औरंगाबाद के दौलताबाद किले का ही पुराना नाम देवगिरि हे।
बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से
महाराष्ट्र के यादव राजाओं की राजधानी थी देवगिरि (आज का दौलताबाद, औरंगाबाद)। मराठों का गरुड़ध्वज देवगिरी पर शान से फहरा रहा था। यादव राजा अपने आपको पृथ्वीवल्लभ देवगिरिपुरवर पुरन्दर कहलाते थे। राजा भिल्लम यादव ने इस किले को राजधानी के काबिल बनवा लिया। महाराष्ट्र के अनगिनत किलों में से कोई भी किला बनावट की मजबूती और दमखम में देवगिरी किले से टक्कर नहीं ले सकता। यहाँ के तहखाने, चोर रास्ते, सुरंग, भूल-भूलैया, दुस्तर खाईयाँ, डरावने दर्रे, नाकाबन्दी, मोर्चेबन्दी और दुर्भेद्य परकोटे। सह्याद्रि के राजगढ़, पन्हालगढ़ तक देवगिरि से मात खाते थे।
तीन मजबूत परकोटोंवाली विशाल गढ़ी में तनकर खड़ा है यह प्रचंड पहाड़ी किला। गढ़ी के बाहर सभी तरफ गहरी खाईयाँ है, जो घड़ियाल की तरह मुँह खोले खड़ी हैं। देवगिरि पहाड़ी के चारों ओर भी गहरी खाई है। मराठों का राजा एवं राजधानी वल्लाढ्य थी। अजेय थी। देवगिरि को देवगढ़ या धारागिरि भी कहते थे। देवगिरि सुन्दर थी ही, समर्थ भी थी।
किले के इर्द-गिर्द दूर तक फैली थी वैभवसम्पन्न नगरी। राजनगरी के दरवाजे बुलन्द थे। दरवाजों के भीतर थे भव्य राजमहल, सुन्दर मंदिर, राजमार्ग, पाठशालाएँ, बाजार, नागरिकों के घर, अश्वशालाएँ गजशालाएँ, सुन्दर जलाशय और राजकाज के लिए बनाए गए बड़े-बड़े प्रासाद भी।
इसी देवगिरि पर भिल्लम सिंघणदेव, कृष्णदेव महादेव नाम के पराक्रमी राजाओं ने राज किया था। यहाँ की राजसभाओं में अनेक महापुरुषों, पंडितों तथा कलावन्तों ने मान-सम्मान पाया था। यहीं पर यादव राजाओं ने देवेन्द्र जैसे ऐश्वर्य का उपभोग किया था। अनगिनत सेनादलों के जयघोष एवं नगरों की विजयध्वनि यहाँ पर सालों-साल से गूँजती आ रही थी। देवगिरि ही क्यों, सह्यपर्वत के सभी गढ़ अजेय थे। सीता के हृदय में रावण का प्रवेश जितना असम्भव था, उतना ही असम्भव था दुश्मन का मराठों के गढ़-परकोटों में प्रवेश।
ईश्वर ने महाराष्ट्र को दो अलौकिक, अमूल्य निधियाँ दी थीं। अत्युच्च सह्याद्रि और अथाह समन्दर। जब तक मराठों ने सह्याद्रि की, समन्दर की आन-बान से रक्षा की, तब तक सह्याद्रि और समन्दर ने भी महाराष्ट्र की स्वतंत्रता की रक्षा की। सैनिकी सुरक्षा की दृष्टि से महाराष्ट्र निसर्गगत, बलशाली था। ऐसा बलशाली प्रदेश मुश्किल से ही दूसरा कोई होगा।
लेकिन एक बार… हवा को भी आहट न हुई और हवा से भी तेज गति से दुश्मन देवगिरि पहुँच गया। राजधानी बेखबर थी। राजा रामदेव राव बेफिक्र था। पर दुश्मन घात लगाए बैठा था। स्वराज्य हड़पना चाहता था। मौका पाते ही उत्तर सीमा से अलाउद्दीन खिलजी दनदनाता हुआ आया। पठाणी फौज देवगिरि के दरवाजे भड़भड़ाने लगी। भयंकर हमलों का दौर चला। इस समय रामदेव राव की प्रमुख सेना और सेनापति राजधानी में मौजूद नहीं थी।
वहशी पठाणों ने मराठों की लक्ष्मी पर डाका डाला। लूटपाट और भयानक अत्याचार का दिल दहलाने वाला सिलसिला शुरु हुआ। करुण चीत्कारों से आसमान थर्रा उठा। लहूलुहान देवगिरि कराहती रह गई। किले पर से रामदेव राव हमले का प्रतिकार कर रहा था। मगर वह कमजोर था। किले का बल खोखला होता जाता था। तभी रसद में अनाज की जगह बोरों में खाली नमक भरा हुआ मिला। क्या मालूम, यह भाग्य का खेल था, भेदियों की नीच करतूत या सरकारी असावधानी।
युवराज सिंघणदेव उर्फ शंकरदेव ने बाहरी तरफ से पठाणों पर धावा बोला। लेकिन कुछ ही देर में उसके पैर उखड़ गए। बचने की कोई उम्मीद न थी। रामदेव राव तब अल्लाउद्दीन की शरण में चला गया। बिना शर्त की शरण। अलाउद्दीन ने माँग की करोड़ों रुपयों की। रामदेव राव की राजकन्या की। माँग पूरी हो गई। करनी ही पड़ी। राजकन्या का नाम था ज्येष्ठापल्ली उर्फ जेठाई। खारिज के तौर पर रामदेव राव ने सालाना अनगिनत सम्पदा देना कुबूल फरमाया।
महज पखवाड़े भर की लड़ाई और मराठों का सूरमा राजा, पठाणों का मातहत हुआ। घायल देवगिरि कराह रहा था। पठाण उन्माद से ठहाके मार रहा था। मराठों की सम्पदा बिछड़ गई। राजकन्या चली गई। स्वाधीनता नष्ट हुई। इज्जत-आबरू लूट ली गई। यह काला दिन था शनीचर। दिनांक 6 फरवरी और 1294 का साल।
राजनीतिक एवं रणभूमि में सदा सजग रहना पड़ता है। पतिव्रता की तरह कदम नपे-तुले होने चाहिए। जरा सी भी गलती हुई और आगे की कई पीढ़ियों का बेड़ा ग़र्क़। मानव बल, शस्त्र बल, द्रव्य बल, बुद्धि बल तथा बलाढ्य सह्याद्रि। इतना सब होते हुए भी महाराष्ट्र को मुँह की खानी पड़ी। गुलामी सहनी पड़ीं। उत्तर भारत में लगातार पाँच सौ साल से पठाणों का, अन्य परकीयों का दमनचक्र जारी था। फिर भी महाराष्ट्र के यादव राजा सचेत न हुए। नतीजा सामने था। कितना भयानक। कितना दर्दनाक।
सिर्फ सतर्कता के अभाव में महाराष्ट्र पठाणी सुल्तानों का गुलाम हुआ। मराठों की भूमि, समुद्र, सह्याद्रि, धर्म और भाषा जंजीरों में जकड़ी गई। संस्कृति की प्रतिष्ठा नष्ट हुई। मखौल का सामान बन गई। मराठा घरों पर अत्याचार और अपमान के अंगारे बरसने लगे। वेदना अथाह होती गई।
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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।)
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