चन्द पैसों के अपनों का खून… क्या ये शर्म से डूब मरने की बात नहीं है?

ज़ीनत ज़ैदी, दिल्ली

ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के लिए यक़ीनन पैसा ज़रूरी है, लेकिन सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसा ही ज़रूरी नहीं है। इंसान को जीने के लिए समाज, रिश्ते और परिवार की भी ज़रूरत हैl  लेकिन आज के दौर में हम आसानी से देख सकते हैं लोग किस तरह चन्द पेसो के लिए अपनों के ख़िलाफ़ हो जाते है। उनके खून के प्यासे तक हो जाते हैं।

पैसों, ज़मीन-जायदाद के लिए भाई का भाई को मारना, रिश्तों में दरार आदि ख़बरें हमें रोज़ अख़बारों में मिल जाती हैं। क्या हम इतने खोख़ले हो गए हैं कि पैसों के आगे हमें इंसान की जान सस्ती लगती है? महज़ ज़मीन के एक टुकड़े के लिए लोग सगे भाई तक की जान के दुश्मन बन जाते हैं। क्या ये शर्म से डूब मरने की बात नहीं है? 

ऐसी ही एक घटना हुई शाहदरा के फर्श बाज़ार में। वहाँ एक व्यक्ति ने दीवाली की पूजा के दौरान अपने ही मामा की गोली मारकर हत्या कर दी। हादसे में एक 16 साल के लड़के की भी जान चली गई। हत्या का कारण भांजे पर मामा का उधार बताया जा रहा है। उधार की रकम को मामा बार-बार वापस माँग रहे थे।

याद रखिए, पैसा हमें ख़ुशी तो दे सकता है लेकिन एक हद में। क्योंकि अगर ऐसा न होता तो बड़े-बड़े उद्योगपति, अभिनेता, आदि न डिप्रेशन का शिकार होते और न आत्महत्या करते। हमारे यहाँ एक कहावत मशहूर है, “माँ-बाप का काम बच्चे की सही परवरिश करना और उसको सफल इंसान बनाना होता है। उन पर ये फ़र्ज़ बिल्कुल नहीं है कि वे औलाद के लिए आलीशान घर, गाड़ी और बैंक बैलेंस छोड़कर जाएँ।” 

हर जीव अपने बच्चों को सिर्फ तब तक नाज़ों से पालता है, जब तक वह अपने पैरो पर खड़ा होना न सीख जाए। अपना खाना ख़ुद न ढूँढने लगे। लेकिन इंसान ऐसा जीव है, जिसके पालन-पोषण की अवधि 20-25 साल तक होती है। वह इतने सालों तक माँ-बाप के कन्धों के सहारे रहता है। और अफ़सोस कि इसके बावज़ूद हमारे माता-पिता हमें एक शब्द बोल दे, तो हम उन्हें उल्टा ज़वाब देने से पीछे नहीं हटते।

हमें समझना चाहिए कि हमारे रिश्ते और हमारा परिवार ही हमारी असली पूँजी है। इसे सँभाल कर रखने की ज़रूरत हैl वरना हमारा इंसान होना किसी काम का नहीं। एक अच्छे समाज के लिए रिश्ते, एहसास और संवेदनशीलता ज़रूरी है। इसीलिए पैसों को अहम समझिए लेकिन इतना नहीं कि उसके अलावा हमें कुछ और दिखना बन्द हो जाए। 

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(ज़ीनत #अपनीडिजिटलडायरी के सजग पाठक और नियमित लेखकों में से हैं। दिल्ली के आरपीवीवी, सूरजमलविहार स्कूल में 12वीं कक्षा में पढ़ती हैं। लेकिन इतनी कम उम्र में भी अपने लेखों के जरिए गम्भीर मसले उठाती हैं।अच्छी कविताएँ भी लिखती है। वे अपनी रचनाएँ सीधे #अपनीडिजिटलडायरी के ‘अपनी डायरी लिखिए’ सेक्शन या वॉट्स एप के जरिए भेजती हैं।)
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27 – भारत का 78वाँ स्वतंत्रता दिवस : क्या महिलाओं के लिए देश वाक़ई आज़ाद है?
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22 – कविता : ख़ुद के अंदर कहीं न कहीं, तुम अब भी मौजूद हो 
21 – धूम्रपान निषेध दिवस : अपने लिए खुशी या अपनों के लिए आँसू, फ़ैसला हमारा!
20 – बच्चों से उम्मीदें लगाने में बुराई नहीं, मगर उन पर अपेक्षाएँ थोपना ग़लत है
19- जानवरों के भी हुक़ूक हैं, उनका ख़्याल रखिए
18 – अपने मुल्क के तौर-तरीक़ों और पहनावे से लगाव रखना भी देशभक्ति है

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