ऋचा लखेड़ा, वरिष्ठ लेखक, दिल्ली
सामने से हो रही गोलीबारी का जवाब देने के लिए जैसे ही अंबा ने अपनी बंदूक का घोड़ा दबाया उसके कंधे में जोर का झटका लगा। वह पुराने दौर की बंदूक ऐसे ही चलती थी। यही नहीं, हर बार जब भी उसके मुहाने से गोली निकलती तो इतनी तेज रोशनी छूटती कि कोई भी गोली चलाने वाले के सही ठिकाने का अंदाज कर ले। जाहिर है, सामने से हमला करनेवाले उसकी स्थिति का अंदाज भी आसानी से लगा ही सकते थे। इसलिए उसके पास एक ही चारा था, लगातार गोली चलाते रहना। वही वह कर रही थी। लेकिन बंदूक के लगातार झटकों ने उसके कंधों का हाल बेहाल कर दिया था। ऐसा लगने लगा था, जैसे कंधे टूट ही गए हों। इसी बीच मैगजीन में गोलियाँ खत्म हो गईं। गोली भरने के लिए जैसे ही वह कुछ देर के लिए रुकी, सामने से इतनी तेज गोलियों की बौछार होने लगी कि उसकी आवाज से उसके कान सुन्न हो गए। लगा कि जैसे कान शरीर से अलग हो गए हों। हमलावर अपने ठिकानों से बाहर उठकर गोलियाँ बरसाने लगे थे। आग उगलती गोलियों के बीच वे लगातार उसी की तरफ बढ़ रहे थे। उसे लगा, जैसे हर तरफ मौत नाच रही हो। गोलियाँ इतनी पास से गुजर रही थीं कि गोलीबारी का जवाब देने के लिए वह अपना सिर तक नहीं उठा पा रही थी। अचानक तभी जैसे चमत्कार हुआ। सामने से गोलीबारी रुक गई। उसने मौका देखकर थोड़ा बाहर झाँका। उसे नकुल किसी सहारे की मदद से सुरक्षित तैरता हुआ दिखाई दिया।
इसी के साथ दूसरी तरफ से नदी किनारे मैदान में कोई एक छोटी सी आकृति तेजी से उनकी ओर बढ़ती दिखाई दी। उसका रुख सीधे उन्हीं की ओर था।
“वे रैड-हाउंड्स हैं! नौका से बाहर कूदो – बाहर! उन्होंने हमें देख लिया है!”
नकुल बिना रुके लगातार चिल्ला रहा था। उस गाड़ी की ओर इशारा कर रहा था, जो उनकी ओर बढ़ रही थी।
“अंबा नीचे कूदो! वे दूसरी तरफ से फिर हम पर गोलियाँ चलाने की तैयारी कर रहे हैं —”
“रुको, रुक जाओ! तुम चीख रहे हो, चिल्लाओ मत!” अंबा ने नकुल को चुप रहने के लिए कहा। वह नदी के बाईं ओर से उठ रहे धुएँ की तरफ भी हाथों से इशारा कर रहा था।
उधर, वह गाड़ी मैदान में ऊटपटाँग तरीके से दौड़ रही थी। वह कभी एक तरफ लहरा जाती, कभी दूसरी तरफ। कभी अंधाधुंध रफ्तार से भागती, कभी अपनी जगह ठिठक सी जाती। जैसे अपने ही किसी अदृश्य प्रतिद्वंद्वी से रस्साकशी कर रही हो। तभी उस गाड़ी से किसी ने अंबा और नकुल की ओर व्यग्रता से हाथ लहराया।
“गोली चलाओ, चलाओ —नहीं, नहीं— रुको!”
“वह हाथ हिला रहा है! क्या कोई दोस्त है? वह हाथ क्यों हिला रहा है?”
“अरे, मुझे क्या पता कौन है? इतनी दूर से कैसे समझूँ? पहचानना भी तो मुश्किल है—!”
“हो सकता है, हमें फँसाने के लिए जाल बिछाया गया हो। तुम गोली चलाओ, चलाओ गोली!”
“नहीं! वह नाथन है! मैं जानती हूँ उसे— रुको, तुम भी गोली मत चलाओ!”
“कौन नाथन? क्या तुम्हारे भरोसे का आदमी है वह?”
“रुको, रुको, उसके साथ रोध भी है!”
