जिसने अपने लक्ष्य समझ लिया, उसने जीवन को समझ लिया, पर उस लक्ष्य को समझें कैसे?

ज़ीनत ज़ैदी, शाहदरा दिल्ली से

जब भी किसी दुविधा में हों या मन खराब हो, तो हमें ध्यान करने की सलाह दी जाती है। ये चलन नया नहीं है, बल्कि सालो पहले ऋषि-मुनियों द्वारा की जाने वाली वह क्रिया है, जो बेहद असरदार हुआ करती है। इसे करने में वह अपनी उमर भर गुजर देते थे। आज भी दुनिया की तमाम परेशानियों का यही एक सक्षम इलाज है।

आज हम सभी अपने जीवन के दुखों को गले लगाए फिरते हैं। रोज़-रोज़ के तमाम दुखों के साथ रहते हैं। शायद हमें इनकी आदत सी हो गई है। इस सबके बीच हम उस राह को भूल से जाते हैं, जो हमें इन परेशानियों से दूर ले जा सकती है। वह राह है ध्यान (meditation), जिसने ज़्यादातर लोगों को उनकी मंज़िल तक पहुँचाया है।

ध्यान वह क्रिया है, जिसे करने में 80% लोगों को बोरियत होती है। लेकिन क्यों? क्योंकि लोग इसे करने का सही तरीक़ा जानते ही नहीं। लिहाज़ा, पहले ये समझते हैं कि ध्यान का हमारी ज़िन्दगी में क्या महत्त्व है। जैसा कि हम सब दिनभर के काम और तनाव से परेशान होकर अक्सर ओवर-थिंकिंग करने लगते हैं या चिड़चिड़े हो जाते हैं। इस समस्या से बचने के लिए हमें अपने विचार को पकड़कर उन्हें क़ाबू में करना होता है। मगर यह होगा कैसे? जब हम दिनभर की परेशानियाँ भूलकर कुछ देर आँखें मूँद कर बैठेंगे। यानी ध्यान करेंगे।

सो, अब सवाल दोबारा वही कि ध्यान कैसे करें कि हमें आत्मानन्द मिले? ये शब्द ‘ध्यान’ अपने आप ही हमें समझाता है कि हमें करना क्या है। यानी हमें अपने विचारों को समेटकर अपने अन्दर लाना है। ध्यान देना है, उन आवाज़ों पर जो हमारे अन्दर से उत्पन्न हो रही हैं। जैसे हमारी साँसों की आवाज़, दिल की धड़कन, अन्य ऐसी ही आवाज़ें।

फिर इस क्रिया को करना और भी आसान हो जाएगा, जब हम सुनने की कोशिश करेंगे। धीरे-धीरे हम पाएँगे कि पहले हम सिर्फ़ ध्यान लगाकर बैठते थे। लेकिन कुछ समय बाद वह भीतर की आवाज़ें हमें खुद आकर्षित करने लगेंगी। और धीरे-धीरे हमें ध्यान करने में मज़ा आने लगेगा, क्योंकि हम सुनना शुरू कर देंगे।

दरअसल, हर कोई चाहता है कि वह अपने दुखों को बोलकर ज़ाहिर कर दे और अपने मन को हल्का कर ले। लेकिन उसके पास कोई नहीं, जो उसकी इन बातों को सुने और समझे। क्या बेहतर यह नहीं होगा कि हम खुद सुने अपने अन्दर की आवाजों को, जो हमारे अन्दर तब से हैं, जबसे हम जन्मे हैं और तब तक रहेंगी, जब तक हम ज़िन्दा हैं।

लिहाज़ा अब अगर एक प्रचलित कहावत को यूँ कहें कि हर ‘सफल व्यक्ति के पीछे एक महिला का नहीं, बल्कि ध्यान का हाथ होता है’ तो ज़्यादा ग़लत नहीं होगा। क्योंकि यही ध्यान की क्रिया है, जो धीरे-धीरे हमें संयत करती है। सामने हमारे लक्ष्यों को स्पष्ट करती है। हमारा ध्यान उन लक्ष्यों पर केन्द्रित करती है। और इस तरह हमारी क़ामयाबी का रास्ता खोलती है क्योंकि जिसने अपने लक्ष्यों को समझ लिया, वही क़ामयाब भी हुआ है।

सो, आइए दिन का कुछ वक्त निकालकर सुनते हैं, अपने अन्दर की आवाज़ों को, जो अक्सर हमें सुनाई नहीं देती।समझते हैं, अपने जीवन के उद्देश्य को। अपनी दिनचर्या में से कुछ थोड़ा सा समय ध्यान को देकर।

जय हिन्द
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(ज़ीनत #अपनीडिजिटलडायरी के सजग पाठक और नियमित लेखकों में से एक हैं। दिल्ली के आरपीवीवी, सूरजमलविहार स्कूल में 10वीं कक्षा में पढ़ती हैं। लेकिन इतनी कम उम्र में भी अपने लेखों के जरिए गम्भीर मसले उठाती हैं। उन्होंने यह आर्टिकल सीधे #अपनीडिजिटलडायरी के ‘अपनी डायरी लिखिए’ सेक्शन पर पोस्ट किया है।)
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