रोहित कौशिक, हापुड़ उत्तर प्रदेश
प्रकृति की सीमा को, बाँध सका है कौन?
मानव यत्न तो छोटा वामन, बन गया है देखो गौण।
नदी प्रवाह ले डूबा जलमग्न हो गए वे घर।
जिनकी नींव में रखे थे, दीर्घकाय दृढ़ पत्थर।।
नदी जो आयी द्वार तोड़,पलंग व सोफे बह गए।
घर ये क्या उसी का या, हम बेघर हो गए?
फसल असल में ही हमारी, सोचते थे गिनके दिन।
दीन नदी ने बना दिया या भूल में थे सोते हम?
जिस तरह मेघगर्जन से डरी हुई है धरा।
डर है विक्षत करेगा, झड़कर नभ से दुर्भरा ।
ज्वार – भाटा मापकर भी, सिंधुवेग का अध्ययन।
किन्तु सत्य प्रकृति को ,जाने पूर्ण कैसे कौन?
हम घरों की छत बना, फर्श स्वच्छ कर रहे।
दीवार खड़े रंग- रंगे, भव्य दिख रहे नए।
किन्तु आकर जल गिरा या वज्रपात हुआ कड़ा?
घर भर्भर गिरा अध:, नदीतट रेतवत्।
इन तटों पर बस रही है, मानवों की भीड़ तो,
छोड़ना ही चाहती नहीं , नदी उस तीर को।
घेरते हैं तट या जल किनारे के हम छल – मगर?
लेगा भाग जल स्वयं, कर अपना दीर्घमंडल।।
—-
(नोट : रोहित #अपनीडिजिटलडायरी के साथ काफी पहले से जुड़े हैं। उत्तर प्रदेश में सस्कृत शिक्षक हैं। लेख, कविता, निबन्ध आदि लिखने में स्वाभाविक रुचि है। उनकी यह कविता व्हाट्स एप के जरिए डायरी तक पहुँची है।)
