ऋचा लखेड़ा, वरिष्ठ लेखक, दिल्ली
भड़ाक्…………
एक कर्णभेदी धमाका हुआ। उस आवाज ने उसकी सुनने, सोचने, समझने की ताकत को थोड़ी देर के लिए कुंद कर दिया। कराहने की आवाजें भी उसे कुछ देर बाद सुनाई दीं। उसे खुद पीठ पर जोर का झटका लगा था। सडक के किनारे टकराने से उसका हेलमेट चटक गया था। धूल और कंकड़ की बारिश से चेहरा ढँक गया था। एक और ग्रेनेड के धमाके ने मानो आकाश को चीर दिया। सबके कान सुन्न हो गए। जी-मिचलाने लगा।
इस वक्त उसके दिमाग में एक ही ख्याल आया कि उसे जलकर नहीं मरना है, कभी नहीं। वह जानती थी कि आग से शरीरों का क्या हाल होता है। उसने जले हुए कई शव देखे थे। राख और कालिख के ढेर में बदले शव, बंदरों की तरह भिंचे हुए दाँतों वाले जबड़े, होंठों की जगह उधड़ा हुआ माँस, छिछले से चेहरे। आग में झुलसने पर कुछ भी ऐसा नहीं बचता, जिसे देखकर लगे कि अमुक व्यक्ति कभी जिंदा था भी या नहीं। अंबा अपने लिए ऐसी मौत नहीं चाहती थी। उसे इससे ज्यादा डर किसी चीज से नहीं लगता था। इस वक्त उसके चारों ओर आग धधक रही थी। जमीन भी जैसे आग उगल रही थी। इतनी गर्मी थी कि वे लोग बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोल पा रहे थे। पसीने की बूँदे लुढ़ककर होंठों पर आ रहीं थीं। मुँह में नमक और मिट्टी का स्वाद घुल रहा था। डीजल और गंधक की तेज गंध को अपने नथुनों से दूर करने के लिए अंबा इस वक्त कुछ भी करने को तैयार थी। सो, उसने होंठों और उसके आस-पास के धूल-धक्कड़ को जीभ निकालकर चाट ही लिया।
धीरे-धीरे उसे बड़ी मनहूसियत का एहसास होने लगा।
नकुल इस वक्त उसके साथ नहीं था। अंबा उसे देखने के लिए पेट के बल लेट गई। उसकी आँखें कुछ आगे पड़े एक शरीर पर टिकीं। वह बेतरतीब ढंग से लुढ़का हुआ था। उसका शरीर कई हिस्सों से मुड़-तुड़ गया था। वह घुटनों के बल बैठी और भ्रमित सी होकर अपनी बंदूक तलाशने लगी। उसने जोर से दाँत भींचे और आगे की ओर बढ़ गई। हालाँकि उसके पैरों में अभी जान नहीं थी। शरीर का निचला हिस्सा पूरा सुन्ना था। चलने में उसे कठिनाई हो रही थी। फिर भी उसने सड़क के बीच में पड़े शरीर की ओर कदम बढ़ा दिए। तभी उसके कान जैसे एकदम से खुल गए। फिर उसे हर तरफ से चिल्लाने और गोलियाँ चलने की आवाजें सुनाई देने लगी।
अंबा ने अपने शरीर को सँभालकर आगे बढ़ी। उसके हाथों और पैरों में संवेदना वापस आ रही थी। वह अभी एक-दो कदम ही बढ़ी थी कि पीछे से मजबूत हाथों ने उसे रोक लिया। वह जमीन पर गिर गई। चौकस फेमडोम ने उसे खींच लिया था। अंबा से करीब 20 मीटर पहले एक और बम फटा। लेकिन फेमडोम ने उसे बचा लिया। हालाँकि बाईं ओर फटे इस बम ने उसके पैर जख्मी कर दिए। वह उछलकर अपने बाएँ गाल के बल पर जमीन पर गिरा। धम्म की आवाज के साथ उसका शरीर जमीन से टकराया।
“नीचे झुक जाओ, लेट जाओ!” फेमडोम ने अपना पैर सँभालते हुए कहा।
“मैं नकुल के पास जा रही हूँ।”
“नहीं, अंबा।”
“मुझे उसके पास जाना है, वह वहाँ हैँ।” उसने धीरे से यूँ कहा जैसे किसी कमअक्ल को समझा रही हो।
“अब तुम उसकी मदद नहीं कर सकती।” फेमडोम ने आवाज में नरमी लाते हुए जवाब दिया।
“मैंने उसे करवट लेते देखा है। मैं उसके पास जा सकती हूँ।”
तब तक नाथन भी उसके पास आ गया। नाथन ने अंबा के हाथ थामने की कोशिश की तो उसने कोहनी से उसको झटक दिया। खुद को छुड़ाने की कोशिश की। जोर के झटके के बाद अंबा कुछ पलों के लिए उनकी पकड़ से आजाद भी हो गई। लेकिन नाथन ने बलपूर्वक उसे दबोच लिया। उसकी गर्दन पर हाथ का दबाव बढ़ाकर उसे जमीन पर पटक दिया।
अंबा के गाल नीचे सड़क के गरमा-गरम काले डामर से जा चिपके।
“मुझे जाने दो, नाथन मुझे जाने दो, मैं उसे ला सकती हूँ।”
“नकुल मर चुका है। वह मर चुका है अंबा।”
“नहीं…नहीं…!”
