अनुज राज पाठक, दिल्ली
भारत में विभिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं। इसीलिए यहाँ बहुभाषाओं के साथ-साथ भाषाओं की शुद्धता भी एक बड़ा विषय रहा है। यह शुद्धता हिन्दी भाषा के साथ शुरू से ही विमर्श का विषय रहा है। जैसे-जैसे हिन्दी विकसित होती गई, वैसे-वैसे उर्दू को भाषा के तौर कर स्थापित करने के प्रयास तेज होते गए। उर्दू को स्थापित करने के प्रयास में हिन्दी के तथाकथित लेखकों ने अपनी ही भाषा के साथ विश्वासघात करना शुरू किया।
इस विश्वासघात को ‘भाषा बहता नीर’ जैसी कहावतें के नाम पर किया गया। हिन्दी भाषा नहीं, बोली है या फिर यह एक सीमित क्षेत्र तक सीमित है, आदि मान्यताएँ भी स्थापित करने के प्रयास हुए। इसके बावजूद हिन्दी विविध बाधाओं को पार कर अपनी गरिमा को स्थापित करती गई। भाषा का अपना स्वरूप होता है, अपनी गरिमा होती है। हिन्दी उस पर खरी उतरती है। उसका बड़ा कारण हिन्दी का आधार संस्कृतभाषा का होना है।
विविध कारणों से किसी भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों का प्रयोग होने लगता है। यह सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन इससे किसी भाषा को ‘बहता नीर’ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ‘बहता नीर’ से तात्पर्य बस इतना है कि एक लम्बे अन्तराल में, साथ ही सांस्कृतिक, क्षेत्रीय और व्यापारिक कारणों से किसी भाषा में अन्य भाषाओं के कुछ शब्द आ जाते हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उस भाषा का आधार ही बदल जाता है। आयातित अक्षरों, ध्वनियों और शब्दों के कारण किसी मूल भाषा के व्याकरण नियमों में परिवर्तन नहीं होता।
आज यह सब कहने का प्रसंग इसलिए उठा क्योंकि मशहूर लेखिका जेके रॉलिंग ने अपने एक्स अकाउंट फ्रेंच भाषा के शब्द ‘हर्ब्स’ के उच्चारण की खास चर्चा की है। इसमें उन्होंने लिखा है…
'Herbes' is French and pronounced without the h and also without the s – 'erb' – whereas 'herbs' is English and pronounced with both h and s, unless you're American. And it's fine pronouncing it the American way, but 'correct' is a very subjective term… https://t.co/5op2N99tBq
— J.K. Rowling (@jk_rowling) June 23, 2025
मतलब ‘हर्ब्स’ का अमेरिकी उच्चारण ‘एच’ और ‘एस’ के बिना ‘एर्ब’ होता है, ऐसा रॉलिंग बताती हैं। साथ ही अपनी भाषा के प्रति सम्मान और गर्व के साथ कहती हैं, “अमेरिकी तरीके से उच्चारण करने में कोई बुराई नहीं। वैसे सही क्या है, ये सबका अपना-अपना मामला होता है।” इसके विपरीत हमारे यहाँ देखिए। यहाँ लेखक हिन्दी के अक्षरों में उर्दू की तरह नुक्ता लगाने को बड़े गर्व का विषय मानते हैं। क्यों भला?
इस विषय में मेरा मानना है कि किसी भाषा का कोई शब्द या अक्षर अगर दूसरी भाषा में प्रयोग में आने लगे तो उसे उसी भाषा के नियमों के अनुसार प्रयोग में लेना चाहिए। न कि उस भाषा के नियमों के मुताबिक, जिससे वह लिया गया है। यह उचित, व्यावहारिक, और तर्कसम्मत बात है। लेकिन हिन्दी लेखकों में हिन्दी को लेकर इतना अधिक हीनता भाव है कि हिन्दी की शुद्धता की बात करना उनके लिए शर्म का विषय है।
वैसे उर्दू की वकालत के भाषाई कारण कम राजनैतिक या मजहबी कारण अधिक दिखाई देते हैं। वास्तव में उर्दू कोई भाषा नहीं है? वह तो फारसी, अरबी और हिन्दी की विभिन्न बोलियों के मिश्रण से बनी कामचलाऊ बोलीभर है। ऐसा सिर्फ मैं ही नहीं, बहुत से लोग मानते हैं, कई दिग्गज भाषाविद् भी। कारण कि उर्दू का कोई व्याकरण और मूल (अक्षर) ध्वनियाँ नहीं हैं। उर्दू का कोई वैज्ञानिक भाषाई आधार भी नहीं है। इसीलिए यह अविभाजित भारत से टूटकर अलग हुए पाकिस्तान जैसे देशों की बोलचाल वाली बोली ही अधिक मानी जाती है।
वास्वत में भारत में स्वतंत्रता पश्चात प्रोत्साहन देकर उर्दू को खड़ा किया गया। जो एक अलगाववादी विचार का प्रतीक बन गई। धीरे-धीरे उर्दू का समर्थन वामपंथ विचारधारा के पोषक और हिन्दी के विविध लेखक भी करने लगे। उनके अपने राजनीतिक निहितार्थ रहे। इसी तरह हिन्दी शब्दों में अक्षरों पर नुक्ता प्रयोग और उच्चारण भेद को गर्व का विषय बना दिया गया। इसी क्रम में अभी कुछ समय पहले बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा, “उर्दू किसी धर्म की भाषा नहीं है”। यह टिप्पणी भी ऐसे ही विचार की पोषक माननी चाहिए। इसके पीछे कोई भाषाई समझ काम नहीं कर रही है, अपितु हिन्दी के समकक्ष उर्दू को खड़ा करने का प्रयास भर हो रहा है। क्योंकि जिस महाराष्ट्र में हिन्दी बोलने पर किसी व्यक्ति को पीट दिया जाता हो, वहाँ उर्दू का पक्ष लिया जाना समझ से परे ही लगता है।
यहाँ मेरा उद्देश्य उर्दू को कमतर दिखाना नहीं है, अपितु भाषाबोध और उससे जुड़े भाव की चर्चा करना है। भारतीय समाज में भाषा को लेकर दुराग्रह हैं। जबकि भाषा के प्रति गर्व होना सांस्कृतिक समझ दर्शता है। हम भारतीय भाषाओं की समझ और उनके विकास की अवधारणा से परिचित हों, तो हमारे भाषाई विवाद और भाषाई दूषण खत्म हो जाएँगे। हिन्दी में नुक्ता के प्रयोग पर बल देना दुराग्रह है और ‘भाषा बहता नीर’ के भाव को न समझना भी।
भाषा निर्मल जल है, जो सतत प्रवास से अपना उपचार स्वयं करती है। जैसे- संस्कृत का सदियों के प्रवाह में उसका मानकीकरण पाणिनीय व्याकरण में दिखाई देता है। उसे आचार्य कात्यायन ने अपने वार्तिकों से स्वर्णाभूषणों के समान सुसज्जित किया। महर्षि पतंजलि ने उसे भाष्य से परिमार्जित कर चिरनवीन बना दिया। इसीलिए हिन्दी ही नहीं, सभी भारतीय भाषाएँ संस्कृत के प्रति कृतज्ञ भाव रखती हैं, जिसके सहयोग और संग से वे भी चिरयौवनाएँ हैं।
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(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)
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