Dipak Daughter

बेटी के नाम 12वीं पाती : जीवन की असल रंगत तुम्हीं से है मेरी बच्ची, जन्मदिन शुभ हो

दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश

प्रिय मुनिया

मेरी लाडो, मैं तुम्हें यह पत्र तुम्हारे पाँचवें जन्मदिन पर लिख रहा हूँ। आज 27 जनवरी 2026 को तुमने जीवन के चार बसंत पूरे कर लिए हैं। मैंने तुम्हें पिछला पत्र जुलाई 2025 में लिखा था। तुम्हें पाँच माह के अंतराल पर यह पत्र लिखते हुए मुझे खेद हो रहा है। यूँ लेटलतीफी के साथ पत्र लिखने पर अपराधबोध महसूस कर रहा हूँ। तुम्हें तो मालूल ही है कि अगस्त में स्कूटी फिसल जाने से हुई भीषण टूट-फूट और तीन-तीन ऑपरेशन के बाद मैं डेढ़ माह बेड रेस्ट पर था। इस शारीरिक दुर्घटना के बाद के बीते पाँच माह काफी अस्त-व्यस्त रहे हैं। तुम्हें यह जानकर शायद आश्चर्य होगा कि हर बार की तरह इस बार की दुर्घटना का भी सबसे सकारात्मक पहलू यह रहा कि तुम्हारे साथ ढेर सारा वक्त बिताने का समय हासिल हुआ है। 

letters to Daughter

प्रिय मुनिया 

मेरी लाडो, तुम्हारी सहृदयता और प्रेम के बारे में बताते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है। यह लिखना सुखद है कि दूसरों की पीड़ा को बाँट लेने की ललक तुम्हारे अंदर अभी से दिखाई देती है। हॉस्पिटल से घर आने के बाद तुमने मेरे दोनों हाथ और एक पैर में लंबी बँधी पट्टियों को देखकर पहले अपनी सारी जिज्ञासा शांत की थी। मसलन कि मुझे चोट कैसे लगी? दुर्घटना कैसे हुई? डॉक्टर ने चोट को ठीक कैसे किया? ऑपरेशन का प्रोसिजर क्या था? तुम्हारे जितनी नादान उम्र की बच्ची का कलेजा इतना भी मजबूत हो सकता है, मुझे यह उसी दिन पता चला। आलम यह रहा कि ऑपरेशन को लेकर मुझसे मिली जानकारी को तुम अपनी तोतली जबान से मुझे देखने आने वाले हर दूसरे आदमी से साझा करती रहीं, ”पापा की स्कूटी पिछल गई थी, तो डॉक्टल ने पहले एछे पापा के हाथ को काटा फिल सुई से सिलाई किया ओल दब्बू लगाकर किया है, देखो तो जरा देखो दादी पापा को कित्ती साली पट्टी लगाई है।” इसकी इंतिहा तो तब हो गई कि जब तुम्हें दिन में कई बार मेरी टूट-फूट के सारे एक्सरे और चीर-फाड़ वाले घावों के फोटो भी देखने होते थे। आमतौर पर बच्चे शरीर की चीर-फाड़ के ऐसे दृश्य देखकर डर जाते हैं लेकिन तुम्हें उसमें आनंद प्राप्त होता था। अभी भी जब कभी तुम्हें याद आ जाती है, तो टूट-फूट वाले सारे एक्सरे दिखाने पड़ जाते हैं।

प्रिय मुनिया

मेरी बच्ची, बहुत से मनोभावों को शब्दों में बता पाना संभव नहीं है। यह पहली बार था, जब दुर्घटना इतनी भीषण रही कि तुम्हें गोद में उठा पाना भी संभव नहीं था। बावजूद इसके तुम और तुम्हारा प्रेम मरहम की तरह मेरे सीने में लिपटा ही रहा। गोया कि मेरी टूट-फूट को लेकर इस पत्र को केन्द्रित करने का इरादा नहीं था, लेकिन तुम्हारा प्रेम इस कठिन समय में मेरे लिए एक नई ऊर्जा का काम करता रहा। संभवतः इसीलिए मैं तुम्हारे जन्मदिन के दो दिन पहले नर्मदा जयंती पर माँ नर्मदा की पंचकोसी परिक्रमा पैदल करने में भी सफल रहा। ठीक अभी इस वक्त, जब मैं यह पत्र तुम्हें लिख रहा हूँ, तब तुम बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही हो। लेकिन मुझे पहुँचते-पहुँचते आधी रात बीत जाएगी। बहरहाल आज 26 तारीख बीत जाएगी और तुम्हारे जन्मदिन की दिनांक शुरू हो जाएगी। जल्द तुम्हारे पास होने की खुशी ने मुझे इतना उत्साहित कर दिया है कि मानसिक और शारीरिक रूप से हद तक थका होने के बाद भी ऊर्जावान महसूस कर रहा हूँ।