अंबा जोर से चीखी। पर वह वहाँ से हिल-डुल नहीं सकी। नाथन ने उसे पूरी ताकत से जमीन पर दबा रखा था।
अपने हेलमेट के भीतर से वह इस वक्त नकुल के बेजान शरीर को सिर्फ देख ही सकती थी। अलबत्ता, उसने कोशिश नहीं छोड़ी। वह लगातार सड़क के गर्म डामर को नाखून से खोदती रही। नकुल तक पहुँचने के लिए राह बनाने की भरपूर कोशिश करती रही। अचानक गोलीबारी भी बंद हो गई।
“मुझे जाने दो, मुझे जाना है।”
“मुझे जाने दो, चुप हो जाओ, सब बिलकुल चुप हो जाओ, जाने दो मुझे।”
“सुनो! देखो, दाहिनी ओर देखो।” नाथन धीरे से फुसफुसाया। उसके लहजे ने अंबा को रुकने पर मजबूर कर दिया। उसने सिर घुमाकर देखा। देखते ही पहचान लिया, वह क्या है। एक काला सा पत्थर, वहाँ के दूसरे कंक्रीट से एकदम अलग था। उस पर कहीं से रगड़ के निशान नहीं थे। जमीन में दबाए गए बारूद को उसके साथ जोड़ा गया था। वह समझ गई कि वे लोग इस वक्त बारूदी सुरंग के बीचों-बीच पहुँच चुके हैं। हालाँकि किसी ने उन्हें अब तक देखा नहीं था, यह अच्छी बात थी। वरना अब तक तो वे उड़ा दिए गए होते। वे लोग अब तक आकाश, जंगल, नदी को देखते हुए ही सावधानी बरत रहे थे। जमीन की तरफ तो उनका ध्यान ही नहीं था। पर अभी उन्हें इस खतरे से बचना था।
तभी गोलियों की तड़तड़ाहट और हथियारों की खनखनाहट फिर सुनाई देने लगी। अचूक निशाना साधने वाले इन हथियारों को अनदेखा नहीं किया जा सकता था। लगातार हो रही गोलाबारी संकेत दे रही थी कि लड़ाई अधिक भयंकर होने वाली है। शोरगुल भीषण मृत्युनाद में बदल रहा था। अंबा और उसके साथी हताश, निराश अपनी-अपनी जगहों पर जमीन से चिपके पड़े थे। तभी उन्हें मैदान में सैनिकों की अलग-अलग टुकड़ियाँ दिखाई दीं। रैड-हाउंड्स के वहशी जवानों से घिरे ग्रामीणों के धुँधले से समूह भी दिखे। ये जवान गहरे काले रंग के, बर्बर और क्रूर थे। उन्होंने लाल कमीज और बैल्ट पहन रखा था। अंबा और उसके साथियों को सामने मौत का मंजर दिख रहा था। उनके मन में गहरा आक्रोश था। अंबा उस मंजर को देख नहीं सकती थी। उसने अपना सिर जमीन पर टिका दिया, आँखें बंद कर लीं और निढाल होकर रह गई।
उधर, वे वहशी जवान एक स्वर में गाते हुए सुनाई दिए, “तुम्हारे साथ कत्लेआम के लिए – चुड़ैल!” और फिर उन्होंने बंधक गाँववालों के समूहों को बेदर्दी से गहरी घाटी धकेल दिया। अंबा की आँखों के सामने यह सब भी हो गया और वह कुछ नहीं कर पाई। यह आखिरी बार था, जब उसने गाँववालों को देखा। उसका दुख इस समय अकल्पनीय था। अभी-अभी नकुल भी उसे छोड़ गया था। कैसा विरोधाभास था? अभी ही उसने नकुल को पाया और उसे खो भी दिया! वह उसे याद कर रही थी और इसी वक्त उसे जाने भी दे रही थी, हमेशा के लिए।
#MayaviAmbaAurShaitan
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(नोट : यह श्रृंखला एनडीटीवी की पत्रकार और लेखक ऋचा लखेड़ा की ‘प्रभात प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्तक ‘मायावी अंबा और शैतान’ पर आधारित है। इस पुस्तक में ऋचा ने हिन्दुस्तान के कई अन्दरूनी इलाक़ों में आज भी व्याप्त कुरीति ‘डायन’ प्रथा को प्रभावी तरीक़े से उकेरा है। ऐसे सामाजिक मसलों से #अपनीडिजिटलडायरी का सरोकार है। इसीलिए प्रकाशक से पूर्व अनुमति लेकर #‘डायरी’ पर यह श्रृंखला चलाई जा रही है। पुस्तक पर पूरा कॉपीराइट लेखक और प्रकाशक का है। इसे किसी भी रूप में इस्तेमाल करना कानूनी कार्यवाही को बुलावा दे सकता है।)
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पुस्तक की पिछली 10 कड़ियाँ
71 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’: डर गुस्से की तरह नहीं होता, यह अलग-अलग चरणों में आता है!
70 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’: आखिरी अंजाम तक, क्या मतलब है तुम्हारा?
69 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’: जंगल में महज किसी की मौत से कहानी खत्म नहीं होती!
68 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’: मैं उसे ऐसे छोड़कर नहीं जा सकता, वह मुझसे प्यार करता था!
67 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : उस वासना को तुम प्यार कहते हो? मुझे भी जानवर बना दिया तुमने!
66 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : उस घिनौने रहस्य से परदा हटते ही उसकी आँखें फटी रह गईं
65 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : नकुल में बदलाव तब से आया, जब माँ के साथ दुष्कर्म हुआ
64 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह रो रहा था क्योंकि उसे पता था कि वह पाप कर रहा है!
63 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : पछतावा…, हमारे बच्चे में इसका अंश भी नहीं होना चाहिए
62 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह बहुत ताकतवर है… क्या ताकतवर है?… पछतावा!