अब चौंकने की बारी नकुल की थी। गाड़ी अब तक नदी किनारे उनके पास आ चुकी थी। वे दोनों भी किनारे पहुँच चुके थे। उनसे कुछ फीट की दूरी पर आकर गाड़ी झटके से रुकी। अंबा और नकुल को किसी आमंत्रण की जरूरत नहीं पड़ी। वे दोनों फुर्ती से उसमें सवार हुए और अगले ही पल गाड़ी दूसरी दिशा में दौड़ने लगी।
गाड़ी में बैठा रोध बहुत तनाव में था। उसने अंबा को कुछ ही मिनटों में उन तमाम घटनाओं का ब्यौरा दे डाला, जो जेल से उसके भागने के बाद घटित हुई थीं। उसने बताया कि किस तरह रैड-हाउंड्स को जंगल में छिपे बागियों के बारे में पता चला। किस तरह उन वहशी सैनिकों ने बागियों को चुन-चुनकर मारा और इसके बाद अब वे तनु बाकर की तलाश में पूरे इलाके का चप्पा-चप्पा छान रहे हैं। इसी बीच अंबा ने बताया, “तनु बाकर हाल ही में मारा जा चुका है।”
खबरें और भी थीं। मगर वे अच्छी नहीं थीं। मसलन- रैड-हाउंड्स रात के अँधेरे में गाँव में घुसे थे। उन्होंने सभी गाँववालों को जबरन बंधक बना लिया था। किसी को नहीं छोड़ा। बुजुर्ग, बीमार, बच्चे, गर्भवती औरतें, सबको पकड़ लिया। यहाँ तक कि मरते हुए लोगों तक को वे उठा ले गए। यह सुनकर अंबा भौंचक्की रह गई। वह समझ नहीं सकी कि आखिर बीमार, बुजुर्ग और बच्चे भला मैडबुल के किस काम के? इतनी बड़ी संख्या में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को अगर वह जेल में बंद करता है, तो इसकी खबर फैलते देर नहीं लगेगी। उसकी नौकरी पर भी संकट आ जाएगा। उसे मृत्युदंड भी हो सकता है। वह इतना मूर्ख तो है नहीं, जो यह न जानता हो? या फिर उसे इस सबकी बिलकुल भी परवा नहीं है? आखिर वह इतना बड़ा खतरा कैसे मोल ले रहा है?
“मैडबुल के आदमी सबको ले गए, इसका क्या मतलब है? और इसके पीछे उसका मकसद क्या हो सकता है?” अपनी समझ को और स्पष्ट करने के लिए अंबा ने पूछा।
जवाब नाथन दे रहा था। मगर विवरण इतने भयावह थे कि बताते-बताते उसका शरीर शिथिल हो गया। सुनकर अंबा को भी भीतर तक कँपकँपी छूट गई। कलेजा मुँह को आ गया।
मैडबुल के घोर पाप की चर्चा करने में भी नाथन को मुश्किल हो रही थी। वह उसे बयान करने की स्थिति में नहीं था। इधर, अंबा लगातार सोच रही थी कि आखिर मैडबुल करना क्या चाहता है? कौन सा बदला लेना चाहता है? वह किस हद तक जाने को तैयार है? वह भयावह आशंकाओं से घिरती जा रही थी। उसके पूरे शरीर में गुस्से की लहर दौड़ने लगी। गुस्से में वह लगातार पहलू बदलने लगी।
“उन लोगों को वह बैकाल जेल नहीं ले गया, तो कहाँ ले गया?”
“उन्हें जेल ले जाने का उसका कभी इरादा ही नहीं था। उसकी योजना तो हमेशा से ही इस कहानी को आखिरी अंजाम तक पहुँचाने की थी…..?”
इतना कहकर उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।
“आखिरी अंजाम तक? क्या मतलब है तुम्हारा? आखिरी अंजाम का क्या मतलब?” यह पूछते हुए अंबा के मन में तमाम आशंकाएँ हावी होती जा रही थीं।
#MayaviAmbaAurShaitan
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(नोट : यह श्रृंखला एनडीटीवी की पत्रकार और लेखक ऋचा लखेड़ा की ‘प्रभात प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्तक ‘मायावी अंबा और शैतान’ पर आधारित है। इस पुस्तक में ऋचा ने हिन्दुस्तान के कई अन्दरूनी इलाक़ों में आज भी व्याप्त कुरीति ‘डायन’ प्रथा को प्रभावी तरीक़े से उकेरा है। ऐसे सामाजिक मसलों से #अपनीडिजिटलडायरी का सरोकार है। इसीलिए प्रकाशक से पूर्व अनुमति लेकर #‘डायरी’ पर यह श्रृंखला चलाई जा रही है। पुस्तक पर पूरा कॉपीराइट लेखक और प्रकाशक का है। इसे किसी भी रूप में इस्तेमाल करना कानूनी कार्यवाही को बुलावा दे सकता है।)
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पुस्तक की पिछली 10 कड़ियाँ
69 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’: जंगल में महज किसी की मौत से कहानी खत्म नहीं होती!
68 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’: मैं उसे ऐसे छोड़कर नहीं जा सकता, वह मुझसे प्यार करता था!
67 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : उस वासना को तुम प्यार कहते हो? मुझे भी जानवर बना दिया तुमने!
66 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : उस घिनौने रहस्य से परदा हटते ही उसकी आँखें फटी रह गईं
65 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : नकुल में बदलाव तब से आया, जब माँ के साथ दुष्कर्म हुआ
64 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह रो रहा था क्योंकि उसे पता था कि वह पाप कर रहा है!
63 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : पछतावा…, हमारे बच्चे में इसका अंश भी नहीं होना चाहिए
62 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह बहुत ताकतवर है… क्या ताकतवर है?… पछतावा!
61 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : रैड-हाउंड्स खून के प्यासे दरिंदे हैं!
60 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : अब जो भी होगा, बहुत भयावना होगा