सियासत हमसे सीखिए, ज़िद नहीं समझौता कीजिए!

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 14/7/2022

…संघर्ष के दिनों में तब कब क्या हुआ, उन्हें तारीखवार याद है। ग्वालियर की डीआरडीयू की प्रयोगशाला का वह वाकया भी, जब उन्हें पता चला कि यहां एमआईसी पर कोई रिसर्च चल रही है। वे फौरन ग्वालियर गए। अपनी परची निदेशक के पास भेजी। डॉ. रामचंद्रन नाम था उनका। भीतर परची पाते ही वे खुद बाहर चले आए। आदर से अंदर ले गए। बोले- हम आपके नाम पढ़ते रहे हैं। आप वाकई सही काम में लगे हैं। बताइए हम क्या कर सकते हैं? हमने उनसे एमआईसी पर रिसर्च का ब्यौरा मांगा। उन्होंने बिना झिझक पूरा कच्चा चिट्ठा सामने रख दिया।

अनिलजी कहते हैं कि ऐसे देशभक्त वैज्ञानिक के सामने खुद को पाकर मैं भावुक हो गया था। अब तक जितने विशेषज्ञ, वैज्ञानिक संस्थानों के प्रमुख, अफसरों और नेताओं से मिला था, उनमें यह आदमी अलग ही मिट्टी का बना हुआ दिखा। मैंने उनसे सवाल किया कि आपको डर नहीं लग रहा। आप इतनी अहम जानकारियां इतने सहज ढंग से मुझे दे रहे हैं। जबकि सरकारें तो सच को छुपाने में ही लगी हैं। डॉ. रामचंद्रन बोले– मेरी सेलरी कौन देता है? जानते हैं- आप मेरी सेलरी जनता देती है। डीआरडीयू नहीं। मैं जनता के प्रति जवाबदेह हूं। उसके हित में सच को सामने लाने की कोशिश ही देश के हित में है।

…अनिलजी बताते हैं कि इन वैज्ञानिक परीक्षणों से गैस के असर से कैंसर की संभावनाएं और भ्रूणों पर दुष्प्रभाव साबित हुए। यह काम आईसीएमआर नहीं कर पाया था। भारतीय वैज्ञानिक काबिल थे, पर वैज्ञानिक तंत्र ने उन्हें काम नहीं करने दिया। सुप्रीम कोर्ट में ये तथ्य पेश हुए। हमने कहा कि अब यूनियन कार्बाइड के रिसर्च के निष्कर्ष भी सामने आने चाहिए। कोर्ट ने एक महीने में इसकी रिपोर्ट सरकार से मांग ली। फली नरीमन तब कार्बाइड के वकील थे। पाराशरन महाधिवक्ता थे। हम खुश हुए, क्योंकि तब तक मुआवजे का केस सुप्रीम कोर्ट में गया नहीं था। महीने भर बाद जब सुप्रीम कोर्ट गए तो देखा कि नरीमन और पाराशरन बगल में खड़े हैं। एक सुर में बोले- ‘मी लार्ड, जो जानकारी आपने देने को कहा है, वह शुरू में ही केंद्र सरकार को उपलब्ध करा दी गई है। उसकी जरूरत नहीं है।’ इंदिरा जयसिंह हमारी वकील थीं। उन्होंने जानकारी कोर्ट में लाने की मांग की। लेकिन कोर्ट ने भी कह दिया कि इसकी जरूरत नहीं है। मौखिक बहस थी। इसके बाद मामला खत्म हो गया। हमारी महीनों की मेहनत पर पानी फिर चुका था। न्यूयार्क की अदालत में तीन 1985 बिलियन डॉलर मुआवजा मांगा गया था। इससे सात गुना कम मिला। अगर यूनियन कार्बाइड की लैब के तथ्य हासिल किए होते तो अमेरिकी व्यवस्था के मुताबिक क्षतिपूर्ति हर्जाने के अलावा दंडात्मक हर्जाना भी हासिल होता, जो कई गुना ज्यादा होता। जाहिर है हमारी पूरी व्यवस्था पीड़ितों के पक्ष नहीं, यूनियन कार्बाइड के हितों के लिए लगी थी।

