समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल, मध्य प्रदेश
जब हमारा नजरिया संकीर्ण होता है, तो हम सामने हाजिर मजमून को ही बेजा अहमियत दे देते हैं। यह भूल स्वाभाविक है। हाल के दिनों में भारत के अखबारों में दिल्ली की प्रदूषित हवा की खबरों की मिसाल लें। ऐसा लगता है मानो दिल्ली में आसमान फट रहा हो। लेकिन वहीं जब हम पड़ोसी देशों की खबरें देखते हैं, तो यही बात पाकिस्तान में लाहौर और बांग्लादेश में ढाका के एक्यूआई (वायु गुणवत्ता सूचकांक) को लेकर पढ़ने को मिलती है।
भारत की बात करें तो अब दीवाली बीत चुकी है और पराली भी खप चुकी है। ऐसे में अब जिम्मेदार ठहराए तो किसे, यह अदालतों के सामने बड़ी समस्या है। लेकिन बावजूद इस सबके, हमारे नीति निर्माता औद्योगिकीकरण और वाहनों से हो रहे प्रदूषण की ओर रुख नहीं करेंगे, यह निश्चित है। औद्योगिक प्रदूषण बरसों से कमरे में घूमते किसी शिकारी की तरह है, जिसकी उपस्थिति कोई मानना नहीं चाहता।
औद्योगिकीकरण से पैदा हो रही समस्याएँ कोई आज की नहीं, और वे किसी से छिपी भी नहीं है। समस्या दुनिया के श्रेष्ठि सत्ता वर्ग की है, जो अपनी महत्वकांक्षा और लोलुपता से अंधत्व को प्राप्त हो चुका है। इनमें सिर्फ उद्योगपति, राजनेता, अफसर ही शुमार नहीं हैं। हमारे वैज्ञानिक, विचारक, शिक्षक, न्यायाधीश और मौलवी-पंडित-पादरी और समाजसेवी सभी को अंधत्व ने अपनी आगोश में समेट लिया है। इन सभी ने इस पर्यावरण विनाश आधारित आधुनिक विकास के मॉडल को स्वीकार कर लिया हे।
और जिस अनुपात में इसे अपरिहार्य रूप में स्वीकार किया जा रहा है, उसी अनुपात में अंधायुग फैल रहा है। तमाम प्राकृतिक आपदाओं और पाप के समकक्ष विकास की नीतियों को अपनाते हुए राजनेता पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ विकास के कसीदे पढ़ते हैं। अदालतें नदियों को एक जीवंत सत्ता, बताने जैसे प्रभावोत्पादक सिद्धान्त की तकरीरें कर तालियाँ बटोरती हैं। जबकि इस अंधे और लोलुप भस्मासुरी विकास के आकर्षण से कोई बच नहीं पा रहा है।
पाश्चात्य जगत में पर्यावरण के संरक्षण को लेकर वहाँ कोई वास्तविक विधायी पहल या सोच नहीं उठी। इसकी मुख्य वजह मूल अब्राहिमी परम्परा का वह उत्परिवर्तन है, जहाँ सारे मानवीय प्रयास और तरकीबें कायनात के शोषण में निवेशित हो जाती है। यही कारण है कि और ईसाइयत में उपनिवेशीकरण और औद्योगिकीकरण की सोच और ताकत के साथ क्रियान्वयन सम्भव हो पाया।
इसी उपनिवेशवाद से पनपे रिनेंसा और उसके बाद की आधुनिकता ने प्राकृतिक श्रम आधारित जीवनचर्या का अवमूल्यन कर कृत्रिम, आरामतलबी और एक भोगवादी जीवनशैली का प्रचार किया। इससे ऊर्जा, खनिज पदार्थों और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में अंधाधुंध इजाफा हुआ। प्रकृति के शोषण से मानव जाति को अप्रत्याशित रूप से अधिक और बेहतर पोषण, चिकित्सा सुविधाएँ आदि मिली। इससे हमारी जनसंख्या में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई। इसके चलते प्रकृति का नाजुक संतुलन अब टूटने की कगार पर है।
