ईरान की सर्वेनाज़ हेरानर और साहेल फिलसूफ।
टीम डायरी
तस्वीर में दिख रहे ये कुछ प्रतिनिधि चेहरे हैं। अलग प्रान्त, अलग देश, अलग पहचान, अलग ज़ुबान, अलग नाम। लेकिन काम एक जैसा! तस्वीर में बाईं तरफ़ दिख रही हैं सर्वेनाज़ हेरानर और उनके दाहिने साहिल फिलसूफ। सर्वेनाज़ ईरान की राजधानी तेहरान की हैं। अपने पति मेंहदी यज़दानी के साथ पहियों पर पुस्तकालय चलाती हैं। जबकि बिल्कुल इसी तरह का काम ईरान के रश्त शहर में साहिल करते हैं। इनके साथ एक नाम और जोड़ लीजिए- मोहम्मद आज़म, जो इन्हीं की तरह मिस्र के अलेक्ज़ेंड्रिया शहर में पहियों पर पुस्तकालय दौड़ाते हैं।
ये सभी लोग कोई ज़्यादा प्रभावशाली नहीं हैं। टैक्सी चलाकर आजीविका कमाते हैं। सो, कह सकते हैं कि पैसों से भी बहुत सक्षम नहीं होंगे। जिन देशों में ये रह रहे हैं, वे सामाजिक-आर्थिक या राजनैतिक-धार्मिक रूप से स्थिर वातावरण वाले हैं, ऐसा भी नहीं कह सकते। मतलब अभावों का दायरा अपेक्षाकृत रूप से बड़ा है इनके सामने। बावज़ूद इसके इनका जज़्बा देखिए कि इस अभाव के बीच भी इन्होंने बेहतर कर दिखाया।
अपने-अपने शहरों के व्यस्त ओर शोर-शराबे वाले इलाक़ों में अपनी टैक्सियाँ दौड़ाते हुए ये सभी लोग अपने मुसाफ़िरों को थोड़ा ज़ेहनी सुक़ून बाँटते हैं। उन्हें किताबों से जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। इसके लिए अपनी टैक्सियों में सैकड़ों किताबें रखकर घूमते हैं। इन पर सवार होकर एक से दूसरी जगह जाने के दौरान गुजरने वाले वक़्त में हर मुसाफ़िर अपनी पसन्द की किताबों को आराम से पढ़ सकता है। अच्छी लगे तो ख़रीद सकता है। और अगर ख़रीदना न चाहे, तो दो-चार दिन के लिए किराए पर भी ले सकता है।
इन सभी ने अपनी इस अनोखी पहल को जब शुरू किया तो इन्हें अपनी जेब से पैसे लगाकर किताबें ख़रीदनी पड़ीं। पर अब कई लोग तथा संस्थाएं इनकी मदद के लिए आगे आए हैं। उन्हें किताबें ख़रीदकर दान कर रहे हैं। या फिर ख़रीदने के लिए वित्तीय मदद कर रहे हैं। इसी कारण अब ये सभी लोग अपने मुल्क़ की सरहदों के बाहर भी जाने-माने चेहरे बन चुके हैं। जो भी इनके प्रयासों के बारे में जानता है, बिना तारीफ़ के नहीं रहता।
हालाँकि जैसा पहले ही लिखा गया, इन्हीं लोगों की तरह और भी लोग हैं। मसलन- पिछले महीने ही महाराष्ट्र के नासिक में आगरा-मुम्बई राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुस्तकों का होटल चलाने वाली दादी भीमाबाई के बारे में #अपनीडिजिटलडायरी पर लिखा गया। ऊपर उस लेख के शीर्षक के साथ लिंक है, पढ़ सकते हैं। पता चलेगा कि दादी भीमाबाई का अनूठा प्रयास भी ‘अभाव से पैदा हुए भाव’ की उपज है।
तो क्या कुछ बेहतर कर गुजरने का भाव अक़्सर अभाव से पैदा होता है? हो सकता है। क्योंकि जब तक हम दबाव (परिस्थिति, व्यक्ति या सोच के) या प्रभाव (जीवन में कुछ हासिल कर लेने का अपना दम्भ भी) में रहते हैं, किसी को कुछ समझते ही कहाँ हैं! ऐसे में किसी के लिए कुछ करने का भाव भी कहाँ से आएगा भला!!
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