दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश
प्रेम से बड़ा कोई मरहम नहीं है और मेरे पास तो प्रेम की सबसे बड़ी पोटली है। यह जो मेरे पेट पर बैठी है न, यही मेरी जादू की पुड़िया है, तभी तो दोनों हाथ, एक पैर और जबड़ा सब हिल जाने और बुरी तरह टूट जाने के बाद भी इसका मरहम मुझे तेजी से तंदुरुस्त करने में मदद कर रहा है।
न जाने क्या है कि बीते दो-तीन साल से यह टूट-फूट लगातार मेरे साथ बनी हुई है। अब तो इसकी आदत सी हो गई है। मेरे दर्द का तो मुझे कुछ समझ में ही नहीं आता है। यह बात और है कि मेरी तकलीफ में दर्द महसूस करने वाले अपनों की भीगी पलकें, उदास चेहरे और लटकी हुई सूरतें मुझसे बर्दाश्त नहीं होतीं। इसलिए दर्द के सन्नाटे को चीरते हुए ठहाके लगाने में ज्यादा मजा है।
जीवन के हमारे हर दर्द का सबसे बड़ा मरहम प्रेम और हमारी मुस्कान ही है। बीते तीन सालों में मेरे साथ अकस्मात और आश्चर्यजनक तरीके से हुईं दुर्घटनाओं का असल हासिल यही है। मैं यही सीख पाया हूँ कि यदि दर्द में भी ठहाके लगाने का हुनर है, तो फिर बेतहाशा दर्द भी ज्यादा तकलीफ नहीं दे पाता।
ऐसा नहीं है कि जीवन में इतनी उथल-पुथल मचने से मैं प्रभावित नहीं होता हूँ। अपन कोई ‘आयरन मैन’ नहीं है भाई, लेकिन अंतस के उजियारे से बाहर का अंधेरा चीरने में बहुत मदद मिलती है। ये मेरा निजी अनुभव है। शायद इसीलिए शरीर सब तरफ से टूट-फूट जाने, हफ्ते- हफ्ते भर अस्पताल में रहने, ढेरों दर्दनिवारक इंजेक्शन, एनस्थीसिया और ऑपरेशन्स के बीच भी मैं अस्पताल में हर वक्त सबको हँसाने में कामयाब रहा।
यहां तक कि ऑपरेशन थियेटर में जब अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी और सतना के वरिष्ठ अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉक्टर डी डी मिश्रा (डीडी सर) मेरा ऑपरेशन कर रहे थे, तब अपन उनसे टूट-फूट की सारी जानकारी ले रहे थे। प्रक्रिया को विस्तार से समझ रहे थे। मसलन इस बार कितनी लम्बी प्लेट लगेगी, कितने पेंच कसे जाएँगे, घुटने की हड्डी में कितने छेद हुए हैं, अब कहाँ गड्ढा हुआ, कलाई में कितने लम्बे तार से सिलाई हुई, आदि। सब कुछ मुझे जानने का मन हुआ क्योंकि मेरे शरीर में क्या, कहाँ, कितना और कैसे ठूँसा जा रहा है, मुझे पता होना चाहिए था।
इस बार तो तीन ऑपरेशन हुए, जिनमें से दो के वक्त मैं पूरे होश में था। बस, एनस्थीसिया की खुराक के कारण हाथ और पैर सुन्न थे, लेकिन उन्हें काटने, हड्डियों में छेद करने, पेंच कसने और सिलने तक की तमाम आवाजें मेरे कानों में साफ सुनाई दे रही थीं। यहां तक कि ऑपरेशन के वक्त एनस्थीसिया वाले डॉक्टर साहब के मोबाइल पर बज रहे संगीत में भी मुझे अपनी पसंद का संगीत चाहिए था। अगर वो ‘याहू, चाहे कोई मुझे जंगली कहे’ बजाते, तो मैं डीडी सर को बोलकर ‘पल-पल दिल के पास तुम रहती हो’ लगवा लेता था। मेरी इच्छा तो इस बार सारी प्रक्रिया सीधे देखने की थी। लेकिन डॉक्टर और मेरे शरीर दोनों ने उसकी इजाजत नहीं दी।