हवा, पानी और जमीन के जहरीले होने से जीव-जंतु-पादप का अभूतपूर्व विनाश ही नही हुआ है, इससे उपजे पर्यावरणीय असंतुलन से मानव जीवन पर भी खतरे में बादल मंडराने लगे हैं। विकास की यह इबारत प्रकृति के जीवंत तंत्र को संसाधन बनाकर दोहन करने की है। इस कथानक में घास, भूसा और अनाज को इथनॉल में बदलने को, मीथेन गैस कम करने के लिए लिए मवेशियों की संख्या कम करने को पर्यावरण रक्षा का कदम बताया जाता है। जबकि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले कृत्रिम खाद, जहरीले रसायन, और मशीनी कृषि को वैज्ञानिक बताया जाता है।
आज सरकार संधारणीय खनन के लिए नियम बनाती हैं। तथाकथित वैज्ञानिक-विशेषज्ञ और जज इन्हें स्वीकृत करते हैं। मसलन नर्मदा, चंबल से कितनी लाख घनफुट रेत निकाली जानी चाहिए या कितने फुट ऊँचाई तक अरावली पर्वतमाला का खनन पर्यावरण के लिहाज से हानिरहित है, सब नियम-कानून के तहत जायज बनाया जाता है। आज के शक्तिशाली लोग कानून नहीं तोड़ते, वे कानून अपने हिसाब से बनवाकर काम कर लेते हैं। यह सब मान्य होने का कारण यह है कि वर्तमान मानवकेन्द्रित और उपनिवेशी सोच में नैतिकता के मानदण्ड को गिरा दिया है।
यद्यपि अब यह पश्चिमी व्यवस्था गिरने को है और बेशक चीन अगली वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है, किन्तु चीनी सभ्यता का दर्शन एक दीर्घकालीन सम्यक विश्व व्यवस्था देने में सफल होने की संभावना न्यून ही लगती है। कार्य-कौशल्य से परिपूर्ण, अनुशासित और रणनीतिक सोच रखने वाली चीन की संस्कृति भी जिस भोगवाद पर इति कर लेती है उससे सार्वलौकिक सार्वभौमिक हित आधारित-तंत्र की निर्मित्ति संभव नहीं।
ऐसे में भारतीय संस्कृति ही ऐसी सम्यक विश्वव्यवस्था काे आधार देने के लिए समर्थ है। लेकिन भारत में समस्या है कि हम भारतीयों के भीतर यह विश्वास पक्का घर कर गया है कि औपनिवेशिक दबंगाई ही परम सत्य है, जो दुनिया के कम से कम पिछले हजार साल के इतिहास में अनुभवसिद्ध है। हम भारतीयों का अपने बौद्धिक ज्ञानतंत्र में कोई निवेश या विश्वास नहीं है। मानव जिस आसन्न विभिषिका की ओर अग्रसर है, विनाश अवश्यम्भावी है। लेकिन इस तबाही में जो कुछ जितना भी बचाव हो किया जा सकता है उसके लिए भारतीय दर्शन काे स्वीकारना अपरिहार्य है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि केवल भारतीय दर्शन ही समस्त जीव-जंतु-पादप के चेतना के स्तर पर एक, नित्य, जुड़ा हुआ और दैविक देखता है। केवल प्रामाणिक भारतीय दर्शन ही भोगवाद और भौतिकवाद को एक नैतिक बंधन देता है। मानवकेन्द्रित दृष्टि के प्राधान्य से उपजी गड़बड़ी को रोकता है। क्योंकि हम जानते हैं कि जहाँ तक भोगवादी जीवन शैली से उपजी माँग बनेगी, लाख कानून-नियमों के बावजूद वह अपनी पूर्ति ढूँढ ही लेगी। बहस-मुबाहिसा, अदालती आदेश और नियमाें के बावजूद प्रदूषण और पर्यावरण का विनाश होता रहेगा।
इसलिए हमें मूल भारतीय दर्शन पर जाना ही होगा जो आधुनिक जीवन शैली के नाम पर जल, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग के तर्कों को न केवल प्रश्नाकिंत करता है, उसके विकल्प भी देता है। जरूरत उन पारम्परिक भारतीय जीवन मूल्य स्थापित करने की है, जो समग्रता में चेतन अस्तित्व का सम्मान करते हैं और जिन पर आधारित नीति ही ऋत् है, सर्वोत्तम है।
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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।)
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