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ये जनता के धन पर पलने वाले घृणित परजीवी..

विजय मनोहर तिवारी की पुस्तक, ‘भोपाल गैस त्रासदी: आधी रात का सच’ से, 18/1/2022

अदालत ने फैसला सरकाकर चिराग घिस दिया था। जिन्न बाहर आ चुका था। संभवत: देश के इतिहास में यह अकेला मामला है, जिसका हर तथ्य ढाई दशक पुराना था। नया कुछ नहीं था। सिवाय एक फैसले के जो अपने कानूनी दायरे में पहले से तय था। लेकिन इस फैसले के बाद घटनाएं ऐसी जुड़ी कि पुरानी बोतलों में से एक से बढ़कर एक जिन्न बाहर आए। कई चेहरे बेनकाब हुए। कई सच्चाइयों से पहली बार परदा उठा। अनगिनत भूले-बिसरे सच एक श्रृंखला में सामने आ गए। 

भोपाल की अदालत से फैसला तो यूनियन कार्बाइड के चंद कर्ता धर्ताओं के खिलाफ आया, लेकिन इस पूरे हादसे ने यह भी साबित किया कि कागजों पर दर्ज कार्बाइड के चंद अफसर आरोपियों से बड़े गुनहगार तो दूसरे हैं, जिन्होंने हादसे के बाद अपने-अपने हितों की खातिर हजारों बेगुनाहों की मौत और उनसे ज्यादा दूसरी जिंदा लाशों की तरफ से आंखे मूंद लीं। दिल्ली से भोपाल तक इस गंदे खेल में तब के कलेक्टर मोतीसिंह और एसपी स्वराज पुरी सबसे निचली कड़ी थे। वे अपने आकाओं के हुक्म पर वह कर रहे थे, जो एक खुद्दार और ईमानदार अफसर को कभी नहीं करना चाहिए। अब यह साफ था कि इन्होंने बतौर अफसर अपनी बेहतरी को ही विधिसम्मत माना था और वही किया जो अपनी सेहत के लिए उन्हें ठीक लगा। ये दोनों आईएएस और आईपीएस अफसर अपने से बड़े ओहदों पर बैठे सियासत के खिलाड़ियों की कठपुतलियां बने।

मुख्यमंत्री के नाते अर्जुनसिंह और प्रधानमंत्री के नाते राजीव गांधी की भूमिका क्या कम थी? और जब मामला अदालत में गया तो एक से बढ़कर एक दिग्गज सामने आए जिन्होंने यूनियन कार्बाइड की रिस चुकी गैस पर अपने मतलब की रोटियां सेंक लीं। अपने फैसलों से इन लोगों ने दरअसल यह साबित किया कि कानून के साथ ये भी अंधे ही हैं। ये सब लोग या तो देश के आला दरजे के इम्तहानों में कामयाब होकर इन ओहदों तक पहुंचे थे या सीधे अवाम की ताकत हासिल करके सत्ता में आए थे। सब के सब भोपाल के गुनहगारों की कतार में एक के पीछे एक जा खड़े हुए। यूनियन कार्बाइड के मालिक ऑपरेटरों से ज्यादा खतरनाक क्योंकि एक एंडरसन और एक क्वात्रोच्चि तो देश के बाहर के हैं, ये सब यहीं हैं, अपनी अमरबेल को और बढ़ाते हुए लगातार सक्रिय आप एक एंडरसन, क्वात्रोच्चि या दाऊद इब्राहिम को तो लाकर फांसी पर टांग सकते हैं, लेकिन इनसे निजात पाने की कोई सूरत फिलहाल कानून की किसी धारा में नहीं दिखती। ये कानून को बनाने वाले हैं। अपने हिसाब से उसे मोड़ने-जोड़ने और तोड़ने वाले हैं। किसे कब क्यों कहा फंसाना है, यह सब भी इन्हीं के हाथ में है। आजादी के बाद अभागा भारत इनके सामूहिक दुष्चक्र में फंसा है। जनता के धन पर पलने वाले घृणित परजीवी। 

मैं मानता हूं कि शिखर पर राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व के खून में भ्रष्टाचार, धोखेबाजी, साजिशों और बेईमानी के ऐतिहासिक कारण जो उनके डीएनए में ही समाए हुए हैं। कोई चमत्कार ही इस विकृति ठीक कर सकता है। अंग्रेजों ने मुगलों से सत्ता छीनी थी और उन भारतीयों के हाथों में थमा दी, जो 40 पीढ़ियों तक बेड़ियों में वंश चलाते आए। पांच सौ साल पहले बाहर से आए मुगलों के झुंड सिंहासन लूटने के लिए लोदियों पर टूट पड़े। इसी सिंहासन के लिए लोदियों ने तुगलकों का खून बहाया। तुगलक खिलजियों को मौत के घाट उतारकर सुलतान बने थे। खिलजियों ने गुलाम वंश के सुलतानों को कब्रों में सुलाकर दिल्ली पर कब्जा किया था। उनसे पहले एक खरीदे हुए गुलाम कुतुबद्दीन ऐबक को मुहम्मद गौरी ने 1193 हिंदुस्तान बख्शीश में दे दिया था। इस तरह यह मुल्क माले गनीमत की शक्ल में बाहरी हमलावर लुटेरों के एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता रहा। बीच-बीच में तैमूरलंग, नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली की लूटमार और कत्लेआम के रोंगटे खड़े कर देने वाले नजारे भी इसी बदकिस्मत मुल्क ने देखे। अंग्रेजों के अलावा फ्रेंच और पुर्तगालियों ने भी अपना हिस्सा हड़पा। एक हजार साल का इतिहास सत्ता के शिखरों पर ताकतवरों की छीना-झपटी और लूटमार का है। 15 अगस्त 1947 को परंपरागत लूट के इस मालामाल मुल्क का बंटवारा दो शानदार शख्सियतों के हाथों में हो गया-पंडित जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना।