… मई 1985 का वाकया है। भारत भवन में फिल्म फेस्टिवल चल रहा था। फिल्म व साहित्य पर सेमिनार था। स्वामीनाथन इसके सूत्रधार थे। हमने इनसे पीड़ितों के प्रति समर्थन मांगा, लेकिन कोई सामने नहीं आया। कहते रहे कि यह तो राजनीति है। फिल्म फेस्टिवल में सेमिनार के दिन जुलूस निकला था, जिसे कमला पार्क पर रोक दिया गया। मैं सेमिनार में आया। समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे अध्यक्षता कर रहे थे। मैंने मंच पर उन्हें एक परची पर लिखकर भेजा कि गैस पीड़ितों पर बात करना चाहता हूँ। लेकिन स्वामीनाथन ने मंजूरी नहीं दी। दुबेजी ने बाकायदा एनाउंस किया कि अनिल सदगोपाल का इस तरह का नोट आया है। लेकिन स्वामीनाथन की राय है कि यह फिल्म और साहित्य का मंच है। अनिल कर्मठ कार्यकर्ता हैं। अपनी बात पांच मिनट में कह सकते हैं। मैंने कहा कि छह सात महीनों से मैं निवेदन करता आ रहा हूं कि आप सब मशहूर शख्सियतें हैं। अपने नाम का फायदा हजारों गैस पीड़ितों को दीजिए। हम नुक्कड़ नाटक कर रहे हैं। अपना थोड़ा सा वक्त हमें दीजिए। स्वामीनाथन की दलील थी कि हम लोग कलाकार हैं। कला के प्रति निष्ठा है हमारी। गैस पीड़ितों के प्रति नहीं। कला को कोई निर्देशित नहीं कर सकता। हम आपके अनुरोध को पूरा नहीं कर पाएंगे।

