संवाद की अहमियत और बढ़ जाती है। प्रसव ऐसा समय है, जब महिला शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर होती है। उसे सिर्फ चिकित्सकीय सहायता की नहीं, गहरे स्तर पर देखभाल, सहारे और संवेदनशीलता की जरूरत होती है। परम्परागत रूप से यह जिम्मेदारी संयुक्त परिवारों में सास की होती थी, लेकिन बदलते दौर और सामाजिक संरचना के कारण यह भूमिका अब जन्म देने वाली माँ की ओर स्थानान्तरित हो रही है। समाज में बदलते रुझान का यह दर्पण है। यह बताता है कि प्रसव जैसे संवेदनशील समय में भी महिला अपनी जन्म देने वाली माँ पर कहीं ज्यादा भरोसे करती है।
जबकि समझना चाहिए कि प्रसवोत्तर देखभाल प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं है। यह माँ और सास दोनों का संयुक्त दायित्त्व है। दोनों का अनुभव और स्नेह मिलकर प्रसूता महिला को वह सुरक्षा प्रदान कर सकता है, जिसकी उसे सबसे अधिक आवश्यकता है। यह आदर्श स्थिति होती है। यह न केवल प्रसूता महिला के स्वास्थ्य और मानसिक शान्ति के लिए अच्छा होता है, बल्कि शिशु की परवरिश और परिवारिक रिश्तों के सामंजस्य के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगा। आखिर, स्वस्थ माँ और स्वस्थ शिशु ही तो स्वस्थ समाज की नींव रखेंगे। यानि समस्या केवल भौतिक अवरोधों की नहीं, मानसिकता और दृष्टिकोण की भी है। सही सोच और दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।)
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