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न बँगला-गाड़ी चाहिए, न पूरा वेतन! ‘प्रेरक मिसाल’ है न्यायाधीश अक्षय द्विवेदी का संकल्प!!

टीम डायरी

मध्य प्रदेश के एक न्यायाधीश इन दिनों देश के मीडिया-सोशल मीडिया की सुर्खियों में छाए हुए हैं। क्यों? क्योंकि उन्होंने न्यायाधीश जैसे बड़े ‘रसूखदार’ पद पर रहते हुए भी सरकारी बँगला-गाड़ी और अन्य तमाम सुविधाएँ छोड़ दी हैं। सिर्फ सुविधाएँ ही नहीं, उन्होंने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को बाकायदा एक पत्र लिखकर अपनी तनख्वाह भी आधी कर देने के लिए कहा है, ताकि वह सादा जीवन जी सकें। इनका नाम है, न्यायाधीश अक्षय कुमार द्विवेदी, जो अभी मध्य प्रदेश के ही छिंदवाड़ा जिले की एक अदालत में पदस्थ हैं। 

न्यायाधीश द्विवेदी को उनके पद के अनुरूप सरकारी बँगला आवंटित है। आधिकारिक कामकाज के लिए सरकारी गाड़ी भी मिली हुई है। इसके साथ ही पद के अनुरूप अन्य सुविधाएँ भी मिली हैं। लेकिन बताया जाता है कि वह इन सबको छोड़कर एक छोटे-से कमरे में रहते हैं। अपने भोजन भी खुद ही बनाते हैं और अदालत तक पैदल आते-जाते हैं। उन्होंने अब तक विवाह नहीं किया है और आगे भी इसका कोई इरादा नहीं है। ऐसे में, उनके खर्चे चूँकि बेहद सीमित हैं, इसलिए जितनी तनख्वाह उन्हें मिलती है, वह भी उन्हें ज्यादा लगती है। इसी कारण से उन्होंने उच्च न्यायालय को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि उनका वेतन आधा कर दिया जाए। 

पत्र में उन्होंने यह भी संकल्प जताया है कि वह प्रदेश के किसी भी न्यायालय में काम करने के लिए हमेशा तैयार हैं क्योंकि अपने पद पर रहते हुए वह सिर्फ जनसामान्य की मदद करना चाहते हैं। लोगों को अदालत की जटिल और थकाऊ कानूनी प्रक्रिया से राहत दिलाना चाहते हैं। उन्हें जानने वाले बताते हैं कि उनका ‘संकल्प’ सिर्फ पत्र या कागज पर लिखे अक्षरों तक ही सीमित नहीं है। अदालत में विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान वह सुनिश्चित करते हैं कि खास तौर पर, जमीन-जायदाद से जुड़े मामलों का निपटारा जल्दी से जल्दी हो। अदालती कार्यवाही की वजह से इन मामलों में लेट-लतीफी न हो, क्योंकि ऐसे मामले अदालतों में सालों फँसे रहते हैं। 

बताया जाता है कि न्यायाधीश अक्षय कुमार का यह फैसला उनके निजी अनुभव से प्रेरित है। बचपन में उन्होंने अपनी माँ को निजी जमीन-जायदाद से जुड़े मामले के निपटारे के लिए सालों-साल तक अदालतों के चक्कर काटते हुए देखा है। उसकी वजह से उन्हें मानसिक और आर्थिक परेशानियों से जूझते हुए भी देखा है। इसीलिए उन्होंने छोटी उम्र में ही तय कर लिया था कि वह बड़े होकर न्यायाधीश बनेंगे। साथ ही अपने काम से यह सुनिश्चित करेंगे कि जो तकलीफ अदालती प्रक्रिया के कारण उनकी माँ को हुई, वह कम से कम उनकी पहुँच के दायरे में तो किसी और को न हो। आज वह अपने उसी संकल्प को मूर्त रूप से देते हुए दिखाई दे रहे हैं। 

अब सोचिए, आज जब लोग छोटी-सी सरकारी नौकरी को भी ‘विशेषाधिकार’ मान लेते हैं और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर तक जाकर सरकार के खर्च पर सुविधाओं का आनंद लेने से नहीं चूकते, वहाँ मिसाल पेश कर रहे हैं अक्षय। एक ‘प्रेरक मिसाल’ क्योंकि वह उन चुनिन्दा लोगों में शुमार हैं, जो सरकारी नौकरी को विशेषाधिकार नहीं, जिम्मेदारी मानते हैं। जिम्मेदारी सेवा की, जिम्मेदारी उत्तरदायित्त्व की। वह इन शब्दों को भी पूरी तरह सही साबित कर रहे हैं कि “न्याय सिर्फ कागज पर लिखे फैसलों से ही नहीं किया जाता, बल्कि सार्वजनिक जीवन (न्याय-व्यवस्था से जुड़े लोगों के) में मूल्यों के पालन-निर्वहन से भी वह परिलक्षित होता है।”  

काश! सरकारी-तंत्र में बैठे अन्य लोग भी न्यायाधीश अक्षय कुमार द्विवेदी के जीवन से जुड़ी इस ‘प्रेरक मिसाल’ से कुछ सीख सकें, तो कितना अच्छा हो। 

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Neelesh Dwivedi

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