….सरकार ने हमारी सक्रियता का बदला गांवों में शिक्षा के हमारे प्रयोग पर काम कर रही किशोर भारती से निकालने की धमकी दी। एक दिन एक खुफिया अधिकारी ने आकर चेताया कि हम गैस पीड़ितों के बीच काम करना बंद कर दें। वर्ना किशोर भारती के काम बंद कर दिए जाएंगे। सरकार आपकी कुछ मांगे तुरंत मानने को तैयार है। आप भोपाल छोड़ दें। मैंने उस अफसर को जवाब दिया कि मैं किशोर भारती से त्यागपत्र देकर ही भोपाल आया हूं श्रीमान। मेरा वहां कोई संपर्क नहीं है। बाद में वोराजी ने भी मामला सुलटाने के लिए हमें बुलाया। उनका वह कथन अब तक याद हैं। उन्होंने कहा था कि आप लोग नौसिखिए हैं। राजनीति में जिद नहीं, समझौतों से काम चलता है। पर हम टस से मस नहीं हुए। हमें उनके रवैए पर ही हैरत थी। ये जनता के नुमाइंदे थे, लेकिन किसका हित साध रहे थे? 
(जारी….)
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(नोट : विजय मनोहर तिवारी जी, मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। उन्हें हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 का शरद जोशी सम्मान भी दिया है। उनकी पूर्व-अनुमति और पुस्तक के प्रकाशक ‘बेंतेन बुक्स’ के सान्निध्य अग्रवाल की सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर यह विशेष श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके पीछे डायरी की अभिरुचि सिर्फ अपने सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित है। इस श्रृंखला में पुस्तक की सामग्री अक्षरश: नहीं, बल्कि संपादित अंश के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसका कॉपीराइट पूरी तरह लेखक विजय मनोहर जी और बेंतेन बुक्स के पास सुरक्षित है। उनकी पूर्व अनुमति के बिना सामग्री का किसी भी रूप में इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही का कारण बन सकता है।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ  
43 . सरकार घबराई हुई थी, साफतौर पर उसकी साठगांठ यूनियन कार्बाइड से थी!
42. लेकिन अर्जुनसिंह वादे पर कायम नहीं रहे और राव पर उंगली उठा दी
41. इस मुद्दे को यहीं क्यों थम जाना चाहिए?
40. अर्जुनसिंह ने राजीव गांधी को क्लीन चिट देकर राजनीतिक वफादारी का सबूत पेश कर दिया!
39. यह सात जून के फैसले के अस्तित्व पर सवाल है! 
38. विलंब से हुआ न्याय अन्याय है तात् 
37. यूनियन कार्बाइड इंडिया उर्फ एवर रेडी इंडिया! 
36. कचरे का क्या….. अब तक पड़ा हुआ है 
35. जल्दी करो भई, मंत्रियों को वर्ल्ड कप फुटबॉल देखने जाना है! 
34. अब हर चूक दुरुस्त करेंगे…पर हुजूर अब तक हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे थे? 
33. और ये हैं जिनकी वजह से केस कमजोर होता गया… 
32. उन्होंने आकाओं के इशारों पर काम में जुटना अपनी बेहतरी के लिए ‘विधिसम्मत’ समझा
31. जानिए…एंडरसरन की रिहाई में तब के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की क्या भूमिका थी?
30. पढ़िए…एंडरसरन की रिहाई के लिए कौन, किसके दबाव में था?
29. यह अमेरिका में कुछ खास लोगों के लिए भी बड़ी खबर थी
28. सरकारें हादसे की बदबूदार बिछात पर गंदी गोटियां ही चलती नज़र आ रही हैं!
27. केंद्र ने सीबीआई को अपने अधिकारी अमेरिका या हांगकांग भेजने की अनुमति नहीं दी
26.एंडरसन सात दिसंबर को क्या भोपाल के लोगों की मदद के लिए आया था?
25.भोपाल गैस त्रासदी के समय बड़े पदों पर रहे कुछ अफसरों के साक्षात्कार… 
24. वह तरबूज चबाते हुए कह रहे थे- सात दिसंबर और भोपाल को भूल जाइए
23. गैस हादसा भोपाल के इतिहास में अकेली त्रासदी नहीं है
22. ये जनता के धन पर पलने वाले घृणित परजीवी..
21. कुंवर साहब उस रोज बंगले से निकले, 10 जनपथ गए और फिर चुप हो रहे!
20. आप क्या सोचते हैं? क्या नाइंसाफियां सिर्फ हादसे के वक्त ही हुई?
19. सिफारिशें मानने में क्या है, मान लेते हैं…
18. उन्होंने सीबीआई के साथ गैस पीड़तों को भी बकरा बनाया
17. इन्हें ज़िन्दा रहने की ज़रूरत क्या है?
16. पहले हम जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं… गुलाम, ढुलमुल और लापरवाह! 
15. किसी को उम्मीद नहीं थी कि अदालत का फैसला पुराना रायता ऐसा फैला देगा
14. अर्जुन सिंह ने कहा था- उनकी मंशा एंडरसन को तंग करने की नहीं थी
13. एंडरसन की रिहाई ही नहीं, गिरफ्तारी भी ‘बड़ा घोटाला’ थी
12. जो शक्तिशाली हैं, संभवतः उनका यही चरित्र है…दोहरा!
11. भोपाल गैस त्रासदी घृणित विश्वासघात की कहानी है
10. वे निशाने पर आने लगे, वे दामन बचाने लगे!
9. एंडरसन को सरकारी विमान से दिल्ली ले जाने का आदेश अर्जुन सिंह के निवास से मिला था
8.प्लांट की सुरक्षा के लिए सब लापरवाह, बस, एंडरसन के लिए दिखाई परवाह
7.केंद्र के साफ निर्देश थे कि वॉरेन एंडरसन को भारत लाने की कोशिश न की जाए!
6. कानून मंत्री भूल गए…इंसाफ दफन करने के इंतजाम उन्हीं की पार्टी ने किए थे!
5. एंडरसन को जब फैसले की जानकारी मिली होगी तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी रही होगी?
4. हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन…
3. फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई
2. फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!
1. गैस त्रासदी…जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया!

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Neelesh Dwivedi

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