बहरहाल यह सब कहने का मतलब ये नहीं निकाला जाना चाहिए कि यही सबसे उचित तरीका है या मैं बड़ा बहादुर हूँ। वास्तव में ‘ये मेरे शब्द ही मेरी आत्मा हैं। लिखकर मैं जितना सहज और हल्का महसूस करता हूँ, उतना किसी से बात करके भी मैं सामान्य नहीं हो पाता हूँ। क्योंकि मैं जानता हूँ कि दुनिया भले ही मेरा साथ छोड़ दे। मेरे शब्द मरते दम तक मेरे साथ रहेंगे। इनके सहारे ही रोना, गाना, हँसना अपन को सबसे ज्यादा भाता है।’
शायद इसीलिए मैंने लम्बे समय तक डायरी लिखी और वयस्क होते-होते सब जला भी दीं, क्योंकि उनमें इतनी साफगोई से अपनी हर चीज दर्ज थी कि मेरी ही निजता का हनन हो जाता। तो इस तरह, बचपन से ही लिखकर हल्का हो लेने की आदत लगी रही, तो अब हर बार लिखकर रीत जाना, खाली हो जाना बेहद जरूरी है। हर किसी का रोने और आँसू बहाने का अपना-अपना तरीका है। हमारा तो यही लिखना है, तो भाई लोग, अपने लिखे से किसी में थोड़ा भी सार्थक और सकारात्मक बदलाव आए तब अपनी जय-जय है।
बाकी आज पहली बार तकनीक के सहारे बोल-बोलकर लिख रहा हूँ। ज्यादा मजा तो नहीं आ रहा है, पर ठीक है। इस बीच यज्ञा जी भी पापा-पापा करते फिर दुलारने आ गई हैं। अच्छा लगता है, जब यह मेरी गिलहरी इधर- उधर फुदकते हुए बीच-बीच में हाल-चाल लेती रहती है। इतनी टूट-फूट के बीच भी इसे मेरे गले और सीने से ही चिपकना है। सच कहूँ तो इस प्रेम की पोटली का स्पर्श ही इस भीषण वक्त का सबसे बड़ा हासिल भी है।
अब ऐसे में तो यही कहना ठीक होगा कि तेरी रहमत के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया ऊपर वाले। तुम मुझे अभी से आगामी भविष्य के जिस भी सबसे बुरे वक्त के लिए तैयार कर रहे हो, उम्मीद है कि मैं उससे भी यूं ही हँसते-हँसते निकल पाऊँगा। वैसे ऐसा भी नहीं है कि ऐसे बुरे अनुभवों से दो-चार होने के बाद मैं दर्द महसूस नहीं करता हूँ। दरअसल बीते कुछ सालों में अब इतना कुछ घट चुका है कि मैं इन सब चीजों के लिए मानसिक रूप से सदैव तैयार रहता हूँ। न जाने कब कहाँ लुढ़क जाऊँ और फिर शरीर की कोई हड्डी टूट जाए। बीते तीन सालों में मेरी यह पाँचवीं दुर्घटना है। लगभग सारी दुर्घटनाएँ ऐसे हास्यास्पद और आश्चर्यजनक तरीके से हुई हैं कि खुद पर यकीन करना मुश्किल है। फिर भी ऐसे कठिन समयों में एक चीज हमेशा मेरे पास रही है। वह है प्रेम। विशुद्ध प्रेम। मेरे मित्रों, शुभचिन्तकों, परिजनों और इस ‘प्रेम की पोटली’ से सदैव जो निश्छल प्रेम बरसा है, बस जीवन की असल कमाई यही है। जीवन का शुद्ध लाभ भी।