प्रिय मुनिया

मेरी बच्ची, लगभग एक पखवाड़े से ज्यादा समय बाद तुम नानी माँ के घर से लौटकर आई हो। बीता एक माह तुम्हारे और तुम्हारी माँ के बिना एकदम सूना-सूना रहा है। आज पूरे एक माह बाद तुमसे मिलने का समय दिन काटते-काटते नजदीक आ गया है। ये महज संयोग है कि तुम्हारा जब भी नानी के घर से लौटना होता है, हम शहर से नदारद होते हैं। आगे समाचार यह है कि हर बार की तरह इस बार भी हम बस्ती के बच्चों के बीच उन्हें कुछ भेंट देकर तुम्हारा जन्मदिन मनाएँगे। हम चाहते हैं कि तुम्हें धीरे-धीरे यह शिक्षा मिले कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है। ईश्वर तुम्हारे अंदर मानवता के अंकुरणों को सदैव प्रस्फुटित करता रहे। जरूरतमंदों की मदद से मिलने वाले सुख का भाव तुम्हारे अंदर जज्ब होना बहुत जरूरी है। मनुष्यता की ओर बढ़ते रहना ही मानव जीवन का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू है। 

प्रिय मुनिया

मेरी बच्ची, तुम ये सदैव याद रखना कि हम जितना सरल और सहज होते जाते हैं, उतना ही और अधिक मानवीय गुणों की ओर बढ़ते जाते हैं। मैं जानता हूँ कि एक बेहतर इंसान होने के लिए बहुत कुछ आवश्यक है, लेकिन जिन आधारभूत गुणों के कारण मनुष्य अपने मानव होने का अभिमान कर सकता है, वह मनुष्यता के इतर और कुछ नहीं है। मैं जानता हूँ कि यह पत्र तुम्हारे लिए थोड़ा बोझिल हो सकता है, क्योंकि गूढ़तम बातें लिखने में यदि मुझे रस नहीं मिल रहा है, तो फिर तुम्हें पढ़ने में आनंद कैसे आएगा? लेकिन हर पत्र के केन्द्र में सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी शैतानियों के किस्से हों यह भी तो ठीक नहीं है।

प्रिय मुनिया

मेरी बच्ची, आगे समाचार यह है कि तुम्हारी बातें और उनके अर्थ अब सार्थक होते चले जा रहे हैं। तुम्हारी तोतली जबान में लिपटी टूटी-फूटी हिल्दी में अब बहुत सुधार हो चला है। तुम्हारा तोतलापन भी सिर्फ ‘र’ को ‘ल’ कहने तक ही सीमित रह गया है। तुम्हें अपने बारे में यह जानकर आश्चर्य होगा कि घर पर तुम्हारा स्वभाव बहुत उग्र और जिद से भरा हुआ दिखाई देता है, लेकिन स्कूल पहुँचकर तुम्हारे अंदर एक नई यज्ञा का प्रादुर्भाव हो जाता है। स्कूल से मिलने वाली सूचनाओं पर गौर करें, तो तुम ‘अटेंशन सीकर’, जिद्दी और शर्मीली सी दिखने वाली लड़की में परिवर्तित हो जाती हो। अब भला उन्हें कौन समझाए कि तुम तो इस समय चलता-फिरता बारूद हो। अभी दिसंबर में ही नानी के यहाँ जाने से दो रोज पहले तुमने अपने सारे खिलौने बालकनी से नीचे फेंक दिए थे। विक्स की बड़ी डिब्बी का सारा विक्स तुमने एक ही बार में गले सहित पूरे शरीर में लगा लिया था। वैसलीन की आधी डिब्बी मलाई की तरह तुम चट कर गईं। पूरा का पूरा बोरोलिन चेहरे पर पोत लिया था। ये सब तो आए दिन होने वाले उपक्रम हैं, अब आलम यह है कि नजर हटते ही तुम किसी न किसी नई शरारत को अंजाम दे देती हो। अब शरारत के मामले में तुम ‘आफत की पुड़िया’ बन गई हो। घर में तुम्हें बहुत संभालना और देखना पड़ता है अन्यथा ‘नजर हटी और दुर्घटना घटी’। मेरी बच्ची, तुम्हारी ये सब बदमाशियाँ बीते दिसम्बर की ही हैं। मेरी जान बदमाशियों का पूरा का पूरा जखीरा तुम्हारे अंदर कैद है। जब भी तुम्हारी मर्जी होती है कोई एक बदमाशी उसमें से चुन लेती हो। बहरहाल मैं अब हमारे पत्र पर लौटता हूँ।