दोनों ने इसे अपनी-अपनी आवाम से आजादी कहा। सदियों से सोई पब्लिक भी यह अलफाज सुनकर खुश हुई। जल्दी ही जनता-जनार्दन की खुशी जाती रही, क्योंकि बाद में राजनीतिक दलों के नुमाइंदों और सर्वोच्च प्रशासनिक अफसरों से लेकर निचले स्तर के कर्मचारियों ने हजारों बार यह साबित किया कि उनके लिए इस देश की इज्जत-आबरू के कोई मायने नहीं हैं। पद पर आने का मतलब है अपने हित साधो। बड़े पद का मतलब तगड़ा झपट्टा। हर हाल में सिर्फ उनके उल्लू सीधे होने चाहिए। इस पार्टी में हों या उस पार्टी में। इस दफ्तर में हों या उस दफ्तर में दिल्ली में हों या राज्यों में। राजधानी में हों या तहसील में अपनी कुर्सी बचाने और जेबें भरने के लिए वे कुछ भी दांव पर लगा सकते हैं। अपने देशी-विदेशी पूर्वज हुक्मरानों से उन्हें सत्ता के यही संस्कार विरासत में मिले हैं। गैस हादसा इसका निकृष्टतम ताजा उदाहरण है, जो हमारी नाक के नीचे और आंखों के सामने घटा।
(जारी….)
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(नोट : विजय मनोहर तिवारी जी, मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। उन्हें हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने 2020 का शरद जोशी सम्मान भी दिया है। उनकी पूर्व-अनुमति और पुस्तक के प्रकाशक ‘बेंतेन बुक्स’ के सान्निध्य अग्रवाल की सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर यह विशेष श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके पीछे डायरी की अभिरुचि सिर्फ अपने सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक सरोकार तक सीमित है। इस श्रृंखला में पुस्तक की सामग्री अक्षरश: नहीं, बल्कि संपादित अंश के रूप में प्रकाशित की जा रही है। इसका कॉपीराइट पूरी तरह लेखक विजय मनोहर जी और बेंतेन बुक्स के पास सुरक्षित है। उनकी पूर्व अनुमति के बिना सामग्री का किसी भी रूप में इस्तेमाल कानूनी कार्यवाही का कारण बन सकता है।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
21. कुंवर साहब उस रोज बंगले से निकले, 10 जनपथ गए और फिर चुप हो रहे!
20. आप क्या सोचते हैं? क्या नाइंसाफियां सिर्फ हादसे के वक्त ही हुई?
19. सिफारिशें मानने में क्या है, मान लेते हैं…
18. उन्होंने सीबीआई के साथ गैस पीड़तों को भी बकरा बनाया
17. इन्हें ज़िन्दा रहने की ज़रूरत क्या है?
16. पहले हम जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं… गुलाम, ढुलमुल और लापरवाह! 
15. किसी को उम्मीद नहीं थी कि अदालत का फैसला पुराना रायता ऐसा फैला देगा
14. अर्जुन सिंह ने कहा था- उनकी मंशा एंडरसन को तंग करने की नहीं थी
13. एंडरसन की रिहाई ही नहीं, गिरफ्तारी भी ‘बड़ा घोटाला’ थी
12. जो शक्तिशाली हैं, संभवतः उनका यही चरित्र है…दोहरा!
11. भोपाल गैस त्रासदी घृणित विश्वासघात की कहानी है
10. वे निशाने पर आने लगे, वे दामन बचाने लगे!
9. एंडरसन को सरकारी विमान से दिल्ली ले जाने का आदेश अर्जुन सिंह के निवास से मिला था
8.प्लांट की सुरक्षा के लिए सब लापरवाह, बस, एंडरसन के लिए दिखाई परवाह
7.केंद्र के साफ निर्देश थे कि वॉरेन एंडरसन को भारत लाने की कोशिश न की जाए!
6. कानून मंत्री भूल गए…इंसाफ दफन करने के इंतजाम उन्हीं की पार्टी ने किए थे!
5. एंडरसन को जब फैसले की जानकारी मिली होगी तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी रही होगी?
4. हादसे के जिम्मेदारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए थी, जो मिसाल बनती, लेकिन…
3. फैसला आते ही आरोपियों को जमानत और पिछले दरवाज़े से रिहाई
2. फैसला, जिसमें देर भी गजब की और अंधेर भी जबर्दस्त!
1. गैस त्रासदी…जिसने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को सरे बाजार नंगा किया!

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