ये घटना-दुर्घटना, जीवन की विकट परिस्थितियाँ और इनके बीच उपजा कठिन समय कई तरह से सोचने पर विवश कर देता है। मसलन कि भाग्यवादी सोचेंगे मेरी किस्मत खराब है। हमेशा मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है? आखिर क्यों होता है? टाइम ही खराब चल रहा है। कुछ तो बहुत गड़बड़ हो रहा है ! जो भी हो मुझे अब इन सब चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। ये जिन्दगी है और इसे रुकना नहीं चाहिए। मैं आस्थावादी हूँ, तो यही कहता हूँ कि जिस किसी के साथ भी इस तरह की घटनाएँ-दुर्घटनाएँ घटीं या अकस्मात विपदाएँ आई हैं, उससे पार पाने का सबसे सरल तरीका यही है कि उस वक्त को हँसकर एकदम ठहाके लगाकर गुजार दीजिए। जीवन प्रेम से लबालब है। इसके आस-पास बिखरा सारा प्यार अपनी पोटली में समेट लीजिए। दुनिया कभी प्रेम से विदा नहीं ले सकती। वह कभी प्रेम से खाली नहीं होगी। इसमें अपार प्रेम है। दुनिया में अब भी बहुत मनुष्यता बची हुई है। यही प्यार जिन्दगी के हर जख्म का असली मरहम है।
जैसे ढेर सारे जाने-अनजाने लोगों का प्यार और आशीर्वाद मेरे लिए इलाज का काम कर रहा है। यही प्रेम इस वक्त से मिले घावों में लेपी जा रही संजीवनी दवा है। ये बहुत असरदार है। मैं जल्दी उठूँगा फिर अपने पैरों पर चलूँगा। जीवन को फिर कुछ नई दिशा मिलेगी। यह वक्त भी बीत जाएगा। पहले भी ऐसा समय बीता है। यह भी धीरे-धीरे बह जाएगा। मेरा बीते तीन सालों का यही तजुर्बा है। अब तक इतनी सारी घटनाओं के बाद शरीर में दो ही हिस्से शेष और सुरक्षित बचे हैं। एक तो रीढ़ की हड्डी और दूसरा अपना सिर। बाकी सब कभी न कभी दरक चुका है। मतलब मेरी आत्मा और मन को छोड़कर लगभग सब कुछ टूट चुका है। भोपाल छोड़ने के बाद, पत्रकारिता छोड़ने के बाद अपने घर गाँव और शहर में लौटने के बाद ही अपनों के बीच जीवन का सबसे कठिन समय बीत रहा है। शायद सबसे बेहतर समय मैं जी चुका हूँ या फि यह भी हो हो सकता है कि आने वाला समय जीवन का सबसे बेहतर समय हो। इसलिए आशावादी रहते हुए सार्थक और सकारात्मक जीना जरूरी है।
अपनी स्मृतियों के खजाने से जब बीता वक्त चुराकर अपने पास लाता हूँ, तो पत्रकारिता की नौकरी के 15 साल और माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय, भोपाल में गुजरे दो साल उम्दा लगते हैं। लगभग इन दो दशकों में पल्सर, अपाचे आदि बाइक से शहर दर शहर कितनी सड़कें नापीं, वह भी भीषण रफ्तार से। चाहे भोपाल से उज्जैन- इन्दौर हो, चाहे औरंगाबाद से नाशिक-पूना-शिर्डी-बीड़ और रालेगणसिद्धी। एक नहीं कई-कई बार इन रास्तों पर बाइक दौड़ाई। कभी भी मामूली खरोंचों के अलावा कुछ नहीं हुआ। लेकिन मेरे अपने शहर सतना में यह सौभाग्य जाता रहा। यहाँ की गड्ढों से पटी पड़ी सड़कों ने इतने हादसों का शिकार बना दिया है कि अब तक किसी नए हादसे से कोई ज्यादा फर्क ही पड़ता। इस शहर ने तो पग-पग पर दगा किया है। ईश्वर जाने क्या चाहता है? कौन सी सीख देना चाहता है? ऐसे ढेर सारे विचारों से मेरा मस्तिष्क इन दिनों जूझ रहा है, क्योंकि वास्तव में यह सब मेरी समझ से भी परे है।