प्रिय मुनिया

तुम्हें पत्र लिखने के बहाने ही सही टूट-फूट के पाँच माह बाद कुछ लिख पा रहा हूँ। तुम मेरा सबसे बड़ा ‘लकी चार्म’ हो, जिसके होने मात्र से सौभाग्य बरसता ही रहता है। क्योंकि ये महज संयोग नहीं हो सकता है कि दुर्घटना वाले दिन दो अगस्त को स्कूटी फिसलने के ठीक 20 मिनट पहले तुम स्कूटी से उतर जाती हो। ठीक उसी दिन लगभग चार साल बाद मैंने सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे कारण ही हैलमेट पहना था। क्योंकि उस दिन सुबह से लगातार हल्की बारिश हो रही थी। तुम्हें भीगने से बचाने के लिए अपना गमछा ओढ़ाते ही मुझे खुद हेलमेट लगाना पड़ा। मेरे लिए तो ये सब किसी चमत्कार से कम नहीं है। तुम्हारे साथ बीता हर पल सुनहरा है। मैं इन्हें यादों के पिटारे में कैद करके स्मृति लोक भेज देता हूँ, ताकि जरूरत पड़ने पर स्मृतियों के सहारे ये सुनहरा समय जिया जा सके। तुम्हारे होने से जीवन और रंग-बिरंगा हो गया है। जीवन में रंग भरने के लिए शुक्रिया मेरी गिलहरी। जीवन की असल रंगत तुम्हीं से है।

मेरी लाडो, देखो समय कैसे पंख लगाकर उड़ता है। देखते ही देखते तुमने उम्र के चार बसंत पार कर लिए हैं। ये पाँचवाँ वर्ष तुम्हारे जीवन में नए-नए रंग भरे। इसी आशा और विश्वास के साथ शेष समाचार अगले पत्र में संप्रेषित करूँगा। तब तक के लिए तुम्हें जन्मदिवस की ढेरों शुभकामनाएँ, ढेर सारा प्यार और दुलार। 💝

– तुम्हारा पिता, 27 जनवरा 2026 

#मुनियाकेनामपाती 

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बेटी के नाम दीपक की पिछली चिटि्ठयाँ 

11 – बेटी के नाम 11वीं पाती : तुम्हारे साथ जिया वक्त ही इस समय का असल हासिल है
10- बेटी के नाम दसवीं पाती : मैं तुम्हारी शहद से मीठी बातों की मिसरी को बहुत याद करूँगा!
9- बेटी के नाम नौवीं पाती : मुझमें और अधिक मनुष्यता भरने के लिए शुक्रिया मेरी गिलहरी
8- बेटी के नाम आठवीं पाती : तुम्हें जीवन की पाठशाला का पहला कदम मुबारक हो बिटवा
7- बेटी के नाम सातवीं पाती : हमारी चुप्पियाँ तुम्हारे इंतजार में हैं, तुम जल्दी आना….।
6 – बेटी के नाम छठवीं पाती : तुम्हारी मुस्कान हर दर्द भुला देती है
5- बेटी के नाम पाँचवीं पाती : तुम्हारे साथ बीता हर पल सुनहरा है
4. बेटी के नाम चौथी पाती : तुम्हारा होना जीवन की सबसे ख़ूबसूरत रंगत है 
3.  एक पिता की बेटी के नाम तीसरी पाती : तुम्हारा रोना हमारी आँखों से छलकेगा 
2. एक पिता की बेटी के नाम दूसरी पाती….मैं तुम्हें प्रेम की मिल्कियत सौंप जाऊँगा 
1. प्रिय मुनिया, मेरी लाडो, आगे समाचार यह है कि…

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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। उन उकेरी अनुभूतियों काे #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक भी पहुँचें।

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