रोहित कौशिक, हापुड, उत्तर प्रदेश
सभी कविताएँ कविता नहीं हो पातीं।
उन्हें खा जाते हैं,
दूसरे अनुभवी कवियों की कविताएँ या
उसी कविता के शब्द,
जो लिखें हों इटैलिक या ‘बोल्ड’ में।
फलत: कवि कभी कवि नहीं बन पाता,
वह उपेक्षित–सा हो जाता है,
किसी लघु खण्डकाव्यकार-सा,
खण्डित-मन,
उसे घेरने लगते हैं
वे ही रस निष्पत्ति के ,
33 व्यभिचारी भाव ,
रस–अनौचित्य आरोप को ,
बना-आधार।
यत्र-सर्वत्र ,
बना-बुनकरों का,
जटिल-घेराव।
ऐसे में कवि का शोक,
श्रृंगार के भेद में लिपट,
वियोग मात्र होकर सिमट जाता है,
जैसे सीता-विलाप सीमित हुआ था, अशोक वाटिका तक।
उसे कहीं आस भी जगती है,
पुरस्कृत होने की,
मंच-सभा, संस्था-प्रकाशकों के हाथ से,
साहित्यकारों के साथ में,
चित्रावली-प्रशस्ति सहित।
पर उसका शोक वाल्मीकि-सा श्लोक नहीं हो पाता,
न तुलसीदास-सा भक्तिगीत,
न वियोगी कवि-सा दयादृष्टि का पात्र,
न मीरा का भक्ति-वियोग,
स्वीकृत होता है,
सम्पादक-मण्डली द्वारा,
उसे कुछ पल होती हैं बैचेनी ,
छटपटाहट,
व्याकुल करते हैं भावनाओं के,
सशक्त, किन्तु पिंजरबद्ध पंख,
वह भरना चाहता है उड़ान ,
उत्सुकता है,
उड्डयन की,
लोचनों को लिप्सा,
तल-धरातल ,
ऊपर अम्बर,
और सभी विद्यमान घटकसहित,
लोक-अवलोकन की।
एक दिन वह भाग्यवश,
निकला पिंजरे से बाहर,
ऊपर नीला अम्बर और पाकर वसुधास्पर्श ,
मुदित रहा पलभर,
चहका, फुदका,
फुर्र-फिर्र क्षणभर,
वह करने लगा,
वियत-गति,
पर लड़खड़ाई,
उसकी वेग-यति,
उसे अनुभूत हुआ,
हारने लगा है,
उसमें उड़ान का साहस,
वह सामान्य हवा से,
पछाड़ खाने लगा है।
उसने निहारा ,
पंखों को असहाय,
पंजों को निरुपाय,
उसकी आँखें भर आईं,
पर वह,
अपनी एक घुटकी-सी ,
भर पी गया,
आँसुओं का तालाब,
खुद अन्दर।
अब वह सुप्त हैं ,
शान्त ज्वालामुखी–सा,
वह सांत्वना–सन्तुष्टि,
फैलाकर,
अपनी सीमा को,
समेटने लगा है,
उसे पता चल गया है,
उसकी कविताएँ कभी,
बनेगीं कविता,
कवियों के समान,
बिना बोल्ड और इटैलिक मोड के भी,
अमर और अनश्वर,
आत्मतत्त्व वत्।।
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(नोट : रोहित #अपनीडिजिटलडायरी के साथ काफी पहले से जुड़े हैं। उत्तर प्रदेश में संस्कृत शिक्षक हैं। लेख, कविता, निबन्ध आदि लिखने में स्वाभाविक रुचि है। उनकी यह कविता व्हाट्स एप के जरिए डायरी तक पहुँची है।)
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रोहित की पिछली कविताएँ
2 – कविता : मैं कवि नहीं, याचक हूँ
1 – प्रकृति की सीमा को, बाँध सका है कौन?