इसीलिए ऐसे हादसों को जिन्दगी का कोई मुश्किल सबक समझकर मैं इसे सीख रहा हूँ। लगातार जीवन की मुश्किलों को ठेंगा दिखाकर मैं ठहाका लगाने का मौका ढूँढ लेता हूँ। शायद जिन्दगी भी यही चाहती है कि मैं गिरते-पड़ते और उठते हुए इतना मजबूत हो जाऊँ कि बड़ी से बड़ी विपदा मेरी हँसी नहीं रोक पाए। मुझे न रोक पाए। इस तरह, भविष्य में जो घटित होने वाला है, जीवन मुझे उसके लिए तैयार कर रहा है और मैं तैयार हूँ। आगे जो होगा, देखा जाएगा।
मैं इस वक्त अपने हाथों से टाइप नहीं कर पा रहा हूँ। यह सब मुझे बोलकर लिखना पड़ रहा है। हालाँकि यह भी सहजता से नहीं हो पा रहा है। जबड़ा बुरी तरह से हिल चुका है। सामने के तीन दाँत गायब हो चुके हैं। ऐसे में, मेरे पास इन सब चीजों से लड़ने के लिए सबसे जबरदस्त हथियार मेरी हँसी है। बड़े-बड़े सुन्दर सुफैद दाँतों वाली दस बाई दस की मुस्कान, जिसमें अब पोपलेपन का दाग लग गया है। पर कोई बात नहीं मैं नकली दाँत लगवाकर हंसेगा। मेरा ठहाका नहीं रुकेगा। ऐ जालिम जिन्दगी तू कितना भी जुल्म ढा। मैं हँसना नहीं छोड़ेगा। कभी हँसना नहीं छोड़ेगा। तू कर सितम, कर ले जितने तुझे करने हैं। मैं हँसना नहीं छोड़ेगा। मैं उठेगा, बार-बार उठेगा। हजारों बार गिरकर भी उठेगा, जब तक शरीर में साँस है। हर बार उठता रहेगा…हर बार उठता रहेगा…।
पर चलो अभी बोलते-बोलते फिल्मी डायलॉग बहुत हो गया है। सो, सबके लिए बस यही जानकारी है कि मैं ठीक हूँ। फिलहाल दो-तीन महीने तो चलने-फिरने और दुरुस्त होने में लगेंगे। ऐसे में, सभी की दुआओं प्रेम और आशीर्वाद के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। मित्र सुमित पाण्डे ने दुर्घटना की फोटो फेसबुक पर चस्पा नहीं की होती, तो मुझे यह सब नहीं लिखना पड़ता, क्योंकि मैं कुशल क्षेम देते-देते फोन उठा-उठाकर थक गया हूँ। सबको इस हालिया दुर्घटना की वही- वही घिसी-पिटी कहानी सुनाकर ऊब गया हूँ। अब उसे कहने में कोई रोमांच नहीं रह गया है। दूसरा कि फिलवक्त जीवन से रोमांस भी गायब है। सो, अब ऐसे में यह सब बताने जताने में मुझे बिल्कुल भी आनंद नहीं आता। ऐसा लगने लगता है कि जैसे दर्द दिखाकर सहानुभूति बटोरने में लगा हुआ हूँ। इसलिए मैं अक्सर घटनाओं- दुर्घटनाओं से ठीक होने के दो-चार महीने बाद ही आमतौर पर ऐसा कुछ लिखता हूँ।
हालाँकि, यह पहली बार है जब मैं अस्पताल से दो दिन पहले छुट्टी लेकर घर पहुँचा हूँ और यह लिखने बैठ गया। इस बीच, कल जबरदस्त तरीके से रक्षाबंधन मनाया गया। तमाम लोग मिलने आए। इसी बहाने बहुत से लोगों से बड़े दिनों बाद मिलना हुआ। कुल मिलाकर सब जबरदस्त है। जिन्दगी जिन्दाबाद! जल्द मिलते हैं कुछ और नई सुखद तस्वीरों के साथ। ‘आवारा की डायरी’ को नई शक्ल देते हुए। बारिशों में घूँट-घूँट थोड़ी जिन्दगी को पीते हुए। कुछ चिट्ठियों में नए रंग भरते हुए। संताप छोड़कर जीवन का ताप लेते हुए।
सभी के प्रेम और आशीर्वाद के लिए बार-बार दिल से शुक्रिया, क्योंकि ये प्रेम ही हर जख्म का मरहम है।
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